।। श्रीमद्भागवत प्रवचन ।।"कैसे दिएं श्रीकृष्ण ने शनि देव को दर्शन"〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️जब श्री कृष्ण ने जन्म लिया तो सभी देवी-देवता उनके दर्शन करने नंदगांव पधारे।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्रीमद्भागवत प्रवचन ।।

"कैसे दिएं श्रीकृष्ण ने शनि देव को दर्शन"

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जब श्री कृष्ण ने जन्म लिया तो सभी देवी-देवता उनके दर्शन करने नंदगांव पधारे। 

कृष्णभक्त शनिदेव भी देवताओं संग श्रीकृष्ण के दर्शन करने नंदगांव पहुंचे। 

परंतु मां यशोदा ने उन्हें नंदलाल के दर्शन करने से मना कर दिया क्योंकि मां यशोदा को डर था कि शनि देव कि वक्र दृष्टि कहीं कान्हा पर न पड़ जाए।

 परंतु शनिदेव को यह अच्छा नहीं लगा और वो निराश होकर नंदगांव के पास जंगल में आकर तपस्या करने लगे। 

शनिदेव का मानना था कि पूर्णपरमेश्वर श्रीकृष्ण ने ही तो उन्हें न्यायाधीश बनाकर पापियों को दण्डित करने का कार्य सोंपा है। 

तथा सज्जनों, सत-पुरुषों, भगवत भक्तों का शनिदेव सदैव कल्याण करते है।

भगवान् श्री कृष्ण शनि देव कि तपस्या से द्रवित हो गए और शनि देव के सामने कोयल के रूप में प्रकट हो कर कहा – 

हे शनि देव आप निःसंदेह अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित हो और आप के ही कारण पापियों – 

अत्याचारियों – 

कुकर्मिओं का दमन होता है और परोक्ष रूप से कर्म-परायण, सज्जनों, सत-पुरुषों, भगवत भक्तों का कल्याण होता है, आप धर्मं -परायण प्राणियों के लिए ही तो कुकर्मिओं का दमन करके उन्हें भी कर्तव्य परायण बनाते हो, आप का ह्रदय तो पिता कि तरह सभी कर्तव्यनिष्ठ प्राणियों के लिए द्रवित रहता है और उन्हीं की रक्षा के लिए आप एक सजग और बलवान पिता कि तरह सदैव उनके अनिष्ट स्वरूप दुष्टों को दंड देते रहते हैं। 
हे शनि देव !

मैं आप से एक भेद खोलना चाहता हूँ, कि यह बृज-क्षेत्र मुझे परम प्रिय है और मैं इस पवित्र भूमि को सदैव आप जैसे सशक्त-रक्षक और पापिओं को दंड देने में सक्षम कर्तव्य-परायण शनि देव कि क्षत्र-छाया में रखना चाहता हूँ इसलिए हे शनि देव – आप मेरी इस इच्छा को सम्मान देते हुए इसी स्थान पर सदैव निवास करो, क्योंकि मैं यहाँ कोयल के रूप में आप से मिला हूँ इसी लिए आज से यह पवित्र स्थान “कोकिलावन” के नाम से विख्यात होगा। 

यहाँ कोयल के मधुर स्वर सदैव गूंजते रहेंगे, आप मेरे इस बृज प्रदेश में आने वाले हर प्राणी पर नम्र रहें साथ ही कोकिलावन-धाम में आने वाला आप के साथ – साथ मेरी भी कृपा का पात्र होगा।
🔸〰️जय श्री कृष्ण〰️🔸〰️जय श्री कृष्ण〰️🔸〰️जय श्री कृष्ण〰️🔸
🙏🙏🙏【【【【【{{{{ (((( मेरा पोस्ट पर होने वाली ऐडवताइस के ऊपर होने वाली इनकम का 50 % के आसपास का भाग पशु पक्षी ओर जनकल्याण धार्मिक कार्यो में किया जाता है.... जय जय परशुरामजी ))))) }}}}}】】】】】🙏🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 25 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Dhanlakshmi Strits , Marwar Strits, RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 WHATSAPP नंबर : + 91 7598240825 ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85
Email: prabhurajyguru@gmail.com
आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

