सनातन विश्व हिंदू धार्मिक अनुसार चार वेदों अठार पुराण अनुसार हिंदी गुजराती भाषा का ब्लॉग पोस्ट
।। श्रीमद्भागवत प्रवचन ।।"कैसे दिएं श्रीकृष्ण ने शनि देव को दर्शन"
सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।। श्रीमद्भागवत प्रवचन ।।
"कैसे दिएं श्रीकृष्ण ने शनि देव को दर्शन"
〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️
जब श्री कृष्ण ने जन्म लिया तो सभी देवी-देवता उनके दर्शन करने नंदगांव पधारे।
कृष्णभक्त शनिदेव भी देवताओं संग श्रीकृष्ण के दर्शन करने नंदगांव पहुंचे।
परंतु मां यशोदा ने उन्हें नंदलाल के दर्शन करने से मना कर दिया क्योंकि मां यशोदा को डर था कि शनि देव कि वक्र दृष्टि कहीं कान्हा पर न पड़ जाए।
परंतु शनिदेव को यह अच्छा नहीं लगा और वो निराश होकर नंदगांव के पास जंगल में आकर तपस्या करने लगे।
शनिदेव का मानना था कि पूर्णपरमेश्वर श्रीकृष्ण ने ही तो उन्हें न्यायाधीश बनाकर पापियों को दण्डित करने का कार्य सोंपा है।
तथा सज्जनों, सत-पुरुषों, भगवत भक्तों का शनिदेव सदैव कल्याण करते है।
भगवान् श्री कृष्ण शनि देव कि तपस्या से द्रवित हो गए और शनि देव के सामने कोयल के रूप में प्रकट हो कर कहा –
हे शनि देव आप निःसंदेह अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित हो और आप के ही कारण पापियों –
अत्याचारियों –
कुकर्मिओं का दमन होता है और परोक्ष रूप से कर्म-परायण, सज्जनों, सत-पुरुषों, भगवत भक्तों का कल्याण होता है, आप धर्मं -परायण प्राणियों के लिए ही तो कुकर्मिओं का दमन करके उन्हें भी कर्तव्य परायण बनाते हो, आप का ह्रदय तो पिता कि तरह सभी कर्तव्यनिष्ठ प्राणियों के लिए द्रवित रहता है और उन्हीं की रक्षा के लिए आप एक सजग और बलवान पिता कि तरह सदैव उनके अनिष्ट स्वरूप दुष्टों को दंड देते रहते हैं।
हे शनि देव !
मैं आप से एक भेद खोलना चाहता हूँ, कि यह बृज-क्षेत्र मुझे परम प्रिय है और मैं इस पवित्र भूमि को सदैव आप जैसे सशक्त-रक्षक और पापिओं को दंड देने में सक्षम कर्तव्य-परायण शनि देव कि क्षत्र-छाया में रखना चाहता हूँ इसलिए हे शनि देव – आप मेरी इस इच्छा को सम्मान देते हुए इसी स्थान पर सदैव निवास करो, क्योंकि मैं यहाँ कोयल के रूप में आप से मिला हूँ इसी लिए आज से यह पवित्र स्थान “कोकिलावन” के नाम से विख्यात होगा।
यहाँ कोयल के मधुर स्वर सदैव गूंजते रहेंगे, आप मेरे इस बृज प्रदेश में आने वाले हर प्राणी पर नम्र रहें साथ ही कोकिलावन-धाम में आने वाला आप के साथ – साथ मेरी भी कृपा का पात्र होगा।
🔸〰️जय श्री कृष्ण〰️🔸〰️जय श्री कृष्ण〰️🔸〰️जय श्री कृष्ण〰️🔸
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:-
-: 25 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
" Opp. Shri Dhanlakshmi Strits , Marwar Strits, RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 WHATSAPP नंबर : + 91 7598240825 ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85
Email: prabhurajyguru@gmail.com
आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद..
