सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।। श्रीरामचरित्रमानस प्रर्वचन - अयोध्याकाण्ड के प्रारंभ में साधना का विलक्षण रूप।।
अयोध्याकाण्ड के प्रारंभ में साधना का विलक्षण रूप ;
जब साधना पूजा - स्थान से निकलकर जीवन के प्रत्येक निर्णय की परीक्षा बन जाती है ;
अयोध्याकाण्ड को केवल एक राजपरिवार की घटना, राज्याभिषेक की तैयारी, वनगमन और पारिवारिक दुःख की कथा मानकर पढ़ना उसके अत्यंत गहरे आध्यात्मिक पक्ष को सीमित कर देना होगा।
वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड के आरंभ में ही ऐसा वातावरण बनता है जिसमें बाहरी सुख - सुविधा के बीच धर्म, संयम, कर्तव्य और आत्मनियंत्रण की परीक्षा सामने आती है।
मूल कथा में प्रारंभिक प्रसंगों में चारों भाइयों का प्रेम, राजा का अपने पुत्रों के प्रति स्नेह और राम के गुणों का वर्णन मिलता है।
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यहाँ साधना का अर्थ केवल आँखें बंद करके मंत्र - जप करना नहीं है।
साधना का वास्तविक अर्थ तब प्रकट होता है जब मनुष्य के सामने ऐसी परिस्थिति आ जाए जिसमें उसकी इच्छा एक दिशा में हो और उसका कर्तव्य दूसरी दिशा में।
यही इस कथा का विलक्षण पक्ष है।
अयोध्या काण्ड के प्रारंभ में साधना का जो विलक्षण रुप प्रस्तुत किया गया है उसे हम और आप हृदयंगम करने की चेष्टा करें।
गोस्वामीजी ने श्रीरामचरितमानस में समस्त कांडों के अंत में उस कांड के पढ़ने या सुनने का क्या फल है, इसका संकेत किया है।
बालकाण्ड के अंत में वे जो फलश्रुति लिखते हैं वह है:
*"सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गाबहिं सुनहिं"-*
भगवान राम और श्री सीताजी के इस विवाह को जो सप्रेम गाते अथवा सुनते हैं-
*"तिन्ह कहुं सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु"-*
इन व्यक्तियों के जीवन में सर्वदा उत्साह विद्यमान रहता है और चारों ओर मंगल निवास करते हैं।
इस प्रकार बालकाण्ड की फलश्रुति है आनन्द की उपलब्धि तथा अन्त:करण में उत्साह की अनुभूति।
किन्तु अयोध्या काण्ड का जो अंतिम फल है उसमें आपको भिन्नता दिखाई देगी।
साधना की पहली सीढ़ी — मन को अपने अधिकार में रखना ;
कल्पना कीजिए कि किसी व्यक्ति को लंबे समय से जिस सम्मान, पद या उपलब्धि की प्रतीक्षा थी, वह अचानक उसके सामने आ जाए।
घर में उत्सव हो, लोग प्रसन्न हों, सभी उसे बधाई दे रहे हों और उसे लगे कि अब उसके जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य पूरा होने वाला है।
ऐसी स्थिति में मन स्वाभाविक रूप से भविष्य की कल्पनाएँ करने लगता है।
लेकिन साधना यहीं से आरंभ होती है।
जिस वस्तु के मिलने पर मन बहुत अधिक उछलता नहीं और जिसके चले जाने पर मन टूटता नहीं—
वही मन धीरे - धीरे स्थिर होना सीखता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि प्रसन्नता अनुभव न की जाए।
बल्कि अर्थ यह है कि प्रसन्नता मनुष्य को अपने नियंत्रण में न ले।
जैसे समुद्र में असंख्य नदियाँ आती हैं, फिर भी समुद्र अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता, वैसे ही जीवन में सुख - दुःख, लाभ - हानि, मान - अपमान आते रहें, लेकिन साधक अपनी आंतरिक मर्यादा न छोड़े।
यही साधना का पहला संकेत है।
जब परिस्थिति अचानक बदल जाए ;
अब उसी व्यक्ति की कल्पना कीजिए।
सुबह तक उसके लिए सब कुछ अनुकूल था।
परिवार प्रसन्न था, भविष्य निश्चित दिखाई दे रहा था और समाज में उसका सम्मान बढ़ने वाला था।
लेकिन कुछ ही समय बाद ऐसी सूचना आती है जिससे उसका पूरा जीवन उलट जाता है।
जिस अधिकार की वह प्रतीक्षा कर रहा था, वह किसी दूसरे को मिल जाता है।
जिस स्थान पर उसे रहना था, वहाँ से उसे दूर जाना पड़ता है।
जिस सुविधा को वह अपना अधिकार समझ रहा था, वह उससे छिन जाती है।
सामान्य मनुष्य के लिए यह केवल बाहरी परिवर्तन नहीं है।
उसके भीतर प्रश्न उठते हैं—
“मेरे साथ ही ऐसा क्यों?”
