सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।। आश्रमों व्यवस्था का सार ।।
श्री वैदिक ज्योतिषशास्त्रविद्या, श्री खगोलशास्त्रविद्या, श्री ऋग्वेद, श्री विष्णु पुराण सहित पुराणों के अनुसार जीवन के चार आश्रमों व्यवस्था का सार...!
🕉️🙏ओ३म् सर्वेभ्यो नमः 🙏🕉️🧘 यज्ञ योग सेवा संस्थान 🧘 आज का स्वाध्याय ✍️📖
🪔 आश्रम व्यवस्था 🪔
(एक अनुसाशन - एक सिद्धांत) 💬 भाग:-3
💯 मन वचन और कर्म से सभी परिस्थितियों में सर्वत्र और सर्वदा मैथुन का त्याग ब्रह्मचर्य है ब्रह्मचर्य किसी एक इंद्रीय का संयम नहीं है बल्कि संपूर्ण जीवन का संयम है।
साधारणता स्त्री पुरुष के समागम ( संभोग ) को ही मैथुन माना जाता है किंतु व्यापक अर्थों में मैथुन के आठ अंग है:- ⤵️
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💠 अष्टविध मैथुन 💠
1) स्मरण:- अर्थात स्त्री द्वारा पुरुष का अथवा पुरुष द्वारा स्त्री का स्मरण करना
2) गुणगान:- अर्थात एक के द्वारा दूसरे के रूप आदि की चर्चा करना
3) एक दूसरे के साथ कामवास होकर क्रीडा करना
4) काम दृष्टि से एक के द्वारा दूसरे को देखना
5) छिप-छिपकर एक दूसरे के प्रति काम भाव से बातें करना
6) एक दूसरे को हासिल करने के लिए तदर्थ(केवल इसके वास्ते) प्रयत्न करना
7) समागम (sex)का संकल्प करना
8) समागम (संभोग)।
💯 ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए मन, वचन एवं कर्म से उपयुक्त सभी आठ बातों का पूर्ण रूप से निरोध (रोकना ) करना चाहिए।
🕉️🚩 आज का वेद मंत्र 🚩🕉️
ओ३म् आ यद्धरी॑ इन्द्र॒ विव्र॑ता॒ वेरा ते॒ वज्रं॑ जरि॒ता बा॒ह्वोर्धा॑त्।
येना॑विहर्यतक्रतो अ॒मित्रा॒न्पुर॑ इ॒ष्णासि॑ पुरुहूत पू॒र्वीः ॥
भावार्थ :- सभापति आदि को उचित है कि इस प्रकार के उत्तम स्वभाव, गुण और कर्मों को स्वीकार करें कि जिससे सब मनुष्य इस कर्म को देख तथा शिष्ट होकर निष्कण्टक राज्य के सुख को सदा भोगें ॥ २ ॥
🌹🌹 *अद्भुत अलौकिक भोग*🌹🌹
एक गाँव के बाहर छोटा सा शिव मंदिर था, जिसमें एक वृद्ध पुजारी रहते थे।
एक दिन एक गरीब माँ अपने नन्हे से बालक को मंदिर के द्वार पर छोड़कर चली गई।
बहुत खोजने पर भी पुजारीजी को बालक के परिवार का कुछ भी पता न चला।
जब गाँव का भी कोई व्यक्ति उस बालक का लालन-पालन करने को तैयार न हुआ तो पुजारीजी ने भगवान् शिव की इच्छा समझकर उसे अपने पास रख लिया और उसका नाम भोला रख दिया।
गाँव के श्रद्धालु भक्तों से जो कुछ प्राप्त होता, उसी से भगवान् शिव का, पुजारीजी का और बालक भोला का किसी तरह गुजारा चलता।
यदि किसी दिन कम भी पड़ता तो पुजारीजी बालक और भगवान् को भोग लगाकर स्वयं गंगाजल पीकर रह जाते।
धीरे - धीरे भोला बड़ा होने लगा और अब वह पुजारीजी के कामों में हाथ बँटाने लगा।
वृद्ध पुजारीजी के थके-हारे हाथों को कुछ आराम मिलने लगा,
भूमिका :
सनातन धर्म में मानव जीवन को केवल जन्म और मृत्यु के बीच का समय नहीं माना गया है, बल्कि उसे आत्मा की उन्नति की एक दिव्य यात्रा बताया गया है।
ऋग्वेद, उपनिषद, विष्णु पुराण, मनुस्मृति तथा अन्य पुराणों में मानव जीवन को चार आश्रमों में विभाजित किया गया है।