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏
।। श्री विष्णुपुराण प्रवचन ।।*"पुरुषोत्तम मास"*भगवान विष्णु के १६ नामों का एक छोटा श्लोक प्रस्तुत कर रहा हूं । :-
सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।। श्री विष्णुपुराण प्रवचन ।।
*"पुरुषोत्तम मास"*
भगवान विष्णु के १६ नामों का एक छोटा श्लोक प्रस्तुत कर रहा हूं ।
इसमें मनुष्य को किस किस अवस्थाओं में भगवान विष्णु को किस किस नाम से स्मरण करना चाहिए, इसका उल्लेख किया गया है :-
*औषधे चिंतयते विष्णुं ,*
*भोजने च जनार्दनम् |*
*शयने पद्मनाभं च*
*विवाहे च प्रजापतिम् ||*
*युद्धे चक्रधरं देवं*
*प्रवासे च त्रिविक्रमं |*
*नारायणं तनु त्यागे*
*श्रीधरं प्रिय संगमे ||*
*दु:स्वप्ने स्मर गोविन्दं*
*संकटे मधुसूदनम् |*
*कानने नारसिंहं च*
*पावके जलशायिनम् ||*
*जल मध्ये वराहं च*
*पर्वते रघुनन्दनम् |*
*गमने वामनं चैव*
*सर्व कार्येषु माधवम् |*
*षोडश एतानि नामानि*
*प्रातरुत्थाय य: पठेत ।*
*सर्व पाप विनिर्मुक्ते,*
*विष्णुलोके महियते ।।*
(१) औषधि लेते समय - विष्णु ;
(२) भोजन के समय - जनार्दन ;
(३) शयन करते समय - पद्मनाभ :
(४) विवाह के समय - प्रजापति ;
(५) युद्ध के समय - चक्रधर ;
(६) यात्रा के समय - त्रिविक्रम ;
(७) शरीर त्यागते समय - नारायण;
(८) पत्नी के साथ - श्रीधर ;
(९) नींद में बुरे स्वप्न आते समय - गोविंद ;
(१०) संकट के समय - मधुसूदन ;
(११) जंगल में संकट के समय - नृसिंह ;
(१२) अग्नि के संकट के समय - जलाशयी ;
(१३) जल में संकट के समय - वाराह ;
(१४) पहाड़ पर संकट के समय - रघुनंदन;
(१५) गमन करते समय - वामन;
(१६) अन्य सभी शेष कार्य करते समय - माधव ।।
🌹🙏जय श्री कृष्ण🙏🌹
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:-
-: 25 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
" Opp. Shri Dhanlakshmi Strits , Marwar Strits, RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 WHATSAPP नंबर : + 91 7598240825 ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85
Email: prabhurajyguru@gmail.com
आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद..
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏
।। श्रीमद् देवी भागवत प्रवचन — ( बड़ी माँ ) मां तारा और बामा खेपा ( पागल ) की कथा ।।
सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।। श्रीमद् देवी भागवत प्रवचन — ( बड़ी माँ ) मां तारा और बामा खेपा ( पागल ) की कथा ।।
श्रीमद् देवी भागवत प्रवचन — बड़ी माँ, माँ तारा और बामाखेपा (पागल) की कथा का रहस्य ;
शास्त्रोक्त आधार: देवी उपासना, तारा महाविद्या, श्रीमद् देवी भागवत का देवी - तत्त्व और बामाखेपा की तारा - साधना से संबंधित प्रसिद्ध धार्मिक परंपरा।
यह प्रवचन माँ तारा की महिमा और बामाखेपा की भक्ति का आध्यात्मिक अर्थ समझाने के लिए है।
पश्चिम बंगाल के एक गांव में वामा चरण नाम के बालक का जन्म हुआ ।
बालक के जन्म के कुछ समय बाद उसके पिता का देहांत हो गया ।
माँ तारा की उपासना और बामाखेपा की भक्तिपरंपरा ;
बड़ी माँ का रहस्य ;
सनातन धर्म में माँ को केवल जन्म देने वाली माता के रूप में नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि की आदिशक्ति के रूप में भी समझा गया है।
श्रीमद् देवी भागवत महापुराण में देवी को जगत की मूल शक्ति, ब्रह्मविद्या और भक्तों की शरणदात्री कहा गया है।
देवी ही सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार की शक्ति हैं।
