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"रावणत्व" है क्या ??

"रावणत्व" है क्या ?? 

श्रीरामचरितमानस के संपूर्ण कांडों में “रावणत्व” क्या है ?

श्रीरामचरितमानस केवल भगवान श्रीराम की कथा नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के भीतर चलने वाले धर्म और अधर्म, विवेक और अहंकार, मर्यादा और उच्छृंखलता, भक्ति और अभिमान के संघर्ष का भी महान ग्रंथ है। 

गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामकथा के माध्यम से मनुष्य के जीवन को यह समझाने का प्रयास किया है कि वास्तविक विजय केवल बाहरी शत्रु पर विजय नहीं, बल्कि अपने भीतर के दोषों पर विजय प्राप्त करना है।

रामचरितमानस में रावण एक ऐतिहासिक अथवा पौराणिक पात्र होने के साथ - साथ एक गहरा प्रतीक भी है। 

उसके दस सिर केवल दस मुखों का चित्रण नहीं करते, बल्कि मनुष्य के भीतर पलने वाले अनेक विकारों और अहंकार की विभिन्न दिशाओं का संकेत देते हैं। 

रावण के पास ज्ञान था, शक्ति थी, तपस्या थी, वैभव था, विद्या थी और महान सामर्थ्य था; फिर भी वह विनाश को प्राप्त हुआ। 


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इसका मूल कारण था—

ज्ञान के ऊपर अहंकार का अधिकार हो जाना।

इसी अवस्था को “रावणत्व” कहा जा सकता है।

रावणत्व का अर्थ केवल रावण जैसा क्रूर होना नहीं है। 

जब मनुष्य सत्य जानते हुए भी अपने अहंकार के कारण सत्य को स्वीकार नहीं करता, अपनी शक्ति का उपयोग धर्म के स्थान पर स्वार्थ के लिए करता है, दूसरों के अधिकार का सम्मान नहीं करता और उचित सलाह मिलने पर भी अपने दुराग्रह को नहीं छोड़ता—

तब उसके भीतर रावणत्व उत्पन्न होता है।

1. बालकांड में रावणत्व की पहली झलक :


रामचरितमानस के बालकांड में मुख्य रूप से भगवान श्रीराम के अवतार, बाललीलाओं, विश्वामित्र के साथ गमन, ताड़का - वध, अहल्या उद्धार और सीता - स्वयंवर आदि प्रसंग आते हैं। 

इस कांड में रावण की कथा प्रत्यक्ष रूप से केंद्र में नहीं है, लेकिन आगे आने वाले संघर्ष की भूमिका दिखाई देती है।


बालकांड हमें यह बताता है कि जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है और शक्तिशाली लोग अपनी शक्ति का दुरुपयोग करने लगते हैं, तब धर्म की स्थापना के लिए भगवान का अवतार होता है।


रावणत्व की पहली विशेषता यहीं समझ में आती है—

शक्ति का अहंकार।


शक्ति अपने आप में बुरी नहीं है। 

विद्या, धन, सामर्थ्य और अधिकार सभी उपयोगी हैं। 

लेकिन जब मनुष्य सोचने लगे कि “मेरे पास शक्ति है, इस लिए मैं जो चाहूँ कर सकता हूँ”, वहीं से रावणत्व जन्म लेता है।


श्रीराम के चरित्र में शक्ति के साथ विनम्रता है, जबकि रावण के चरित्र में शक्ति के साथ अहंकार। 

यही दोनों के बीच मूल अंतर है।


2. अयोध्याकांड में रावणत्व का विरोधी रूप :


अयोध्याकांड में रावण प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित नहीं है, लेकिन श्रीराम का चरित्र रावणत्व के बिल्कुल विपरीत आदर्श को प्रस्तुत करता है।

राज्य मिलने वाला था, लेकिन परिस्थितियाँ बदल गईं। 
श्रीराम ने राज्य के अधिकार के लिए संघर्ष नहीं किया। 
उन्होंने पिता की आज्ञा को सर्वोपरि मानकर वनवास स्वीकार कर लिया।

यहीं “रामत्व” और “रावणत्व” का अंतर स्पष्ट होता है।

राम कहते हैं—
कर्तव्य बड़ा है, मेरा सुख छोटा है।

रावणत्व कहता है—
मेरा अधिकार सबसे बड़ा है।

राम त्याग करते हैं, रावण अधिकार छीनता है। 
राम दूसरों के सम्मान की रक्षा करते हैं, रावण दूसरों की स्वतंत्रता और मर्यादा का उल्लंघन करता है।