।। श्री विष्णुपुराण प्रवचन ।।*"पुरुषोत्तम मास"*भगवान विष्णु के १६ नामों का एक छोटा श्लोक प्रस्तुत कर रहा हूं । इसमें मनुष्य को किस किस अवस्थाओं में भगवान विष्णु को किस किस नाम से स्मरण करना चाहिए, इसका उल्लेख किया गया है :-

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्री विष्णुपुराण प्रवचन ।।

*"पुरुषोत्तम मास"*

भगवान विष्णु के १६ नामों का एक छोटा श्लोक प्रस्तुत कर रहा हूं ।  

इसमें मनुष्य को किस किस अवस्थाओं में भगवान विष्णु को किस किस नाम से स्मरण करना चाहिए, इसका उल्लेख किया गया है :-
*औषधे चिंतयते विष्णुं ,*
*भोजने च जनार्दनम् |*
*शयने पद्मनाभं च*
*विवाहे च प्रजापतिम् ||*

*युद्धे चक्रधरं देवं*
*प्रवासे च त्रिविक्रमं |*
*नारायणं तनु त्यागे*
*श्रीधरं प्रिय संगमे ||*

*दु:स्वप्ने स्मर गोविन्दं*
*संकटे मधुसूदनम् |*
*कानने नारसिंहं च*
*पावके जलशायिनम् ||*

*जल मध्ये वराहं च*
*पर्वते रघुनन्दनम् |*
*गमने वामनं चैव*
*सर्व कार्येषु माधवम् |*

*षोडश एतानि नामानि*
*प्रातरुत्थाय य: पठेत ।*
*सर्व पाप विनिर्मुक्ते,*
*विष्णुलोके महियते ।।*

(१) औषधि लेते समय - विष्णु ;
(२) भोजन के समय - जनार्दन ;
(३) शयन करते समय - पद्मनाभ :
(४) विवाह के समय - प्रजापति ;
(५) युद्ध के समय - चक्रधर ; 
(६) यात्रा के समय - त्रिविक्रम ;
(७) शरीर त्यागते समय - नारायण; 
(८) पत्नी के साथ - श्रीधर ;
(९) नींद में बुरे स्वप्न आते समय - गोविंद ;
(१०) संकट के समय - मधुसूदन ;
(११) जंगल में संकट के समय - नृसिंह ;
(१२) अग्नि के संकट के समय - जलाशयी ;
(१३) जल में संकट के समय - वाराह ;
(१४) पहाड़ पर संकट के समय - रघुनंदन;
(१५) गमन करते समय - वामन; 
(१६) अन्य सभी शेष कार्य करते समय - माधव ।।
        🌹🙏जय श्री कृष्ण🙏🌹
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पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
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।। ( बड़ी माँ ) मां तारा और बामा खेपा (पागल) की कथा ।।💐🚩जय माँ तारा🚩💐 पश्चिम बंगाल के एक गांव में वामा चरण नाम के बालक का जन्म हुआ । बालक के जन्म के कुछ समय बाद उसके पिता का देहांत हो गया । माता भी गरीब थी । इसलिए बच्चों के पालन पोषण की समस्या आई । उन्हें मामा के पास भेज दिया गया ।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। ( बड़ी माँ  ) मां तारा और बामा खेपा (पागल) की कथा ।।

💐🚩जय माँ तारा🚩💐
 
पश्चिम बंगाल के एक गांव में वामा चरण नाम के बालक का जन्म हुआ । 

बालक के जन्म के कुछ समय बाद उसके पिता का देहांत हो गया । 

माता भी गरीब थी ।

 इसलिए बच्चों के पालन पोषण की समस्या आई । उन्हें मामा के पास भेज दिया गया ।

 मामा तारापीठ के पास के गांव में रहते थे । 

जैसा कि आमतौर पर अनाथ बच्चों के साथ होता है ।

 दोनों बच्चों के साथ बहुत अच्छा व्यवहार नहीं हुआ ।

धीरे धीरे वामाचरण की रुचि बाबाओं की तरफ होने लगी ।

 गांव के मशान में आने वाले बाबाओं की संगत में रहते रहते बामाचरण में भी देवी के प्रति रुझान बढ़ने लगा । 