उन्हीं की कृपा से जीव को ज्ञान, भक्ति और मोक्ष का मार्ग प्राप्त होता है।
माँ तारा इसी आदिशक्ति का एक महान स्वरूप हैं।
दशमहाविद्याओं की परंपरा में तारा को महाविद्या माना गया है।
तारा नाम का एक प्रमुख अर्थ है—
जो तारती हैं, अर्थात् संसार-सागर, भय, अज्ञान और दुःख से पार लगाने वाली।
देवी भागवत के प्रथम स्कंध में आदिशक्ति के महात्म्य का वर्णन है।
देवी को ब्रह्मस्वरूपिणी, जगत की आधारभूता और समस्त देवताओं की शक्ति के रूप में समझाया गया है।
देवी भागवत में देवी का स्वरूप किसी एक सीमित रूप में बंधा हुआ नहीं है।
वह निर्गुण ब्रह्म की शक्ति भी हैं और भक्तों के लिए सगुण माता भी।
इस लिए जब भक्त माँ तारा को बड़ी माँ कहकर पुकारता है, तो वह केवल एक मूर्ति या स्थान विशेष की देवी को नहीं, बल्कि उस परम मातृशक्ति को पुकारता है, जो जीवन और मृत्यु दोनों के पार स्थित है।
माता भी गरीब थी ।
इस लिए बच्चों के पालन पोषण की समस्या आई ।
उन्हें मामा के पास भेज दिया गया ।
मामा तारापीठ के पास के गांव में रहते थे ।
जैसा कि आमतौर पर अनाथ बच्चों के साथ होता है ।
दोनों बच्चों के साथ बहुत अच्छा व्यवहार नहीं हुआ ।
धीरे धीरे वामाचरण की रुचि बाबाओं की तरफ होने लगी ।
गांव के मशान में आने वाले बाबाओं की संगत में रहते रहते बामाचरण में भी देवी के प्रति रुझान बढ़ने लगा ।
अब वह तारा माई को बड़ी मां कहते और अपनी मां को छोटी मा ।
बामा चरण कभी श्मशान में जलती चिता के पास जाकर बैठ जाता कभी यूं ही हवा में बातें करता रहता ।
ऐसे ही वह युवावस्था तक पहुंच गया ।
उसकी हरकतों की वजह से उसका नाम बामाचरण से वामा खेपा पड़ चुका था ।
खेपा का मतलब होता है पागल ।
यानी गांव वाले उसको आधा पागल समझते थे ।
उसके नाम के साथ उन्होंने पागल उपनाम जोड़ दिया था ।
वे यह नहीं जानते थे कि वस्तुत: कितनी उच्च कोटि का महामानव उनके साथ है ।
वह भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि थी ।
मंगलवार का दिन था ।
भगवती तारा की सिद्धि का परम सिद्ध मुहूर्त ।
रात का समय था ।
बामाखेपा जलती हुई चिता के बगल में श्मशान में बैठा हुआ था तभी !
नीले आकाश से ज्योति फूट पड़ी और चारों तरफ प्रकाश ही प्रकाश फैल गया।
उसी प्रकाश में वामाचरण को माँ तारा के दर्शन हुए। ।
कमर में बाघ की खाल पहने हुए !
एक हाथ में कैंची लिए ।
एक हाथ में खोपड़ी लिए ।
एक हाथ में नीले कमल का पुष्प लिए ।
एक हाथ में खड्ग लिए हुए।
महावर लगे सुंदर पैरो में पायल पहने हुए ।
खुले हुए कमर तक बिखरे केश से युक्त ,
परम ब्रह्मांड की स्वामिनी, सौंदर्य की प्रतिमूर्ति ।
नील वर्णी , मंद मंद मुसकाती माँ तारा, वामाखेपा के सामने खड़ी थी…….
वामाखेपा उस भव्य और सुंदर देवी को देखकर खुशी से भर गए।
माता ने उसके सर पर हाथ फेरा और बामाखेपा वही समाधिस्थ हो गए ।
3 दिन और 3 रात उसी समाधि की अवस्था में वे श्मशान में रहे ।
3 दिन के बाद उन्हें होश आया और होश आते ही वह मां मां चिल्लाते हुए इधर उधर दौडने लगे ।
अब गांव वालों को पूरा यकीन हो गया कि बामा पूरा पागल हो गया है ।
बामा की यह स्थिति महीने भर रही ....
कुछ दिन बाद वहां की रानी जी को सपने में भगवती तारा ने दर्शन दिए और निर्देश दिया कि मसान के पास मेरे लिए मंदिर का निर्माण करो और बामा को पुजारी बनाओ ।
अगले दिन से मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ हो गया ।
कुछ ही दिनों में मंदिर बनकर तैयार हो गया और बामा को मंदिर का पुजारी बना दिया गया ।
बामा बेहद खुश हो गए क्योंकि उनकी बड़ी मां अब उनके साथ थी…...