अयोध्याकांड हमें सिखाता है कि जहाँ कर्तव्य के सामने अहंकार झुकता है, वहाँ रामत्व है; और जहाँ अहंकार के सामने कर्तव्य झुक जाता है, वहाँ रावणत्व है।

3. अरण्यकांड में रावणत्व का वास्तविक उदय :


अरण्यकांड में रावणत्व का सबसे महत्वपूर्ण रूप सामने आता है। 
रावण की बहन शूर्पणखा के प्रसंग से घटनाएँ आगे बढ़ती हैं। 
खर - दूषण आदि का वध होता है और अंततः रावण सीता के अपहरण की योजना बनाता है।

यहाँ रावण की सबसे बड़ी कमजोरी सामने आती है—
काम और अहंकार का गठबंधन।

रावण चाहता तो सीता के प्रति उत्पन्न आकर्षण को नियंत्रित कर सकता था। 
लेकिन उसने अपनी इच्छा को धर्म और मर्यादा से ऊपर रख दिया।

यहीं से रावणत्व अपनी विनाशकारी दिशा में बढ़ता है।

सीता का अपहरण केवल एक स्त्री का अपहरण नहीं था। 
वह दूसरे के अधिकार और सम्मान का अपमान था। 
रावण ने यह मान लिया कि उसकी इच्छा ही न्याय है।

यही रावणत्व का मूल सूत्र है:

“जो मैं चाहता हूँ, वही होना चाहिए।”

जब मनुष्य अपनी इच्छा को सत्य से बड़ा मान लेता है, तब उसका विवेक धीरे - धीरे समाप्त होने लगता है।





4. किष्किंधाकांड में रावणत्व के सामने रामत्व :


किष्किंधाकांड में श्रीराम की मित्रता सुग्रीव से होती है। 

यहाँ भी रावणत्व को समझने के लिए राम के आचरण को देखना आवश्यक है।

राम सुग्रीव की सहायता करते हैं, लेकिन मित्रता को केवल स्वार्थ का साधन नहीं बनाते। 

वे मित्र के दुःख को अपना दुःख मानते हैं।

इस के विपरीत रावण अपने आसपास के लोगों और संबंधों को भी अपने अहंकार के अधीन रखता है।

रावणत्व में संबंधों की आत्मीयता कम और सत्ता का दबाव अधिक होता है। 

जहाँ प्रेम की जगह भय आ जाए, वहाँ रावणत्व बढ़ता है।

रावण की लंका में लोग उसकी शक्ति से प्रभावित थे, लेकिन सभी उसके निर्णय से सहमत नहीं थे। 

विभीषण ने उसे धर्म का मार्ग दिखाया, पर रावण ने भाई की उचित बात भी स्वीकार नहीं की।

इससे पता चलता है कि रावणत्व का एक बड़ा लक्षण है—

सही सलाह सुनने की क्षमता का समाप्त हो जाना।

5. सुंदरकांड में रावणत्व का दर्पण :


सुंदरकांड में हनुमानजी लंका पहुँचते हैं। 
वे सीताजी को खोजते हैं और अशोक वाटिका में उन्हें पाते हैं। 
इस के बाद वे रावण की सभा और लंका की शक्ति को देखते हैं।

यहाँ रावण का वैभव दिखाई देता है। 
सोने की लंका है, विशाल सेना है, असंख्य योद्धा हैं, अपार धन है। 
लेकिन इस सारे वैभव के बीच रावण का चरित्र भीतर से खोखला हो चुका है।

यही सुंदरकांड का एक महत्वपूर्ण संदेश है:

बाहरी सुंदरता और आंतरिक सुंदरता अलग - अलग चीजें हैं।

लंका सोने की थी, लेकिन रावण का मन अहंकार से अंधकारमय था।

हनुमानजी की शक्ति भी अत्यंत विशाल है, पर वे शक्ति का प्रदर्शन केवल आवश्यकता के अनुसार करते हैं। 

वे श्रीराम के दूत हैं और अपने सामर्थ्य का उपयोग प्रभु के कार्य के लिए करते हैं।

रावण के पास शक्ति है, लेकिन शक्ति उसके अहंकार की सेवा करती है।

हनुमान के पास शक्ति है, लेकिन शक्ति भक्ति की सेवा करती है।

यही रामचरितमानस में शक्ति के दो रूप हैं—

भक्ति से जुड़ी शक्ति और अहंकार से जुड़ी शक्ति।

6. लंकाकांड में रावणत्व का चरम :