इन चार आश्रमों का उद्देश्य यह है कि मनुष्य जीवन के प्रत्येक चरण में अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चार पुरुषार्थों की प्राप्ति कर सके।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार भी जन्मकुंडली और प्रश्नकुंडली में ग्रहों की स्थिति यह संकेत देती है कि व्यक्ति किस आश्रम में किस प्रकार के कर्म करेगा, कहाँ सफलता मिलेगी और किन बातों में सावधानी रखनी होगी।
यदि मनुष्य आश्रम व्यवस्था के नियमों का पालन करता है तो उसका जीवन संतुलित, सुखी और आध्यात्मिक रूप से उन्नत बनता है।
इस लिए उन्होंने भोला को मंदिर की सफाई, भगवान् शिव की पूजा, उनको भोग लगाने और उनकी आरती करने की विधि अच्छी प्रकार समझा दी।
अब वे स्वयं भगवान् शिव के नाम जप और संकीर्तन में समय व्यतीत करने लगे।
एक दिन भगवान् शिव के मंगलकारी नाम शिव, शिव, शिव शिव का जप करते हुए ही उनके प्राण छूट गए।
अब बालक भोला का इस संसार में भगवान् शिव के सिवा और कोई सहारा न रहा।
उसने पुजारीजी की ये तीन बातें कभी नहीं भूलीं...
भगवान् भोलेनाथ शिव शंकर को ताजी - गर्म रसोई का ही भोग लगाना।
भगवान् को भोग लगाए बिना स्वयं कुछ भी नहीं खाना।
भगवान् शिव पर विश्वास रख कर कभी भी किसी भी वस्तु का संग्रह न करना, बासी भोजन का भी नहीं।
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पहला आश्रम – ब्रह्मचर्य आश्रम
जीवन का प्रथम चरण ब्रह्मचर्य आश्रम कहलाता है।
सामान्यतः जन्म से लगभग 25 वर्ष तक का समय इस आश्रम में माना गया है।
इस अवधि का मुख्य उद्देश्य शिक्षा, चरित्र निर्माण, अनुशासन और आत्मसंयम है।
ऋग्वेद में ज्ञान को सबसे बड़ा धन कहा गया है।
गुरु के सान्निध्य में रहकर वेद, शास्त्र, विज्ञान, नीति, योग और सदाचार की शिक्षा ग्रहण करना ब्रह्मचर्य का प्रमुख धर्म है।
इस समय मन, वचन और शरीर को पवित्र रखना आवश्यक माना गया है।
जन्मकुंडली में यदि बृहस्पति, बुध और चंद्रमा शुभ हों तो विद्यार्थी शिक्षा, ज्ञान और संस्कार में आगे बढ़ता है।
यदि राहु, केतु या शनि की अशुभ स्थिति हो तो अध्ययन में बाधाएँ, मानसिक भ्रम या अनुशासन की कमी आ सकती है। ऐसे में गुरु का सम्मान, सरस्वती पूजन, गायत्री मंत्र का जप और नियमित अध्ययन लाभदायक माना जाता है।
यदि कोई भक्त पहले से बना भोजन या मिठाई मंदिर में दे जाता, तो बालक भोला उसे गरीबों में बाँट देता।
वह ताजी रसोई बनाकर ही भगवान् को भोग लगता, उसके बाद ही स्वयं प्रसाद ग्रहण करता और यदि बचता तो उसे बाँट देता।
यदि रसोई बनाने को सामग्री न होती, तो भोलेबाबा और भोला भगत दोनों गंगाजल पीकर ही रह जाते।
एक बार बरसात का मौसम आया और तीन-चार दिन तक मूसलाधार वर्षा होने से मंदिर में एक भी भक्त नहीं झाँका।
भोला अपने भोलेबाबा को गंगाजल का ही भोग लगाता और उसे ही पीकर रह जाता।
भोले बाबा बालक की भक्ति और सहनशक्ति की परीक्षा लेते रहे।
किंतु आखिर में अपने भक्त बालक को भूख से तड़पते देख उनसे रहा न गया।
वे सेठ के नौकर का रूप धरकर, हाथ में भोजन सामग्री की पोटली लेकर वर्षा में भीगते हुए मंदिर के द्वार पर जा पहुँचे।
उन्होंने आवाज लगाकर भोला को बुलाया और उसके हाथ में पोटली देते हुए बोले..