माँ तारा का तत्त्व ;
दशमहाविद्या परंपरा में माँ तारा का स्वरूप ज्ञान, करुणा, रक्षा और तारक शक्ति से जुड़ा हुआ है।
उनका नीलवर्ण आकाश और अनंत चेतना का प्रतीक माना जाता है।
हाथों में धारण किए गए आयुध, कमल और अन्य प्रतीकों का अर्थ अलग - अलग तांत्रिक परंपराओं में भिन्न हो सकता है।
इस लिए किसी एक चित्र को ही माँ तारा का पूर्ण शास्त्रोक्त स्वरूप मानना उचित नहीं है।
माँ तारा के तत्त्व को तीन प्रकार से समझा जा सकता है।
पहला—तारक शक्ति। जो जीव को अज्ञान और भय से पार लगाती है।
दूसरा—ज्ञान शक्ति। जो बाहरी संसार के आकर्षण से हटाकर आत्मतत्त्व की ओर ले जाती है।
तीसरा—करुणा शक्ति। जो शरणागत भक्त को माता के समान आश्रय देती है।
श्रीदेवी भागवत का मूल संदेश यह है कि देवी की उपासना केवल बाहरी कर्मकांड नहीं, बल्कि अंतःकरण की शुद्धि और परमशक्ति के प्रति समर्पण है।
रानी के द्वारा बनाया मंदिर अर्थात मोटे चढ़ावे की संभावना ।
अब ऐसे मंदिर में एक आधे पागल को पुजारी बनाना बहुत से पण्डों को रास नहीं आया ।
वे बामाखेपा को निपटाने का मार्ग खोजते रहते थे ।
बामाखेपा की हरकतें अजीब अजीब हुआ करती थी ।
कई बार वह दिन भर पूजा करता ।
कई बार 2-2, 3-3 दिन तक पूजा ही नहीं करता ।
कभी देवी को माला पहनाता कभी खुद पहन लेता ।
इनमें से कोई भी प्रक्रम पंडों के हिसाब से शास्त्रीय पूजन विधि से मैच नहीं खाता था ।
यह बात उनको खटक रही थी ।
बामाखेपा की भक्ति ;
बामाखेपा बंगाल की तारा - उपासना की प्रसिद्ध भक्तिपरंपरा से जुड़े साधक माने जाते हैं।
उनका संबंध तारापीठ की साधना - परंपरा से है।
उनके जीवन के विषय में अनेक भक्तिपरक कथाएँ और लोकश्रुतियाँ प्रचलित हैं।
उनका नाम बामाखेपा दो शब्दों से बना है—
बामा और खेपा।
खेपा का अर्थ बंगाली में पागल होता है।
भक्तिपरंपरा में यह नाम इस भाव को दर्शाता है कि वे सांसारिक आडंबर, प्रतिष्ठा और बाहरी दिखावे की अपेक्षा माँ की भक्ति में तल्लीन रहते थे।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझना आवश्यक है।
किसी संत को पागल कहना और मानसिक रोग से ग्रस्त व्यक्ति कहना एक ही बात नहीं है।
बामाखेपा की कथा में पागलपन का अर्थ संसार के मोह से विरक्ति और माँ के प्रति गहरी भक्ति है।
यह भक्तिपरंपरा का आध्यात्मिक रूपक है, चिकित्सकीय निदान नहीं।
उनके जीवनचरितों में माँ तारा के प्रति उनका वात्सल्य, समर्पण और अनन्य प्रेम विशेष रूप से वर्णित मिलता है।
भक्त उन्हें ऐसा साधक मानते हैं जिसके लिए माँ ही जीवन का केंद्र थीं।
फिर एक दिन ऐसा हुआ कि प्रसाद बना और प्रसाद बनने के बाद जब मंदिर में पहुंचा तो देवी को भोग लगाने से पहले वामा चरण के मन में विचार आया, कि इसे चक्कर देख लो यह माता के खाने के लायक है भी कि नहीं ।
बस फिर क्या था ।
उन्होंने प्रसाद की थाली में हाथ डाला और चखने के लिए अपने मुंह में डाल लिया ।
चखने के बाद जब सही लगा तो बाकी प्रसाद उन्होंने माई को अर्पित कर दिया ।
इतना बड़ा अवसर पंडित कहाँ छोड़ते ।
उन्होंने बवाल मचा दिया कि, देवी के प्रसाद को बामा ने खा लिया है ।
उसे जूठा कर दिया है ।
झूठा प्रसाद देवी को चढ़ा दिया है ।
अब देवी रुष्ट हो जाएगी, उसका प्रकोप सारे गांव को झेलना पड़ेगा ।
उसके बाद भीड़तंत्र का बोलबाला हुआ और गांव वालों ने मिलकर पंडों के साथ बामाचरण की कस कर पिटाई कर दी ।
उसे श्मशान में ले जाकर फेंक दिया ।
मंदिर पर पण्डों का कब्जा हो गया ।
उन्होंने शुद्धीकरण और तमाम प्रक्रियाएं की ।
उस दिन पूजन पण्डों के अनुसार संपन्न हुआ ।
उधर बामाखेपा को होश आया तो वह माई पर गुस्सा हो गया - मैंने गलत क्या किया जो तूने मुझे पिटवा दिया ।
तुझे देने से पहले खाना स्वादिष्ट है या नहीं देख रहा था ।
इसमें मेरी गलती क्या थी ?