“मुझे ही क्यों छोड़ना पड़ा?”
“जिसके लिए मैंने इतना किया, उसका परिणाम ऐसा क्यों मिला?”
यहीं साधना की असली परीक्षा होती है।
मंदिर में बैठकर शांत रहना सरल हो सकता है, लेकिन अपने विरुद्ध परिस्थिति उत्पन्न होने पर भी मन को धर्म से विचलित न होने देना कठिन है।
अयोध्याकाण्ड इसी कठिन साधना को कथा के माध्यम से सामने लाता है।
वाल्मीकि रामायण के उस प्रसिद्ध प्रसंग में जब राम पिता की अत्यंत व्याकुल अवस्था देखते हैं, तब भी वे पहले पिता और फिर कैकेयी के चरणों में प्रणाम करते हैं।
पाठ में राम के इस व्यवहार को विनम्र और संयमित बताया गया है।
यह छोटा - सा प्रसंग साधना का बहुत बड़ा सिद्धांत बताता है—
परिस्थिति बदल सकती है, लेकिन संस्कार नहीं बदलने चाहिए।
अयोध्या काण्ड के अंत में गोस्वामीजी कहते हैं-
*भरत चरित करि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं"-*
श्रीभरत चरित्र का जो आदर और नियमपूर्वक श्रवण करते हैं उन्हें दो वस्तुएं मिलती हैं।
किन्तु भरत के द्वारा जो मिलता है उसके विषय में यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि उसके ग्राहक तो कम ही हैं।
कई बार लोग यह प्रश्र करते हैं कि श्रीभरत, श्रीहनुमानजी की अपेक्षा अधिक महान हैं, लेकिन फिर भी जिधर देखिए उधर पूजा तो हनुमान जी की ही हो रही है।
उनके मंदिर गांव - गांव में दिखाई दे रहे हैं।
श्रीभरत जी का मंदिर कहीं नहीं दिखाई देता है।
कई बार लोग मुझसे पूछते हैं कि ऐसा क्यों?
और भई! मैं तो यही कहूंगा कि हनुमानजी जो देते हैं उसके ग्राहक बहुत हैं और भरतजी जो देते हैं उसके ग्राहक बहुत कम हैं।
साधना का दूसरा रूप — प्रतिक्रिया पर नियंत्रण ;
आज के जीवन में इसका बहुत सीधा उदाहरण मिलता है।
मान लीजिए किसी कार्यालय में एक कर्मचारी वर्षों से मेहनत कर रहा है। उसे विश्वास है कि अगली पदोन्नति उसे मिलेगी।
लेकिन अंतिम समय में किसी दूसरे व्यक्ति को वह पद मिल जाता है।
अब उसके पास दो मार्ग हैं।
पहला—क्रोध, ईर्ष्या, शिकायत और अपमानजनक शब्द।
दूसरा—स्थिति को स्वीकार करके यह विचार करना कि “मेरी मेहनत मेरा धर्म है; परिणाम मेरे पूर्ण अधिकार में नहीं।”
दूसरा मार्ग साधना का मार्ग है।
इसका अर्थ अन्याय को स्वीकार करना नहीं है।
यदि वास्तव में अन्याय हुआ है तो उचित माध्यम से उसका समाधान करना भी धर्म का भाग हो सकता है।
लेकिन शिकायत करते समय भी विवेक न खोना, सत्य से न हटना और प्रतिशोध को जीवन का उद्देश्य न बना लेना—
यही आत्मसंयम है।
इस लिए साधना पलायन नहीं है।
साधना प्रतिक्रिया की स्वतंत्रता प्राप्त करना है।
परिस्थिति हमें आदेश दे सकती है, लेकिन हम कैसे प्रतिक्रिया देंगे, यह हमारे संस्कार और विवेक पर निर्भर करता है।
क्योंकि हनुमानजी की स्तुति करते हुए हनुमान चालीसा में कहा ही गया है कि-
*नासै रोग हरै सब पीरा।*
*जपत निरन्तर हनुमत वीरा।।*
*संकट तें हनुमान छुड़ावै।*
*मन क्रम वचन ध्यान जो लावै।।*
इस का अभिप्राय है कि हमारी जो समस्त भौतिक समस्याएं तथा आपदाएं हैं उनका समाधान श्री हनुमानजी देते हैं।
इस लिए हमें लगता है भई! सबसे अच्छे तो हनुमानजी ही हैं।
लेकिन क्या हनुमानजी केवल भौतिक कामना की ही पूर्ति करते हैं?
