सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।। श्रीरामचरित्रमानस प्रर्वचन ।।
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अयोध्या काण्ड के प्रारंभ में साधना का जो विलक्षण रुप प्रस्तुत किया गया है उसे हम और आप हृदयंगम करने की चेष्टा करें।
गोस्वामीजी ने श्रीरामचरितमानस में समस्त कांडों के अंत में उस कांड के पढ़ने या सुनने का क्या फल है, इसका संकेत किया है।
बालकाण्ड के अंत में वे जो फलश्रुति लिखते हैं वह है:
*"सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गाबहिं सुनहिं"-*
भगवान राम और श्री सीताजी के इस विवाह को जो सप्रेम गाते अथवा सुनते हैं-
*"तिन्ह कहुं सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु"-*
इन व्यक्तियों के जीवन में सर्वदा उत्साह विद्यमान रहता है और चारों ओर मंगल निवास करते हैं।
इस प्रकार बालकाण्ड की फलश्रुति है आनन्द की उपलब्धि तथा अन्त:करण में उत्साह की अनुभूति।
किन्तु अयोध्या काण्ड का जो अंतिम फल है उसमें आपको भिन्नता दिखाई देगी।
अयोध्या काण्ड के अंत में गोस्वामीजी कहते हैं-
*भरत चरित करि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं"-*
श्रीभरत चरित्र का जो आदर और नियमपूर्वक श्रवण करते हैं उन्हें दो वस्तुएं मिलती हैं।
किन्तु भरत के द्वारा जो मिलता है उसके विषय में यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि उसके ग्राहक तो कम ही हैं।
कई बार लोग यह प्रश्र करते हैं कि श्रीभरत, श्रीहनुमानजी की अपेक्षा अधिक महान हैं, लेकिन फिर भी जिधर देखिए उधर पूजा तो हनुमान जी की ही हो रही है।
उनके मंदिर गांव-गांव में दिखाई दे रहे हैं।
श्रीभरत जी का मंदिर कहीं नहीं दिखाई देता है।
कई बार लोग मुझसे पूछते हैं कि ऐसा क्यों?
और भई! मैं तो यही कहूंगा कि हनुमानजी जो देते हैं उसके ग्राहक बहुत हैं और भरतजी जो देते हैं उसके ग्राहक बहुत कम हैं।
क्योंकि हनुमानजी की स्तुति करते हुए हनुमान चालीसा में कहा ही गया है कि-
*नासै रोग हरै सब पीरा।*
*जपत निरन्तर हनुमत वीरा।।*
*संकट तें हनुमान छुड़ावै।*
*मन क्रम वचन ध्यान जो लावै।।*
इसका अभिप्राय है कि हमारी जो समस्त भौतिक समस्याएं तथा आपदाएं हैं उनका समाधान श्री हनुमानजी देते हैं।
इसलिए हमें लगता है भई! सबसे अच्छे तो हनुमानजी ही हैं।
लेकिन क्या हनुमानजी केवल भौतिक कामना की ही पूर्ति करते हैं? नहीं-नहीं, गोस्वामीजी ने तो हनुमानजी से कहा कि आपकी विलक्षणता यह है कि आप भौतिक कामनाओं की तो पूर्ति करते ही हैं क्योंकि-
*तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा"-*
आपकी सबसे बड़ी विलक्षणता यह है कि-
*राम मिलाय राजपद दीन्हा"-*
आपने उन्हें राज्य के साथ-साथ राम से भी मिला दिया।
ऐसे बढ़िया देवता तो केवल आप ही हैं।
इसलिए हम तो आपके चरणों में ही नमन करते हैं।
इसका अभिप्राय है कि श्रीहनुमानजी महाराज लोक परलोक दोनों की प्राप्ति कराते हैं।
लेकिन श्री भरतजी की भूमिका महानतम होते हुए भी उनके द्वारा जिन दो वस्तुओं की प्राप्ति होती है, उनके चाहने वाले कम हैं।
शेष कथा सार अगले अंक में.....
-युग तुलसी श्री रामकिंकर जी.....
#########🙏 भाग 2 पर आगे ########
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
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(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
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नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏
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