मैं तो तुम्हें स्वादिष्ट भोग लगाने का प्रयास कर रहा था और चाहता था कि तुझे अच्छे स्वाद का प्रसाद ही मिले ।
अगर स्वाद गड़बड़ होता तो उसे फेककर दूसरा बनवाता ।
लेकिन तूने बेवजह मुझे पिटवाया जा मैं अब तेरे पास नही आऊंगा ।
मसान घाट पर बैठकर बामाचरण ने मां को सारी बातें सुना दी और वहां से उठकर चला गया जंगल की ओर ।
जंगल में जाकर एक गुफा में बैठ गया ।
यह स्थिति बिलकुल वैसे ही थी जैसे अपनी मां से रूठ कर बच्चे किसी कोने में जाकर छुप जाते हैं ।
बामाचरण और तारा माई के बीच में मां और बेटे जैसा रिश्ता था ।
यह रिश्ता बिल्कुल वैसा ही था जैसे एक अबोध शिशु और उसकी मां की बीच में होता है ।
अपने शिशु की व्यथा तारा माई को सहन नहीं हुई ।
उसी रात रानी के स्वप्न में माई प्रकट हुई ।
क्रोधित माई ने रानी को फटकार लगाई - तेरे पण्डों ने मेरे पुत्र को बुरी तरह से मारा है ।
मैं तेरा मंदिर छोड़ कर जा रही हूं ।
अब तुझे और तेरे राज्य को मेरा प्रकोप सहना पड़ेगा, अगर उससे बचना चाहती है तो कल के कल मेरे पुत्र को वापस लाकर मंदिर में पूजा का भार सौंप, वरना प्रतिफल भुगतने के लिए तैयार रह ।
एक तो तारा माई का रूप ऐसे ही भयानक है ।
क्रोधित अवस्था में तो सीधी सरल माता भी काली से कम नहीं दिखाई देती ।
क्रोधित माई का स्वरूप व्याख्या से परे था ।
रानी हड़बड़ा कर पलंग पर उठ बैठी ।
रानी के लिए रात बिताना भी मुश्किल हो गया । उसने सारी रात जागकर बिताई ।
अगले दिन अपने सेवकों को दौड़ाया और मामले का पता लगाने के लिए कहा ।
जैसे ही पूरी जानकारी प्राप्त हुई रानी अपने लाव लश्कर के साथ मंदिर पहुंच गई ।
सारे पण्डों को कसकर फटकार लगाई और मंदिर में प्रवेश से प्रतिबंधित कर दिया ।
अपने सेवकों को आदेश दिया कि जैसे भी हो बामाखेपा को पकड़कर लाओ ।
अब सारे सेवक चारों तरफ बामाखेपा की खोज में लग गए ।
एक सेवक को गुफा में बैठा हुआ बामाखेपा मिल गया ।
बड़ी मनोव्वल के बाद भी वह नहीं माना सेवक ने जाकर रानी को बात बताई ।
अंततः रानी खुद गुफा तक पहुंची ।
बामा ने उनपर भी अपना गुस्सा उतारा - आप के कहने पर मैं पूजा कर रहा था और मुझे देखो इन लोगों ने कितना मारा !