लंकाकांड में रावणत्व अपने चरम पर पहुँचता है। 

युद्ध सामने है। 

रावण के पास अभी भी अवसर है कि वह सीता को सम्मानपूर्वक लौटा दे और विनाश को रोक दे।

लेकिन उसका अहंकार उसे ऐसा करने नहीं देता।

विभीषण उसे समझाते हैं। 

अन्य लोग भी उसे उचित सलाह देते हैं। 

स्वयं युद्ध की परिस्थितियाँ उसे संकेत देती हैं कि सामने साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम हैं। 

फिर भी वह अपने निर्णय से पीछे नहीं हटता।

यहाँ रावणत्व की सबसे खतरनाक अवस्था दिखाई देती है:

मनुष्य को सत्य दिखाई देने लगे, फिर भी वह उसे स्वीकार न करे।

अहंकार का यही अंतिम रूप है।

रावण की सबसे बड़ी पराजय युद्धभूमि में नहीं हुई। 

उसकी वास्तविक पराजय तब हो गई थी जब उसने विभीषण की धर्मयुक्त सलाह को ठुकरा दिया था।

जब विवेक चला जाता है, तब शक्ति भी विनाश का कारण बन जाती है।

रावण के पास विद्या थी, पर विवेक का पालन नहीं था। 

उसके पास तप था, पर आत्मसंयम नहीं था। 

उसके पास शक्ति थी, पर धर्म नहीं था। 

उसके पास धन था, पर संतोष नहीं था।

इस लिए उसका साम्राज्य बाहर से विशाल होते हुए भी भीतर से कमजोर हो गया।


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7. उत्तरकांड में रावणत्व का दार्शनिक अर्थ :


उत्तरकांड रामराज्य, धर्म, भक्ति और जीवन के अनेक गहरे सिद्धांतों को सामने रखता है। 

यहाँ रावणत्व को व्यापक अर्थ में समझा जा सकता है।

रावण केवल लंका का राजा नहीं है। 

रावणत्व मनुष्य के भीतर मौजूद वह मानसिकता है जो उसे अपने अहंकार का दास बना देती है।

मनुष्य के भीतर अनेक प्रकार के विकार होते हैं—

काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार और अन्य आसक्तियाँ। 

जब ये विकार विवेक पर शासन करने लगते हैं, तब मनुष्य के भीतर रावणत्व विकसित होता है।

इस लिए रावण का वध केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं है। 

यह संदेश है कि अधर्म कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसका अंत निश्चित है।

रामराज्य का अर्थ केवल एक आदर्श राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि ऐसी चेतना है जहाँ मनुष्य के जीवन में सत्य, करुणा, मर्यादा, सेवा और धर्म का शासन हो।

रावणत्व के दस प्रमुख रूप :


रावण के दस सिरों को प्रतीकात्मक रूप से देखें तो वे मनुष्य के भीतर मौजूद अनेक विकारों की ओर संकेत कर सकते हैं। 

परंपरागत व्याख्याओं में इनके अलग - अलग अर्थ मिलते हैं। 

व्यापक रूप से इन्हें इस प्रकार समझा जा सकता है—

1. अहंकार — स्वयं को सबसे बड़ा समझना।
2. काम — अनियंत्रित इच्छाओं का दास बन जाना।
3. क्रोध — विवेक खोकर प्रतिक्रिया करना।
4. लोभ — आवश्यकता से अधिक पाने की लालसा।
5. मोह — सत्य के स्थान पर आसक्ति को चुनना।
6. मद — धन, शक्ति, पद या ज्ञान का घमंड।
7. मत्सर — दूसरों की उन्नति से जलना।
8. दुराग्रह — सही बात सामने आने पर भी अपनी गलत बात पर अड़े रहना।
9. परपीड़ा — अपने सुख के लिए दूसरे को दुःख देना।
10. अधर्म — सत्य और मर्यादा को जानकर भी उसका उल्लंघन करना।

इन सभी का मूल केंद्र अहंकार है।

रावणत्व और रामत्व में अंतर :


राम और रावण का संघर्ष केवल दो व्यक्तियों का युद्ध नहीं है। 

यह दो जीवन - दृष्टियों का संघर्ष है।

रामत्व| रावणत्व
विनम्रता| अहंकार
मर्यादा| उच्छृंखलता
त्याग| स्वार्थ
धर्म| अधर्म
सेवा| शोषण
आत्मसंयम| इच्छाओं की गुलामी
सत्य| दुराग्रह
करुणा| क्रूरता
उचित सलाह का सम्मान| सलाह का अपमान
भक्ति| अभिमान