अब वह तारा माई को बड़ी मां कहते और अपनी मां को छोटी मा ।
   
बामा चरण कभी श्मशान में जलती चिता के पास जाकर बैठ जाता कभी यूं ही हवा में बातें करता रहता । 

ऐसे ही वह युवावस्था तक पहुंच गया ।

 उसकी हरकतों की वजह से उसका नाम बामाचरण से वामा खेपा पड़ चुका था । 

खेपा का मतलब होता है पागल । 

यानी गांव वाले उसको आधा पागल समझते थे । 

उसके नाम के साथ उन्होंने पागल उपनाम जोड़ दिया था । 

वे यह नहीं जानते थे कि वस्तुत: कितनी उच्च कोटि का महामानव उनके साथ है ।

वह भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि थी । 

मंगलवार का दिन था । 

भगवती तारा की सिद्धि का परम सिद्ध मुहूर्त ।

 रात का समय था । 

बामाखेपा जलती हुई चिता के बगल में श्मशान में बैठा हुआ था तभी !

नीले आकाश से ज्योति फूट पड़ी और चारों तरफ प्रकाश ही प्रकाश फैल गया। 

उसी प्रकाश में वामाचरण को माँ तारा के दर्शन हुए। ।

कमर में बाघ की खाल पहने हुए !

एक हाथ में कैंची लिए ।

एक हाथ में खोपड़ी लिए ।
   
एक हाथ में नीले कमल का पुष्प लिए ।

एक हाथ में खड्ग लिए हुए।

महावर लगे सुंदर पैरो में पायल पहने हुए ।

खुले हुए कमर तक बिखरे केश से युक्त ,

परम ब्रह्मांड की स्वामिनी, सौंदर्य की प्रतिमूर्ति ।

नील वर्णी , मंद मंद मुसकाती माँ तारा, वामाखेपा के सामने खड़ी थी…….

वामाखेपा उस भव्य और सुंदर देवी को देखकर खुशी से भर गए। 

माता ने उसके सर पर हाथ फेरा और बामाखेपा वही समाधिस्थ हो गए  । 

3 दिन और 3 रात उसी समाधि की अवस्था में वे श्मशान में रहे ।

 3 दिन के बाद उन्हें होश आया और होश आते ही वह मां मां चिल्लाते हुए इधर उधर दौडने लगे । 

अब गांव वालों को पूरा यकीन हो गया कि बामा पूरा पागल हो गया है । 

बामा की यह स्थिति महीने भर रही ....

   कुछ दिन बाद वहां की रानी जी को सपने में भगवती तारा ने दर्शन दिए और निर्देश दिया कि मसान के पास मेरे लिए मंदिर का निर्माण करो और बामा को पुजारी बनाओ । 

अगले दिन से मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ हो गया । 

कुछ ही दिनों में मंदिर बनकर तैयार हो गया और बामा को मंदिर का पुजारी बना दिया गया । 

बामा बेहद खुश हो गए क्योंकि  उनकी बड़ी मां अब उनके साथ थी…...
  

रानी के द्वारा बनाया मंदिर अर्थात मोटे चढ़ावे की संभावना । 

अब ऐसे मंदिर में एक आधे पागल को पुजारी बनाना बहुत से पण्डों को रास नहीं आया । 

वे बामाखेपा को निपटाने का मार्ग खोजते रहते थे । 

बामाखेपा की हरकतें अजीब अजीब हुआ करती थी । 

कई बार वह दिन भर पूजा करता । 

कई बार 2-2, 3-3 दिन तक पूजा ही नहीं करता । 

कभी देवी को माला पहनाता कभी खुद पहन लेता ।

 इनमें से कोई भी प्रक्रम पंडों के हिसाब से शास्त्रीय पूजन विधि से मैच नहीं खाता था ।  