सेठजी ने यह सीधा ( कच्चा राशन ) भेजा है।
इससे रसोई बनाओ, भोग लगाओ और स्वयं भी प्रसाद पाओ।
मैं कल फिर आऊँगा।
भोला भगत ने आशीर्वाद देकर उसे विदा किया और सूखी-गीली लकड़ियों के धुएँ में गर्म रसोई बनाकर भोलेबाबा को भोग लगाया।
पूरे बरसात के मौसम में भोलेबाबा नौकर के वेष में भोला भगत को सीधा देने आते रहे और स्वयं भी गर्मागर्म रसोई का भोग पाते रहे।
एक दिन भोला भगत ने सोचा कि सेठजी को सीधा भेजते हुए चार महीने हो चले हैं, किंतु वे स्वयं कभी मंदिर में भोले बाबा का प्रसाद ग्रहण करने नहीं आए।
अगले दिन जब भोले बाबा नौकर के वेष में सीधे की पोटली देने आए तो भोला भगत उनसे बोला...
भाई !
तुम्हारे इतने धर्मात्मा सेठजी कभी स्वयं मंदिर में प्रसाद लेने नहीं आए।
इस कारण मेरा हृदय अत्यंत दुःखी हो रहा है।
अपने सेठजी से कहना कि कल वे भी मंदिर में प्रसाद ग्रहण करने अवश्य पधारें।
सुनकर नौकर बने भोलेबाबा चौंककर घबरा उठे और बोले...
पुजारीजी !
सेठजी मेरे द्वारा आपको सीधा भेजते हैं, आप इससे भगवान् को भी भोग लगा लेते हैं और स्वयं भी प्रसाद पाते हैं।
फिर सेठजी को बीच में बुलाने की क्या जरुरत है ?
जैसा चल रहा है, वैसे ही चलने दीजिए न..!
भोला बोला, ऐसे कैसे चलने दूँ ?
आपके धर्मात्मा सेठजी इतने दिनों से सीधा भेज रहे हैं, क्या मैं उन्हें भगवान् का प्रसाद देने का अपना कर्तव्य भी पूरा न करूँ ?
मैं किसी का उधार खाने वाला नहीं हूँ।
अपने सेठजी से कह देना कि यदि कल भोले बाबा का प्रसाद ग्रहण करने न पधारे, तो मैं उनका सीधा लेना बंद कर दूँगा।
नौकर बने भोलेबाबा तो अपने भोले भगत की अकड़ देखकर काँप उठे और यह सोचकर मन ही मन हँसे कि वाह !
आज तो लेने वाला ही देने वाले पर धौंस दिखा रहा है।
लेकिन सरल हृदय भक्त के मनोभाव पर रीझकर वे बोले, ठीक है पुजारीजी !