नहीं - नहीं, गोस्वामीजी ने तो हनुमानजी से कहा कि आपकी विलक्षणता यह है कि आप भौतिक कामनाओं की तो पूर्ति करते ही हैं क्योंकि-
साधना का तीसरा रूप — प्रिय वस्तु का त्याग ;
मनुष्य जिस वस्तु को सबसे अधिक चाहता है, उसका त्याग उसके लिए सबसे कठिन होता है।
धन का त्याग उस व्यक्ति के लिए कठिन है जिसके लिए धन ही सुरक्षा है।
सम्मान का त्याग उस व्यक्ति के लिए कठिन है जिसके लिए दूसरों की प्रशंसा ही आत्ममूल्य है।
अधिकार का त्याग उस व्यक्ति के लिए कठिन है जो अधिकार को अपना स्थायी स्वरूप मान बैठा है।
और संबंधों में अपनी इच्छा का त्याग उस व्यक्ति के लिए कठिन है जो चाहता है कि सब कुछ उसके अनुसार हो।
इसीलिए साधना में त्याग का स्थान बहुत ऊँचा है।
त्याग का अर्थ यह नहीं कि संसार छोड़ दिया जाए।
त्याग का वास्तविक अर्थ है—
जिस वस्तु को धर्म के कारण छोड़ना पड़े, उसके लिए धर्म को न छोड़ना।
यह अत्यंत सूक्ष्म अंतर है।
एक साधारण उदाहरण ;
एक माता - पिता अपने बच्चे को पढ़ाना चाहते हैं।
बच्चे को किसी विशेष विषय में रुचि नहीं है, लेकिन माता - पिता अपनी इच्छा उस पर थोपना चाहते हैं।
यदि वे केवल अपनी प्रतिष्ठा के लिए बच्चे को उसी दिशा में धकेलते रहें तो यह आसक्ति है।
लेकिन यदि वे बच्चे की प्रकृति, क्षमता और वास्तविक हित को समझकर अपनी व्यक्तिगत इच्छा पीछे कर दें तो यह त्याग है।
इसी प्रकार कोई व्यक्ति अपने परिवार में निर्णय लेते समय केवल “मेरी बात सही है” कहने के बजाय यह विचार करे कि “सत्य और कल्याण किसमें है?”
यह भी साधना है।
साधना का मूल्य माला की संख्या से ही नहीं, बल्कि अहंकार कितनी बार पीछे हटता है, इससे भी समझा जा सकता है।
*तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा"-*
आपकी सबसे बड़ी विलक्षणता यह है कि-
*राम मिलाय राजपद दीन्हा"-*
आपने उन्हें राज्य के साथ - साथ राम से भी मिला दिया।
साधना का चौथा रूप — सुख में भी संयम ;
अक्सर साधना की चर्चा केवल दुःख के समय की जाती है।
लेकिन वास्तव में सुख भी मनुष्य की परीक्षा लेता है।
दुःख में मनुष्य ईश्वर को पुकारता है; सुख में वह ईश्वर को भूल भी सकता है।
दुःख में मनुष्य अपनी सीमाएँ देखता है; सुख में उसे अपनी शक्ति का भ्रम हो सकता है।
इसलिए जिस प्रकार दुःख में धैर्य चाहिए, उसी प्रकार सुख में विनय चाहिए।
यदि किसी व्यक्ति को धन प्राप्त हो जाए तो वह दूसरों को छोटा न समझे।
यदि पद प्राप्त हो जाए तो वह पुराने संबंधों को न भूले।
यदि ज्ञान प्राप्त हो जाए तो वह अज्ञानी का उपहास न करे।
यदि प्रसिद्धि मिल जाए तो वह आलोचना सुनने की क्षमता न खोए।
यही साधना है।
साधना और कर्तव्य ;
साधना का सबसे ऊँचा रूप तब दिखाई देता है जब मनुष्य अपने व्यक्तिगत सुख से ऊपर कर्तव्य को रखता है।
कर्तव्य हमेशा सुखद नहीं होता।
कभी माता-पिता का कर्तव्य कठिन होता है।
कभी संतान का कर्तव्य कठिन होता है।
कभी गुरु का कर्तव्य कठोर निर्णय माँगता है।
कभी राजा या प्रशासन का कर्तव्य व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठने को कहता है।
और कभी सामान्य गृहस्थ का धर्म ही उससे ऐसी बात करने को कहता है जो उसके अपने मन को पसंद नहीं होती।
इसलिए धर्म केवल वह नहीं जो हमें अच्छा लगे।