माँ और भक्त का संबंध ;
माँ तारा की उपासना में भक्त और देवी का संबंध केवल देवता और उपासक का नहीं होता।
भक्त माँ को अपने जीवन का आधार मानता है।
वह अपनी कठिनाइयाँ, भय, इच्छाएँ और दुर्बलताएँ माँ के चरणों में समर्पित करता है।
बामाखेपा की भक्ति में यही भाव प्रमुख माना जाता है।
उनकी साधना का रहस्य यह नहीं कि उन्होंने कोई चमत्कार करके संसार को जीत लिया, बल्कि यह कि उन्होंने अपने भीतर माँ के प्रति ऐसा विश्वास जगाया कि बाहरी मान - सम्मान उनके लिए गौण हो गया।
श्रीमद् देवी भागवत में भी भक्ति का महत्त्व बार - बार सामने आता है।
देवी की कृपा के लिए केवल बाहरी संपत्ति या शक्ति पर्याप्त नहीं मानी गई।
भक्तिभाव, श्रद्धा, सत्य, संयम और शरणागति को विशेष महत्त्व दिया गया है।
माँ तारा की उपासना का अर्थ है—
अपने भीतर के भय को माँ के चरणों में रख देना। इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य कर्म करना छोड़ दे।
बल्कि सच्ची भक्ति मनुष्य को अधिक धैर्यवान, करुणामय और कर्तव्यनिष्ठ बनाती है।
उनकी बाल सुलभ सहजता को देखकर रानी का नारी हृदय भी ममत्व से भर गया ।
उनकी समझ में आ गया कि तारा माई का मातृत्व इस बामाखेपा के प्रति क्यों है ।
उन्होंने फरमान जारी कर दिया - इस मंदिर का पुजारी बामाखेपा है ।
उसकी जैसी मर्जी हो जैसी विधि वह करना चाहे उस प्रकार से पूजा करने के लिए वह स्वतंत्र है ।
कोई भी उसके मार्ग में आएगा तो दंड का भागी होगा ।
यह मंदिर बामाखेपा का है और तारा माई भी बामाखेपा की है ।
वह जिस विधान को सही समझे, उस विधान से पूजा करेगा और वही विधान यहां पर सही माना जाएगा ।
बामाखेपा को तो जैसे मन मांगी मुराद मिल गई ।
मां और बेटे का मिलन हो चुका था ।
तारापीठ की परंपरा और श्मशान का रहस्य ;
तारापीठ माँ तारा की प्रसिद्ध उपासना - स्थली मानी जाती है।
वहाँ की शाक्त परंपरा में श्मशान का भी विशेष धार्मिक महत्त्व है।
श्मशान मनुष्य को जीवन की अनित्यता, शरीर के नश्वर होने और संसार के मोह से मुक्ति का स्मरण कराता है।
बामाखेपा की कथा में श्मशान - साधना का वर्णन इसी आध्यात्मिक परंपरा से जुड़ा हुआ है।
श्मशान को केवल भय का स्थान नहीं, बल्कि वैराग्य और आत्मचिंतन का स्थान माना जाता है।
देवी भागवत का तत्त्व भी यही सिखाता है कि संसार परिवर्तनशील है।
शरीर, धन, प्रतिष्ठा और भौतिक सुख स्थायी नहीं हैं।
जो शक्ति जन्म और मृत्यु दोनों को धारण करती है, वही परमशरण है।
इस लिए श्मशान का रहस्य यह नहीं कि वहाँ जाकर कोई साधक संसार से अलग हो जाता है।
वास्तविक रहस्य यह है कि मनुष्य जीवन की अनित्यता को समझकर अहंकार और मोह को कम करे।
बामाखेपा की कथा का वास्तविक संदेश ;
बामाखेपा के जीवन से जुड़ी कथाओं में उनकी माँ के प्रति अनन्य भक्ति, सरलता और सांसारिक बंधनों से विरक्ति का वर्णन मिलता है।
लोकश्रुतियों में उनके बारे में चमत्कारों की अनेक बातें भी कही जाती हैं।
किंतु इन सभी कथाओं को ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित घटना मानना उचित नहीं है।
संत की महिमा को समझने के लिए चमत्कार से अधिक उनके आध्यात्मिक संदेश पर ध्यान देना चाहिए।
बामाखेपा की भक्ति का संदेश यह है कि माँ को पाने के लिए बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि अंतःकरण की सच्चाई आवश्यक है।
मनुष्य चाहे गृहस्थ हो या साधक, उसे अपने भीतर श्रद्धा, करुणा और सत्य का विकास करना चाहिए।
श्रीमद् देवी भागवत में देवी की उपासना का उद्देश्य भी जीव को धर्म, ज्ञान और भक्ति के मार्ग पर ले जाना है।
माँ की कृपा का अर्थ केवल सांसारिक इच्छा की पूर्ति नहीं, बल्कि विवेक और आत्मज्ञान की प्राप्ति भी है।
माँ तारा की उपासना का शास्त्रोक्त अर्थ ;