यह बात उनको खटक रही थी ।

फिर एक दिन ऐसा हुआ कि प्रसाद बना और प्रसाद बनने के बाद जब मंदिर में पहुंचा तो देवी को भोग लगाने से पहले वामा चरण के मन में विचार आया, कि इसे चक्कर देख लो यह माता के खाने के लायक है भी कि नहीं ।

 बस फिर क्या था । 

उन्होंने प्रसाद की थाली में हाथ डाला और चखने के लिए अपने मुंह में डाल लिया । 

चखने के बाद जब सही लगा तो बाकी प्रसाद उन्होंने माई को अर्पित कर दिया  ।
   
इतना बड़ा अवसर पंडित कहाँ छोड़ते । 

उन्होंने बवाल मचा दिया कि, देवी के प्रसाद को बामा ने खा लिया है । 

उसे जूठा कर दिया है । 

झूठा प्रसाद देवी को चढ़ा दिया है । 

अब देवी रुष्ट हो जाएगी, उसका प्रकोप सारे गांव को झेलना पड़ेगा । 

उसके बाद भीड़तंत्र का बोलबाला हुआ और गांव वालों ने मिलकर पंडों के साथ बामाचरण की कस कर पिटाई कर दी । 

उसे श्मशान में ले जाकर फेंक दिया ।

मंदिर पर पण्डों का कब्जा हो गया । 

उन्होंने शुद्धीकरण और तमाम प्रक्रियाएं की । 

उस दिन पूजन पण्डों के अनुसार संपन्न हुआ ।

उधर बामाखेपा को होश आया तो वह माई पर गुस्सा हो गया - मैंने गलत क्या किया जो तूने मुझे पिटवा दिया । 

तुझे देने से पहले खाना स्वादिष्ट है या नहीं देख रहा था । 

इसमें मेरी गलती क्या थी ?

 मैं तो तुम्हें स्वादिष्ट भोग लगाने का प्रयास कर रहा था और चाहता था कि तुझे अच्छे स्वाद का प्रसाद ही मिले । 

अगर स्वाद गड़बड़ होता तो उसे फेककर दूसरा बनवाता । 

लेकिन तूने बेवजह मुझे पिटवाया जा मैं अब तेरे पास नही आऊंगा ।

मसान घाट पर बैठकर बामाचरण ने मां को सारी बातें सुना दी और वहां से उठकर चला गया जंगल की ओर । 

जंगल में जाकर एक गुफा में बैठ गया । 

यह स्थिति बिलकुल वैसे ही    थी जैसे अपनी मां से रूठ कर बच्चे किसी कोने में जाकर छुप जाते हैं ।

 बामाचरण और तारा माई के बीच में मां और बेटे जैसा रिश्ता था ।

 यह रिश्ता बिल्कुल वैसा ही था जैसे एक अबोध शिशु और उसकी मां की बीच में होता है ।

अपने शिशु की व्यथा तारा माई को सहन नहीं हुई । 

उसी रात रानी के स्वप्न में माई प्रकट हुई । 

क्रोधित माई ने रानी को फटकार लगाई - तेरे पण्डों ने मेरे पुत्र को बुरी तरह से मारा है । 

मैं तेरा मंदिर छोड़ कर जा रही हूं । 

अब तुझे और तेरे राज्य को मेरा प्रकोप सहना पड़ेगा, अगर उससे बचना चाहती है तो कल के कल मेरे पुत्र को वापस लाकर मंदिर में पूजा का भार सौंप,  वरना प्रतिफल भुगतने के लिए तैयार रह ।