कल सेठजी मंदिर में प्रसाद ग्रहण करने जरूर पधारेंगे।
दूसरे दिन बड़े सबेरे ही भोलेबाबा नौकर के वेष में दूध और बहुत सारी भोजन सामग्री लेकर मंदिर पहुँच गए।
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दूसरा आश्रम – गृहस्थ आश्रम :
लगभग 25 से 50 वर्ष तक का जीवन गृहस्थ आश्रम माना जाता है।
यह आश्रम समाज और परिवार की नींव है।
विवाह, संतान, माता - पिता की सेवा, अतिथि सत्कार, दान, धर्म और आजीविका का उत्तरदायित्व इसी आश्रम में निभाया जाता है।
विष्णु पुराण में गृहस्थ को सभी आश्रमों का आधार कहा गया है क्योंकि गृहस्थ ही अपने परिश्रम से समाज, साधु-संतों, विद्यार्थियों और वृद्धों का पालन करता है।
ज्योतिष के अनुसार सप्तम भाव विवाह का, चतुर्थ भाव गृह का, पंचम भाव संतान का तथा दशम भाव कर्म का प्रतिनिधित्व करता है।
यदि इन भावों के स्वामी शुभ हों तो गृहस्थ जीवन सुखी रहता है।
यदि मंगल, शनि, राहु या केतु से पीड़ा हो तो वैवाहिक जीवन में तनाव, आर्थिक कठिनाई या पारिवारिक मतभेद उत्पन्न हो सकते हैं।
इस आश्रम का मूल संदेश है कि धन कमाओ, लेकिन धर्मपूर्वक कमाओ; परिवार चलाओ, लेकिन ईश्वर को मत भूलो।
भोला चौंकते हुए बोला, भाई !
आज इतना सारा सीधा किसलिए ले आए ?
नौकर बने भोलेबाबा बोले,
पुजारीजी !
तीसरा आश्रम – वानप्रस्थ आश्रम
लगभग 50 से 75 वर्ष की आयु तक का समय वानप्रस्थ आश्रम माना गया है। इसका अर्थ केवल जंगल में चले जाना नहीं है, बल्कि धीरे-धीरे सांसारिक मोह से ऊपर उठना है।
इस अवस्था में मनुष्य अपनी संतान को जिम्मेदारियाँ सौंपकर स्वयं अधिक समय धर्म, ध्यान, सत्संग, तीर्थयात्रा, स्वाध्याय और समाज सेवा में लगाता है।
जन्मकुंडली में नवम भाव धर्म, भाग्य और गुरु का प्रतिनिधित्व करता है।
द्वादश भाव मोक्ष, तप और त्याग का प्रतीक है।
यदि इन भावों की स्थिति शुभ हो तो व्यक्ति का मन स्वतः आध्यात्मिकता की ओर आकर्षित होता है।
विष्णु पुराण के अनुसार इस अवस्था में लोभ, क्रोध, अहंकार और अत्यधिक संग्रह की प्रवृत्ति का त्याग करना चाहिए।
यही जीवन की वास्तविक तैयारी है।
भूल गए क्या ?
आज आपने सेठजी को प्रसाद के लिए बुलाया है।
इसलिए आप छककर रसोई बनाइए और भोलेबाबा को भोग लगाइए।
हाँ !
यह तो बता दीजिए कि सेठजी किस समय पधारें ?
भोला ने प्रसन्न होकर उन्हें सेठजी के आने का समय बता दिया।
अब भोलाभगत की इच्छा पूर्ण करने के लिए भोलेबाबा कैलाश पर सेठ का रूप धारण करने लगे।
इधर अपने स्वामी को एक प्यारे भक्त के यहाँ जीमने जाने का समाचार सुनकर ममतामयी अन्नपूर्णा माँ पार्वती भी भला कैसे पीछे रहतीं ?