जो उचित है, उसे उचित समझकर करना—यह धर्मबुद्धि है।
ऐसे बढ़िया देवता तो केवल आप ही हैं।
इसलिए हम तो आपके चरणों में ही नमन करते हैं।
इसका अभिप्राय है कि श्रीहनुमानजी महाराज लोक परलोक दोनों की प्राप्ति कराते हैं।
लेकिन श्री भरतजी की भूमिका महानतम होते हुए भी उनके द्वारा जिन दो वस्तुओं की प्राप्ति होती है, उनके चाहने वाले कम हैं।
साधना में वाणी का महत्व ;
मनुष्य के भीतर की स्थिति उसकी वाणी से बहुत जल्दी प्रकट होती है।
जिसका मन अशांत है, वह छोटी बात पर कठोर शब्द बोल सकता है।
जिसका मन अहंकार से भरा है, वह सलाह को अपमान समझ सकता है।
जिसका मन ईर्ष्या से भरा है, वह दूसरे की सफलता में दोष खोज सकता है।
और जिसका मन साधना से परिपक्व हो रहा है, वह कठिन परिस्थिति में भी शब्दों को नियंत्रित करता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि वह सत्य बोलना छोड़ देता है।
बल्कि वह सत्य को भी मर्यादित वाणी में बोलना सीखता है।
किसी को सुधारना हो तो अपमान आवश्यक नहीं।
असहमति हो तो शत्रुता आवश्यक नहीं।
अपना अधिकार माँगना हो तो दूसरे का अपमान आवश्यक नहीं।
यही वाणी की साधना है।
साधना में संबंधों की परीक्षा ;
अयोध्याकाण्ड की कथा का एक अत्यंत गहरा पक्ष यह है कि संकट आने पर केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि अनेक संबंधों की परीक्षा होती है।
सत्ता बदलती है तो संबंधों की वास्तविकता सामने आती है।
सुख समाप्त होता है तो कौन साथ रहता है, यह दिखाई देता है।
आरोप लगते हैं तो कौन विवेक रखता है, यह दिखाई देता है।
और जब व्यक्ति को अपना स्वार्थ छोड़ना पड़े, तब पता चलता है कि प्रेम वास्तव में कितना गहरा है।
इस लिए साधना अकेले कमरे में होने वाली प्रक्रिया नहीं है।
परिवार ही सबसे बड़ा साधना-क्षेत्र बन सकता है।
जहाँ क्रोध आता है, वहीं क्षमा की साधना है।
जहाँ मतभेद आता है, वहीं संयम की साधना है।
जहाँ अधिकार का प्रश्न आता है, वहीं त्याग की साधना है।
जहाँ अपमान मिलता है, वहीं आत्मसम्मान और अहंकार का अंतर समझने की साधना है।
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वन केवल बाहर नहीं, भीतर भी है ;
कथा में वन एक वास्तविक स्थान है, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से वन का एक प्रतीकात्मक अर्थ भी समझा जा सकता है।
जब मनुष्य परिचित सुविधाओं से दूर हो जाता है, तब उसके भीतर छिपे संस्कार सामने आते हैं।
घर में अनेक वस्तुएँ हमें सहारा देती हैं।
परिचित लोग हमें संभालते हैं।
सुविधाएँ तनाव कम करती हैं।
लेकिन जब इन सबका सहारा कम हो जाए, तब मनुष्य अपने भीतर की वास्तविक शक्ति को पहचानता है।
इसलिए जीवन में आने वाली कठिन परिस्थिति हमेशा केवल दंड नहीं होती।
कभी-कभी वह मनुष्य को उसकी वास्तविक क्षमता से परिचित कराने वाली साधना भी बन सकती है।
आधुनिक जीवन में इसका प्रयोग ;
आज किसी व्यक्ति की नौकरी चली जाए, व्यापार में घाटा हो जाए, संबंधों में समस्या आ जाए, बीमारी के कारण जीवनशैली बदलनी पड़े, आर्थिक परिस्थिति कठिन हो जाए या वर्षों की योजना अचानक विफल हो जाए—
तो वह तुरंत इसे केवल दुर्भाग्य मान सकता है।
लेकिन साधना की दृष्टि दूसरा प्रश्न पूछती है—
“अब मुझे इस परिस्थिति में अपने धर्म को कैसे निभाना है?”