एक तो तारा माई का रूप ऐसे ही भयानक है । 

क्रोधित अवस्था में तो सीधी सरल माता भी काली से कम नहीं दिखाई देती । 

क्रोधित माई का स्वरूप व्याख्या से परे था ।

रानी हड़बड़ा कर पलंग पर उठ बैठी । 

रानी के लिए रात बिताना भी मुश्किल हो गया । उसने सारी रात जागकर बिताई ।

अगले दिन अपने सेवकों को दौड़ाया और मामले का पता    लगाने के लिए कहा । 

जैसे ही पूरी जानकारी प्राप्त हुई रानी अपने लाव लश्कर के साथ मंदिर पहुंच गई । 

सारे पण्डों को कसकर फटकार लगाई और मंदिर में प्रवेश से प्रतिबंधित कर दिया । 

अपने सेवकों को आदेश दिया कि जैसे भी हो बामाखेपा को पकड़कर लाओ ।

अब सारे सेवक चारों तरफ बामाखेपा की खोज में लग गए । 

एक सेवक को गुफा में बैठा हुआ बामाखेपा मिल गया । 

बड़ी मनोव्वल के बाद भी वह नहीं माना सेवक ने जाकर रानी को बात बताई । 

अंततः रानी खुद गुफा तक पहुंची ।

बामा ने उनपर भी अपना गुस्सा उतारा - आप के कहने पर मैं पूजा कर रहा था और मुझे देखो इन लोगों ने कितना मारा !

उनकी बाल सुलभ सहजता को देखकर रानी का नारी हृदय भी ममत्व से भर गया ।

उनकी समझ में आ गया कि तारा माई का मातृत्व इस बामाखेपा के प्रति क्यों है ।

उन्होंने फरमान जारी कर दिया -  इस मंदिर का पुजारी बामाखेपा है । 

उसकी जैसी मर्जी हो जैसी विधि वह करना चाहे उस प्रकार से पूजा करने के लिए वह स्वतंत्र है । 

कोई भी उसके मार्ग में आएगा तो दंड का भागी होगा ।

 यह मंदिर बामाखेपा का है और तारा माई भी बामाखेपा की है ।

 वह जिस विधान को सही समझे, उस विधान से पूजा करेगा और    वही विधान यहां पर सही माना जाएगा ।

बामाखेपा को तो जैसे मन मांगी मुराद मिल गई । 

मां और बेटे का मिलन हो चुका था । 
मंदिर व्यवस्था फिर से बामाखेपा के हिसाब से चलने लगी ।

ऐसा माना जाता है कि तारा माई खुद बामाखेपा के हाथ से प्रसाद ग्रहण करती थी । 

ऐसे अद्भुत ढंग से बामाखेपा तारा माई के पूजन करते जिसका कोई नियम नहीं था । 

कभी सुबह 4 बजे पूजा चल रही है तो कभी दोपहर 12 बजे तक पूजा प्रारंभ नहीं होती ।

 क़भी रात भर पूजा चल रही है तो कभी पूरे दिन भर मंदिर की ओर बामाखेपा के दर्शन ही नहीं होते थे  । 

उनकी पूजन विधि लोगों को पसंद नहीं थी ,लेकिन उनके पास कोई उपाय नहीं था , क्योंकि रानी का फरमान था । 

बामाखेपा अपनी मस्ती में जीते थे और लोग उन्हें नीचा दिखाने का रास्ता खोजते । 

एक दिन बामाखेपा की मां का निधन हो गया । 

नदी में बाढ़ थी ।

 नदी के उस पार गांव था ।बामा जिद पर अड़ गए छोटी मां का दाह संस्कार बड़ी मां के पास वाले श्मशान में किया जाएगा ।

 गांव वाले बाढ़ वाली नदी को पार करने में  जान का खतरा है यह जानते थे , लेकिन बामा को समझाना किसी के बस की बात नहीं ।

   नाव वाले से बाबा ने देह को नदी के पार पहुंचाने की बात की । 

नाव वाले ने साफ इंकार कर दिया । 

बाबा ने नाव देने के लिए कहा । 

नाव वाला हाथ जोड़कर बोला - बाबा यही मेरे जीवन का सहारा है अगर बाढ़ में यह बह गया तो मैं घर कैसे चलाउँगा ?