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चौथा आश्रम – संन्यास आश्रम
जीवन का अंतिम चरण संन्यास आश्रम कहलाता है।
इसका उद्देश्य संसार से भागना नहीं, बल्कि परमात्मा में पूर्ण समर्पण करना है।
संन्यासी के लिए सभी प्राणी समान होते हैं।
उसके मन में न किसी के प्रति द्वेष होता है और न ही किसी वस्तु का मोह।
वह सत्य, करुणा, क्षमा, अहिंसा और ईश्वर भक्ति में जीवन व्यतीत करता है।
ज्योतिष में द्वादश भाव, केतु और बृहस्पति का विशेष संबंध मोक्ष से माना गया है।
यदि इनका शुभ प्रभाव हो तो व्यक्ति में वैराग्य और आत्मज्ञान की भावना प्रबल होती है।
पुराणों में कहा गया है कि जिसने अपने जीवन के चारों आश्रमों को धर्मपूर्वक पूरा किया, वह मोक्ष का अधिकारी बनता है।
वे भी पति की आज्ञा लेकर सेठानी का रूप धारण करने में जुट गईं।
भोलेबाबा ने अपने गले से मुंडों की माला उतार दी, शरीर पर लगी भस्म, कमर पर पहना हुआ बाघांबर और बाँहों और कानों में पहने साँपों के हार भी उतारकर रख दिए।
उन्होंने एक मखमल का सुंदर कुर्ता धारण कर लिया।
अपनी जटाएँ सीधी कर गंगा और चंद्रमा को उसमें छिपा लिया और ऊपर से एक सुंदर रंग-बिरंगी पगड़ी पहन ली।
सदैव नंगे पैर विचरण करने वाले शिवजी ने आज अपने पैरों में रेशमी जूतियाँ धारण कर लीं।
हाथ का त्रिशूल और डमरू भोलेबाबा ने नंदी के हाथ में थमा दिया और अपने हाथ में एक सुंदर छड़ी लेकर पार्वतीजी के तैयार होने की प्रतीक्षा करते हुए कैलाश पर चहलकदमी करने लगे।
इधर पार्वतीजी घंटों से मेकअप करने में जुटी हुईं थीं।
उन्होंने आज अपने पतिदेव के नगर में बनी सुंदर बनारसी साड़ी निकालकर पहनी, जिसका रंग सेठ बने शिवजी के कुर्ते से मैच कर रहा था।
उन्होंने सोने-चाँदी-हीरे के जगमगाते हुए आभूषण धारण कर लिए, पैरों में सुंदर सेंडल पहन लीं, बगल में सुंदर-सा पर्स दबा लिया और भोले बाबा के बार-बार आवाज लगाने के बाद शृंगार कक्ष से बाहर निकलकर आईं।
जब पार्वतीजी और शिवजी ने एक-दूसरे को सेठ-सेठानी के वेष में देखा, तो वे चकित होकर एक-दूसरे को निहारते ही रह गए।
दोनों एक-दूसरे को देख-देखकर निहाल हुए जा रहे थे।
इससे पहले उन्होंने कभी एक-दूसरे का ऐसा सुंदर रूप देखा ही नहीं था।
जब भगवान् गौरीशंकर सेठानी-सेठ का रूप धरकर कैलाश से अपने भक्त के यहाँ दावत उड़ाने चले, तो गणेश, कार्तिकेय, नंदी, ऋषि - मुनि, देवता, देवांगनाएँ भी उन्हें देखकर ठगे से रह गए।
सेठ बने शिवजी अपने हाथ में ली हुई छड़ी को अदा से घुमाते हुए पृथ्वी पर टेकते हुए चल रहे थे...
और उनके पीछे-पीछे बगल में पर्स दबाए, अपनी सेंडल से टक-टक और पायलों से छन-छन की मधुर ध्वनि करती हुई माँ पार्वती सेठानी बनी हुई चल रही थीं।
इधर भोला भगत आज सुबह से ही सेठजी के स्वागत में भाँति-भाँति के पकवान बनाने में जुटा हुआ था।
अपने भोलेबाबा का भोग तो वह चलते-फिरते बना लेता था, किंतु आज उसे कई महीने से भगवान् को भोग लगाने के लिए सीधा भेजने वाले सेठजी को भगवत्प्रसाद देना था,
अतः आज उसने अपनी सारी पाककला झोंक डाली थी।
उसने सेठजी द्वारा भेजे हुए चावल धोकर खीर बनाई, उसे धीमी आँच पर पकाकर गाढ़ा किया और उसमें सेठजी के द्वारा भेजे हुए पिस्ते, बादाम, केसर, चिलगोजे, किशमिश डाले।
मिर्च और अदरख को कूटकर, उसे बाजरा, बेसन और गेहूँ के आटे में भर-भरकर मोटे-मोटे मिस्से टिक्कड़ बनाए।
रसोई बनाकर भोला भगत पुनः स्नान करने चला गया ताकि स्वच्छ वस्त्र पहनकर भोले बाबा को भोग लगा सके और सेठजी को उनका प्रसाद पवा सके।
जब भोला भगत स्नान करके लौटा तो देखा सेठजी प्रसाद ग्रहण करने के लिए स्वयं तो आए ही हैं, संग में अपनी सेठानीजी को भी ले आए हैं।
भोला ने झट दोनों से राम-राम की, उन्हें आसन देकर बैठाया और बोला...