माँ तारा की उपासना तांत्रिक और शाक्त परंपराओं में विभिन्न विधियों से की जाती है।
प्रत्येक साधना के अपने नियम, गुरु - परंपरा और अधिकार होते हैं।
इस लिए किसी भी गूढ़ तांत्रिक साधना को बिना योग्य गुरु के स्वयं करना उचित नहीं है।
सामान्य भक्त के लिए माँ की उपासना में श्रद्धा, स्वच्छता, सत्य, संयम, करुणा और नियमित स्मरण का महत्त्व है।
माँ की पूजा में भक्त अपने मन को शांत करके देवी के प्रति समर्पित होता है।
माँ तारा का प्रसिद्ध बीजमंत्र कई तांत्रिक परंपराओं में अलग - अलग रूप से मिलता है।
सामान्यतः तारा उपासना से संबंधित मंत्रों का उल्लेख होता है, लेकिन उनके उच्चारण, न्यास, जपसंख्या और प्रयोग के नियम गुरु - परंपरा पर निर्भर करते हैं।
इस लिए यहाँ किसी गूढ़ मंत्र को पूर्ण तांत्रिक विधि के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
देवी भागवत में देवी के नाम, स्तुति और भक्तिभाव को महत्त्व दिया गया है।
सामान्य भक्त माँ का
स्मरण करते हुए श्रद्धापूर्वक प्रार्थना कर सकता है:
हे जगदम्बे, हे आदिशक्ति, मेरे अंतःकरण से अज्ञान, भय, अहंकार और मोह को दूर करो।
मुझे सत्य, धर्म, भक्ति और विवेक का मार्ग दिखाओ।
मंदिर व्यवस्था फिर से बामाखेपा के हिसाब से चलने लगी ।
ऐसा माना जाता है कि तारा माई खुद बामाखेपा के हाथ से प्रसाद ग्रहण करती थी ।
ऐसे अद्भुत ढंग से बामाखेपा तारा माई के पूजन करते जिसका कोई नियम नहीं था ।
कभी सुबह 4 बजे पूजा चल रही है तो कभी दोपहर 12 बजे तक पूजा प्रारंभ नहीं होती ।
क़भी रात भर पूजा चल रही है तो कभी पूरे दिन भर मंदिर की ओर बामाखेपा के दर्शन ही नहीं होते थे ।
उनकी पूजन विधि लोगों को पसंद नहीं थी ,लेकिन उनके पास कोई उपाय नहीं था , क्योंकि रानी का फरमान था ।
बामाखेपा अपनी मस्ती में जीते थे और लोग उन्हें नीचा दिखाने का रास्ता खोजते ।
एक दिन बामाखेपा की मां का निधन हो गया ।
नदी में बाढ़ थी ।
नदी के उस पार गांव था ।
बामा जिद पर अड़ गए छोटी मां का दाह संस्कार बड़ी मां के पास वाले श्मशान में किया जाएगा ।
गांव वाले बाढ़ वाली नदी को पार करने में जान का खतरा है यह जानते थे , लेकिन बामा को समझाना किसी के बस की बात नहीं ।
नाव वाले से बाबा ने देह को नदी के पार पहुंचाने की बात की ।
नाव वाले ने साफ इंकार कर दिया ।
बाबा ने नाव देने के लिए कहा ।
नाव वाला हाथ जोड़कर बोला - बाबा यही मेरे जीवन का सहारा है अगर बाढ़ में यह बह गया तो मैं घर कैसे चलाउँगा ?
बामा के चेहरे में रहस्यमई मुस्कान बिखर गई ।
जैसे उन्होंने कोई निर्णय ले लिया हो ।
उन्होंने अपनी माता के शव को उठाया और खुद नदी पर चलते हुए इस पार पहुंच गए ।
गांव वाले आंखें फाड़े उस दृश्य को देखते रह गए ।
बामा की इच्छा के अनुसार ही उन्होंने माई के मंदिर के पास वाले श्मशान में अपनी मां का दाह संस्कार संपन्न किया ।
मृत्यु भोज के लिए आसपास के सारे गांव में जितने लोग हैं, सभी को निमंत्रित करने के लिए बामाखेपा ने अपने घर के लोगों और आसपास के लोगों को कहा ।
सब इसे बामाखेपा का पागलपन समझकर शांत रहें ।
जिसके पास दो वक्त की रोटी का पता नहीं वह आसपास के 20 गांव को खाना कैसे खिलाएंगा यह उनके लिए कल्पना से भी परे की बात थी ।
जब कोई भी निमंत्रण देने जाने को तैयार नहीं हुआ तो बामाखेपा अकेले निकल पड़े ।
उन्होंने आसपास के 20 गांवों में हर किसी को मृत्यु भोज के लिए आमंत्रित कर लिया ।
सारे गांव वाले यह देखने के लिए तारापीठ पहुंचने लगे कि देखा जाए यह पगला किस प्रकार से इतने सारे लोगों को मृत्यु भोज कराता है ।
गांव वालों की आंखें उस समय फटी की फटी रह गई जब सुबह से बैल गाड़ियों में भर - भर कर अनाज सब्जी आदि तारापीठ की तरफ आने लगी ।