राम के पास शक्ति होते हुए भी विनय है। 

रावण के पास शक्ति होते हुए भी अहंकार है।

राम दूसरों के सम्मान की रक्षा करते हैं। 

रावण दूसरों के सम्मान को अपने अधिकार के नीचे रखता है।

राम अपने जीवन से मर्यादा स्थापित करते हैं। 

रावण अपनी शक्ति से मर्यादा तोड़ता है।

जीवन में रावणत्व :


रावणत्व केवल प्राचीन कथा का विषय नहीं है। 

आज भी यह मनुष्य के जीवन में दिखाई देता है।

जब कोई व्यक्ति अपने पद का गलत उपयोग करता है, वहाँ रावणत्व है।

जब धन के कारण व्यक्ति दूसरों को छोटा समझता है, वहाँ रावणत्व है।

जब व्यक्ति अपनी गलती स्वीकार नहीं करता, जबकि उसे सत्य समझ में आ चुका है, वहाँ रावणत्व है।

जब परिवार में व्यक्ति केवल अपनी इच्छा थोपता है और दूसरों की भावनाओं का सम्मान नहीं करता, वहाँ भी रावणत्व का अंश हो सकता है।

जब ज्ञान बढ़ता है लेकिन विनम्रता नहीं बढ़ती, तब ज्ञान भी अहंकार का हथियार बन सकता है।

इस लिए रामचरितमानस का रावण हमारे बाहर से अधिक हमारे भीतर देखने योग्य पात्र है।

रावण को मारना क्या है ?


विजयादशमी पर हम रावण का पुतला जलाते हैं। 

लेकिन वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या हमारे भीतर का रावण भी जलता है ?

यदि हम रावण का पुतला जलाएँ और साथ ही अपने अहंकार को जीवित रखें, तो रावण - वध का वास्तविक संदेश अधूरा रह जाता है।

सच्चा रावण - वध तब है जब—

अहंकार की जगह विनम्रता आए,
क्रोध की जगह क्षमा आए,
लोभ की जगह संतोष आए,
स्वार्थ की जगह सेवा आए,
दुराग्रह की जगह विवेक आए,
और अधर्म की जगह धर्म का चुनाव हो।

रावण को बाहर खोजने से पहले अपने भीतर देखना आवश्यक है।

श्रीरामचरितमानस के सातों कांडों को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि रावणत्व किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं है। 

यह एक मानसिक अवस्था है।

बालकांड हमें शक्ति और धर्म का अंतर समझाता है।

अयोध्याकांड त्याग और अहंकार के बीच का अंतर दिखाता है।

अरण्यकांड अनियंत्रित इच्छा से उत्पन्न अधर्म को सामने लाता है।

किष्किंधाकांड मित्रता, विश्वास और संबंधों का महत्व बताता है।

सुंदरकांड भक्ति और अहंकार से जुड़ी शक्ति का अंतर दिखाता है।

लंकाकांड बताता है कि दुराग्रह और अहंकार अंततः विनाश की ओर ले जाते हैं।

उत्तरकांड रामत्व को धर्म, भक्ति और आदर्श जीवन की व्यापक दृष्टि में स्थापित करता है।

इस प्रकार रामचरितमानस का संदेश केवल इतना नहीं है कि श्रीराम ने रावण को पराजित किया। 

गहरा संदेश यह है कि रामत्व और रावणत्व दोनों मनुष्य के जीवन में उपस्थित संभावनाएँ हैं।

जिस दिन मनुष्य सत्य, मर्यादा, करुणा, विनम्रता और धर्म को अपने जीवन में स्थान देता है, उस दिन उसके भीतर रामत्व जागता है।

और जिस दिन अहंकार, स्वार्थ, लोभ, क्रोध, अनियंत्रित इच्छा और दुराग्रह उसके विवेक पर शासन करने लगते हैं, उसी दिन उसके भीतर रावणत्व जन्म लेता है।

इसलिए रावण का सबसे बड़ा वध लंका में नहीं, मनुष्य के अपने अंतःकरण में होना चाहिए।

यही श्रीरामचरितमानस के रावणत्व का सबसे गहरा अर्थ है—

अहंकार से विवेक की ओर, स्वार्थ से सेवा की ओर, अधर्म से धर्म की ओर और “मैं” से “राम” की ओर यात्रा। राम राम राम सीताराम जय राम राम राम सीताराम........राम राम राम सीताराम राम जय जय राम राम राम सीताराम राम राम राम !!!!! शुभमस्तु !!!

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🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-

PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 

-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-

(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 

" Opp. Shri Ramanatha Swami Kovil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits, V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )

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नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....

जय द्वारकाधीश....

जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

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