मैं अभी भगवान् को भोग लगाकर आता हूँ, फिर आपको प्रसाद परोसूँगा।
भावना के भूखे भोलेबाबा से भूख सहन नहीं हो पा रही थी।
इसलिए वे बोले..
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पुजारीजी !
भगवान् को जल्दी से भोग लगाइए, मुझसे भूख सहन नहीं होती।
भोला भगत बोला, सेठजी !
भूख तो मुझे भी बड़े जोर से लग रही है, किंतु मैं अपनी भूख के कारण भगवान् को भोग लगाना नहीं भूलता।
यदि दुनिया के सारे लोग इसी तरह अपनी भूख के लिए भगवान् को भोग लगाना भूल जाएँ तो भगवान् तो भूखों मर जाएँगे।
सेठजी बने भोलेबाबा एक पत्तल उठाते हुए बोले, पुजारीजी !
आप भोग लगाइए।
इधर मैं पत्तल परोस लेता हूँ।
मुझसे भूख सहन नहीं हो पा रही है।
भोला भगत सेठजी बने भोलेबाबा को डाँटते हुए बोला, सेठजी !
भगवान् के काम में न तो जल्दीबाजी चलती है और न कंजूसी।
मैं जब तक भगवान् को भोग नहीं लगा लेता, आप रसोई के पास भी नहीं फटक सकते।
चुपचाप इधर बैठ जाइए और ॐ नमः शिवाय जपते रहिए।
मैं अभी आता हूँ और आपको पेट भर भोजन कराता हूँ।
सेठ बने शिवजी डाँट खाकर चुपचाप अपने आसन पर जा बैठे।
सेठानी बनी पार्वती उनकी यह दशा देख बड़ी मुश्किल से अपनी हँसी रोक पाईं।
लेकिन जैसे ही भोला भगत पत्तल में सामग्री लेकर भगवान् को भोग लगाने मंदिर में गया...
शिवजी पार्वतीजी को मौन रहने का संकेत करते हुए चुपके-चुपके पैर रखते हुए रसोई में पहुँच गए और उन्होंने एक-एक व्यंजन उठाकर चखना शुरू कर दिया।
भोलेबाबा तो प्रसाद को चखते ही भौंचक्के रह गए...
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खीर में चीनी की जगह नमक भरा हुआ था और सब्जियों में चीनी भरी हुई थी।
जैसे ही भोले बाबा ने रोटी का एक ग्रास तोड़कर मुँह में दिया, वे सी-सी करने लगे, क्योंकि रोटी में मिर्च ही मिर्च भरी थी।
वे सी-सी करते हुए उल्टे पैर भाग आए और अपने आसन पर जा बैठे।
माँ पार्वती अपने स्वामी की यह हालत देखकर खिलखिलाकर हँस पड़ीं।
इससे पहले कि भोलेबाबा पार्वती जी के सामने कुछ सफाई दे पाते, भोला भगत ॐ नमः शिवाय मंत्र का जप करते हुए आ पहुँचा।
उसने भोग को रसोई में मिलाकर उसे पवित्र बना डाला और फिर सेठजी के सामने पत्तल परोसकर हाथ जोड़कर बोला...
सेठजी !