बैल गाड़ियों का पूरा एक काफिला मंदिर के पास पहुंच गया ।
अनाज और सब्जियों का ढेर लग गया ।
जो लोग आए थे उन्होंने खाना बनाना भी प्रारंभ कर दिया ।
दोपहर होते - होते सुस्वादु भोजन की गंध से पूरा इलाका महक रहा था ।
प्रकृति भी अपना परीक्षण कब छोड़ती है, आसमान में बादल छाने लगे ।
प्रकृति ने भी उग्र रूप धारण कर लिया ।
बिजली कड़कने लगी ।
हवाएं चलने लगी और जोरदार बारिश के आसार नजर आने लगे ।
बामाखेपा अपनी जगह से उठे और जिस जगह पर श्राद्ध भोज होना था , उस पूरे जगह को बांस के डंडे से एक घेरा बनाकर घेर दिया ।
घनघोर बारिश चालू हो गई लेकिन घेरे के अंदर एक बूंद पानी भी नहीं गिरी ।
गांव वाले देख सकते थे कि वे जहां बैठकर भोजन कर रहे हैं वह पूरा हिस्सा सूखा हुआ है, और उस घेरे के बाहर पानी की मोटी मोटी बूंदें बरस रही है ।
जमीन से जल धाराएं बह रही हैं ।
वह पूरा इलाका जिसमें भोज का आयोजन था ,पूरी तरह से सूखा हुआ था ।
20 गांव से आए हुए सभी लोगों ने छक कर भोजन किया ।
हर कोई तृप्त हो गया ।
अब बारी थी वापस अपने अपने गांव जाने की ।
घनघोर बारिश को देखते हुए वापस जाने के लिए दिक्कत आएगी यह सोचकर सभी चिंतित थे ।
बामाखेपा ने माई के सामने अपना अनुरोध पेश किया और कुछ ही क्षणों में आसमान पूरी तरह से साफ हो गया और धूप खिल गई ।
सारे लोग बड़ी सहजता से अपने अपने गांव तक पहुंच गए ।
इस घटना के बाद बामाखेपा की अलौकिकता के बारे में लोगों को पता लगा ।
धीरे-धीरे लोगों की भीड़ बामाखेपा की तारा पीठ में बढ़ने लगी ।
कोई बीमार आता तो बामाखेपा उस पर हाथ फेर देते तो वह स्वस्थ हो जाता है ।
निसंतानों को संतान की प्राप्ति हो जाती और सभी आगंतुकों की इच्छा और मनोकामना तारापीठ में पूरी होने लगी ।
बामाखेपा कभी भी बिना चखे माई को भोजन नहीं कराते थे ।
माई स्वयं अपने हाथ से उनको भोजन खिलाती थी और उनके हाथों से भोजन ग्रहण करती थी ।
ऐसे अद्भुत महामानव बामाखेपा अपने अंत समय में माई की प्रतिमा में लीन हो गए ।
बड़ी माँ और भक्त का अंतिम रहस्य ;
माँ तारा को बड़ी माँ कहने का रहस्य यह है कि माता अपने भक्त को केवल सांसारिक सुख देने वाली शक्ति नहीं हैं। वे जीवन के गहरे प्रश्नों का उत्तर भी हैं।
मनुष्य दुःख में माँ को पुकारता है, भय में माँ का स्मरण करता है और संकट में माँ की शरण लेता है।
लेकिन सच्ची भक्ति तब पूर्ण होती है जब सुख में भी माँ को याद किया जाए और अपने कर्मों में धर्म का पालन किया जाए।
बामाखेपा की कथा हमें बताती है कि भक्त का प्रेम जब निष्कपट होता है, तब वह बाहरी दिखावे से ऊपर उठ जाता है।
माँ की उपासना का फल केवल चमत्कार नहीं, बल्कि अंतःकरण में परिवर्तन है।
देवी भागवत का संदेश भी यही है कि आदिशक्ति ही जगत का आधार हैं।
भक्त को उनके प्रति श्रद्धा रखनी चाहिए, अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए और ज्ञान तथा भक्ति के मार्ग पर चलना चाहिए।
अंतिम रहस्य: माँ तारा को पाने का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए माँ की शक्ति को पहचानना है।
जब मनुष्य अपने अहंकार को कम करता है, सत्य बोलता है, धर्म का पालन करता है और करुणा से जीवन जीता है, तब उसकी भक्ति माँ के तत्त्व के निकट पहुँचती है।
माँ तारा सभी भक्तों को विवेक, भक्ति, साहस और मोक्षमार्ग की प्रेरणा दें।
जय बड़ी माँ तारा। जय माँ अंबे जय माँ काली जय माँ अंबे
+++
+++
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85 Web: Sarswatijyotish.com
Email: prabhurajyguru@gmail.com
आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद..
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
+++ +++
Subscribe to:
Posts (Atom)