यह प्रश्न बहुत शक्तिशाली है।
“मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?”—यह प्रश्न मन को अतीत में ले जाता है।
“अब मुझे क्या करना चाहिए?”—यह प्रश्न मन को वर्तमान में लाता है।
“मैं इस परिस्थिति में अपने संस्कार कैसे बचाऊँ?”—यह प्रश्न मनुष्य को साधना की ओर ले जाता है।
और यही परिवर्तन जीवन का वास्तविक आध्यात्मिक परिवर्तन है।
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साधना का अंतिम रहस्य ;
अयोध्याकाण्ड के प्रारंभिक वातावरण से एक अत्यंत सूक्ष्म शिक्षा ग्रहण की जा सकती है।
साधना का उद्देश्य केवल चमत्कार प्राप्त करना नहीं है।
साधना का उद्देश्य ऐसा मन बनाना है जो चमत्कार न होने पर भी धर्म से न हटे।
साधना का उद्देश्य केवल संकट दूर करना नहीं है।
साधना का उद्देश्य संकट आने पर मनुष्य को इतना स्थिर बनाना है कि वह सही निर्णय कर सके।
साधना का उद्देश्य केवल सुख माँगना नहीं है।
साधना का उद्देश्य सुख मिलने पर अहंकार से बचना और दुःख आने पर निराशा से बचना है।
साधना का उद्देश्य संसार छोड़ना नहीं है।
साधना का उद्देश्य संसार में रहते हुए धर्म, सत्य, संयम, करुणा, कर्तव्य और मर्यादा को जीवित रखना है।
इसी लिए अयोध्याकाण्ड की साधना का विलक्षण रूप हमें यह समझाता है कि मनुष्य की वास्तविक आध्यात्मिक परीक्षा पूजा के समय नहीं, बल्कि परिस्थिति के परिवर्तन के समय होती है।
जब सब कुछ अपने अनुसार हो रहा हो तब शांत रहना अच्छा है; लेकिन जब सब कुछ अपने विरुद्ध हो जाए और फिर भी मनुष्य सत्य का साथ न छोड़े—
वहीं साधना अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होती है।
और जब सम्मान मिले तो विनम्रता बनी रहे, अधिकार मिले तो अहंकार न आए, अधिकार छिने तो धर्म न छूटे, प्रिय वस्तु दूर हो तो प्रेम नष्ट न हो, विपरीत परिस्थिति आए तो विवेक नष्ट न हो और निर्णय के समय व्यक्तिगत इच्छा से ऊपर कर्तव्य दिखाई दे—
तब साधना केवल पूजा की क्रिया नहीं रहती।
वह मनुष्य के चरित्र का स्वरूप बन जाती है।
यही अयोध्याकाण्ड के आरंभ में दिखाई देने वाला साधना का विलक्षण संदेश है—
सच्ची साधना वह है जिसमें मनुष्य परिस्थिति को नहीं, पहले अपने मन को साधता है।
वाल्मीकि रामायण में आगे आने वाली घटनाएँ इसी आंतरिक संयम को व्यवहारिक परीक्षा में बदल देती हैं;
राम के वनगमन के प्रसंग में भी मूल पाठ उनके संयमित व्यवहार को विशेष रूप से सामने रखता है।
अर्थात् साधना का अंतिम स्थान मंदिर नहीं, मनुष्य का आचरण है;
और उसकी अंतिम परीक्षा शब्दों में नहीं, निर्णयों में होती है।
शेष कथा सार अगले अंक में.....
-युग तुलसी श्री रामकिंकर जी.....
#########🙏 भाग 2 पर आगे ########
!!!!! शुभमस्तु !!!
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