अब आप जी भरकर प्रसाद पाइए।
भोलेबाबा तो अभी-अभी भक्त की भक्ति से भी जोरदार उसके हाथ की बनी हुई रसोई चख चुके थे, अतः उसे जीमने की बात सुनकर उनके पसीने छूटने लगे।
कभी वे भोला का तो कभी पार्वती का मुख देखने लगते।
भोला को सेठजी की ढील बर्दाश्त नहीं हुई और बोला, सेठजी !
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अब क्या हो गया आपको ?
अभी-अभी तो इतनी उतावली मचा रहे थे ?
अब क्यों नहीं जीमते ?
आप जीमोगे, तभी तो माताजी भी प्रसाद ग्रहण करेंगीं और फिर मैं भी प्रसाद पाऊँगा।
भोला की ललकार सुनकर भोलेबाबा ने चुपचाप खीर का कुल्हड़ उठाया और सारी नमकीन खीर गटागट पी गए।
कुल्हड़ खाली होने की देर थी कि भोला ने उसे झट से भर दिया।
अपने प्रिय भक्त के हाथों परोसे हुए भोग में भगवान् को आज दुगना स्वाद आने लगा।
भोला परोसता गया और भोलेबाबा पीते गए।
जगन्माता पार्वती भक्त और भगवान् दोनों के प्रेम को देख-देखकर मंत्रमुग्ध होती रहीं।
जब सारी रसोई समाप्त हो गई तो भगवान् ने एक जोर की डकार ली।
भोला को होश आया और बोला, वाह सेठजी वाह !
मैं ही बावला था, जो इतनी थोड़ी-सी रसोई बनाई।
मुझे पता होता कि आपको प्रसाद ग्रहण करने का इतना शौक है, तो और भी ज्यादा रसोई बनाता।
भोलेबाबा अपने पेट पर हाथ फेरते हुए सेठानी बनी पार्वतीजी की ओर मुस्कराकर देखते हुए बोले...
पुजारीजी !
मैं इतना रोज कहाँ खाता हूँ ?
किंतु आज प्रसाद इतना स्वादिष्ट बना था कि अपने पर वश ही नहीं रहा और खाता ही चला गया।
किंतु तभी भोला भक्त रुआँसा होकर बोला...
सेठजी !
वह तो आपने ठीक किया।
लेकिन माताजी तो भूखी ही रह गईं।
ममतामयी पार्वती माँ से भोला का रुआँसा मुख देखा नहीं गया।
उन्होंने बची हुई खीर की चार बूँदें अपने कंठ में टपका लीं।
भोलेबाबा द्वारा भोग लगाने से प्रसाद में अद्भुत अलौकिक स्वाद भर गया था।
ऐसी सुगंधित और मीठी खीर चखकर जगज्जननी आकंठ तृप्त हो गईं और उनके तृप्त होते ही सृष्टि का प्रत्येक प्राणी तृप्त हो गया।
भोला भगत बोला,
सेठजी !
आपने और माताजी ने प्रसाद ग्रहण कर लिया, इससे मुझे अत्यंत संतोष हुआ है।
समझ लीजिए कि आप दोनों द्वारा प्रसाद ग्रहण करने से मेरा भी पेट भर गया।
मेरी तो वैसे भी महीने में चार-चार एकादशी हो जाती हैं।
किंतु मैं भी एक दाना ले ही लेता हूँ, जिससे कि भोलेबाबा के प्रसाद का अनादर न हो।
यह कहकर जैसे ही भोला ने खीर के पात्र में लगा चावल का एक दाना उठाकर अपने कंठ में डाला...
उसकी जन्म जन्मान्तर की भूख-प्यास मिट गई और समस्त वासनाओं और इच्छाओं की तृप्ति हो गई।
उसके ज्ञान के नेत्र खुल गए और उसने देखा कि उसके सम्मुख त्रिलोकीनाथ भगवान् शंकर और जगज्जननी माँ पार्वती आशीर्वाद की मुद्रा में मुस्कराते हुए खड़े हैं।
भोला दौड़कर उनके चरणों में लोट गया।
लोटता गया, लोटता गया..
और उन्हीं में समा गया।
*🌹‼शिव शिव शिव शिव शिव ‼*🌹
हर हर महादेव हर
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