बामा के चेहरे में रहस्यमई मुस्कान बिखर गई । 

जैसे उन्होंने कोई निर्णय ले लिया हो । 

उन्होंने अपनी माता के शव को उठाया और खुद नदी पर चलते हुए इस पार पहुंच गए । 

गांव वाले आंखें फाड़े उस दृश्य को देखते रह गए । 

बामा की इच्छा के अनुसार ही उन्होंने माई के मंदिर के पास वाले श्मशान में अपनी मां का दाह संस्कार संपन्न किया ।

मृत्यु भोज के लिए आसपास के सारे गांव में जितने लोग हैं, सभी को निमंत्रित करने के लिए बामाखेपा ने अपने घर के लोगों और आसपास के लोगों को कहा । 

सब इसे बामाखेपा का पागलपन समझकर शांत रहें ।

 जिसके पास दो वक्त की रोटी का पता नहीं वह आसपास के 20 गांव को खाना कैसे खिलाएंगा यह उनके लिए कल्पना से भी परे की बात थी ।

जब कोई भी निमंत्रण देने जाने को तैयार नहीं हुआ तो बामाखेपा अकेले निकल पड़े । 

उन्होंने आसपास के 20 गांवों में हर किसी को मृत्यु भोज के लिए आमंत्रित कर लिया । 

सारे गांव वाले यह देखने के लिए तारापीठ पहुंचने लगे कि    देखा जाए यह पगला किस प्रकार से इतने सारे लोगों को मृत्यु भोज कराता है ।

गांव वालों की आंखें उस समय फटी की फटी रह गई जब सुबह से बैल गाड़ियों में भर-भर कर अनाज सब्जी आदि तारापीठ की तरफ आने लगी । 

बैल गाड़ियों का पूरा एक काफिला मंदिर के पास पहुंच गया । 

अनाज और सब्जियों का ढेर लग गया । 

जो लोग आए थे उन्होंने खाना बनाना भी प्रारंभ कर दिया । 

दोपहर होते-होते सुस्वादु भोजन की गंध से पूरा इलाका महक रहा था ।

प्रकृति भी अपना परीक्षण कब छोड़ती है, आसमान में बादल छाने लगे । 

प्रकृति ने भी उग्र रूप धारण कर लिया । 

बिजली कड़कने लगी । 

हवाएं चलने लगी और जोरदार बारिश के आसार नजर आने लगे । 

बामाखेपा अपनी जगह से उठे और जिस जगह पर श्राद्ध भोज होना था , उस पूरे जगह को बांस के डंडे से एक घेरा बनाकर घेर दिया ।

घनघोर बारिश चालू हो गई लेकिन घेरे के अंदर एक बूंद पानी भी नहीं गिरी । 

गांव वाले देख सकते थे कि वे जहां बैठकर भोजन कर रहे हैं वह पूरा हिस्सा सूखा हुआ है, और उस घेरे के बाहर पानी की मोटी मोटी बूंदें बरस रही है । 

जमीन से जल धाराएं बह रही हैं । 

वह पूरा इलाका जिसमें भोज का आयोजन था ,पूरी तरह से सूखा हुआ था । 

20 गांव से आए    हुए सभी लोगों ने छक कर भोजन किया । 

हर कोई तृप्त हो गया ।

अब बारी थी वापस अपने अपने गांव जाने की । 

घनघोर बारिश को देखते हुए वापस जाने के लिए दिक्कत आएगी यह सोचकर सभी चिंतित थे । 

बामाखेपा ने माई के सामने अपना अनुरोध पेश किया और कुछ ही क्षणों में आसमान पूरी तरह से साफ हो गया और धूप खिल गई । 

सारे लोग बड़ी सहजता से अपने अपने गांव तक पहुंच गए ।

इस घटना के बाद बामाखेपा की अलौकिकता के बारे में लोगों को पता लगा । 

धीरे-धीरे लोगों की भीड़ बामाखेपा की तारा पीठ में बढ़ने लगी । 

कोई बीमार आता तो बामाखेपा उस पर हाथ फेर देते तो वह स्वस्थ हो जाता है ।

 निसंतानों को संतान की प्राप्ति हो जाती और सभी आगंतुकों की इच्छा और मनोकामना तारापीठ में पूरी होने लगी ।

बामाखेपा कभी भी बिना चखे माई को भोजन नहीं कराते थे ।

 माई स्वयं अपने हाथ से उनको भोजन खिलाती थी और उनके हाथों से भोजन ग्रहण करती थी ।

 ऐसे अद्भुत महामानव बामाखेपा अपने अंत समय में माई की  प्रतिमा में लीन हो गए ।
जय माँ अंबे 
जय माँ काली
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