।। श्री विष्णुपुराण प्रवचन ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्री विष्णुपुराण  प्रवचन ।।


( अति शुभ मोली ( रक्षा सूत्र )    


                          मित्रों आज हम आपको मौली या कलावा का महत्व प्रस्तुत प्रस्तुति में बतायेगें!!!!!

मौली बांधना वैदिक परंपरा का हिस्सा है। 







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यज्ञ के दौरान इसे बांधे जाने की परंपरा तो पहले से ही रही है, लेकिन इसको संकल्प सूत्र के साथ ही रक्षा-सूत्र के रूप में तब से बांधा जाने लगा, जबसे असुरों के दानवीर राजा बलि की अमरता के लिए भगवान वामन ने उनकी कलाई पर रक्षा - सूत्र बांधा था।

 इसे रक्षाबंधन का भी प्रतीक माना जाता है, ‍जबकि देवी लक्ष्मी ने राजा बलि के हाथों में अपने पति की रक्षा के लिए यह बंधन बांधा था। 

मौली को हर हिन्दू बांधता है। 

इसे मूलत: रक्षा सूत्र कहते हैं। 

मौली का अर्थ ,,,,,

मौली' का शाब्दिक अर्थ है 'सबसे ऊपर'। 

मौली का तात्पर्य सिर से भी है। मौली को कलाई में बांधने के कारण इसे कलावा भी कहते हैं। 

इसका वैदिक नाम उप मणिबंध भी है। मौली के भी प्रकार हैं। 

शंकर भगवान के सिर पर चन्द्रमा विराजमान है इसीलिए उन्हें चंद्रमौली भी कहा जाता है। 

कैसी होती है मौली? 

मौली कच्चे धागे ( सूत ) से बनाई जाती है जिसमें मूलत: 3 रंग के धागे होते हैं- लाल, पीला और हरा, लेकिन कभी-कभी यह 5 धागों की भी बनती है जिसमें नीला और सफेद भी होता है। 

3 और 5 का मतलब कभी त्रिदेव के नाम की, तो कभी पंचदेव। 

कहां-कहां बांधते हैं मौली? 

 मौली को हाथ की कलाई, गले और कमर में बांधा जाता है। 

इसके अलावा मन्नत के लिए किसी देवी-देवता के स्थान पर भी बांधा जाता है और जब मन्नत पूरी हो जाती है तो इसे खोल दिया जाता है। 

इसे घर में लाई गई नई वस्तु को भी बांधा जाता और इसे पशुओं को भी बांधा जाता है।

 मौली बांधने के नियम ,,,,,

शास्त्रों के अनुसार पुरुषों एवं अविवाहित कन्याओं को दाएं हाथ में कलावा बांधना चाहिए। 

विवाहित स्त्रियों के लिए बाएं हाथ में कलावा बांधने का नियम है। 

कलावा बंधवाते समय जिस हाथ में कलावा बंधवा रहे हों, उसकी मुट्ठी बंधी होनी चाहिए और दूसरा हाथ सिर पर होना चाहिए। 

मौली कहीं पर भी बांधें, एक बात का हमेशा ध्यान रहे कि इस सूत्र को केवल 3 बार ही लपेटना चाहिए व इसके बांधने में वैदिक विधि का प्रयोग करना चाहिए। 

कब बांधी जाती है मौली? 

 पर्व-त्योहार के अलावा किसी अन्य दिन कलावा बांधने के लिए मंगलवार और शनिवार का दिन शुभ माना जाता है। 

हर मंगलवार और शनिवार को पुरानी मौली को उतारकर नई मौली बांधना उचित माना गया है। 

उतारी हुई पुरानी मौली को पीपल के वृक्ष के पास रख दें या किसी बहते हुए जल में बहा दें। 

प्रतिवर्ष की संक्रांति के दिन, यज्ञ की शुरुआत में, कोई इच्छित कार्य के प्रारंभ में, मांगलिक कार्य, विवाह आदि हिन्दू संस्कारों के दौरान मौली बांधी जाती है। 

क्यों बांधते हैं मौली? 

मौली को धार्मिक आस्था का प्रतीक माना जाता है। 

किसी अच्छे कार्य की शुरुआत में संकल्प के लिए भी बांधते हैं। 

किसी देवी या देवता के मंदिर में मन्नत के लिए भी बांधते हैं। 

मौली बांधने के 3 कारण हैं- 

पहला आध्यात्मिक, 

दूसरा चिकित्सीय 

और 

तीसरा मनोवैज्ञानिक। 

किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करते समय या नई वस्तु खरीदने पर हम उसे मौली बांधते हैं ताकि वह हमारे जीवन में शुभता प्रदान करे। 

हिन्दू धर्म में प्रत्येक धार्मिक कर्म यानी पूजा-पाठ, उद्घाटन, यज्ञ, हवन, संस्कार आदि के पूर्व पुरोहितों द्वारा यजमान के दाएं हाथ में मौली बांधी जाती है। 

इसके अलावा पालतू पशुओं में हमारे गाय, बैल और भैंस को भी पड़वा, गोवर्धन और होली के दिन मौली बांधी जाती है।

 मौली करती है रक्षा ,,,,

मौली को कलाई में बांधने पर कलावा या उप मणिबंध करते हैं। 

हाथ के मूल में 3 रेखाएं होती हैं जिनको मणिबंध कहते हैं। 

भाग्य व जीवनरेखा का उद्गम स्थल भी मणिबंध ही है। 

इन तीनों रेखाओं में दैहिक, दैविक व भौतिक जैसे त्रिविध तापों को देने व मुक्त करने की शक्ति रहती है। 

इन मणिबंधों के नाम शिव, विष्णु व ब्रह्मा हैं। 

इसी तरह शक्ति, लक्ष्मी व सरस्वती का भी यहां साक्षात वास रहता है। 

जब हम कलावा का मंत्र रक्षा हेतु पढ़कर कलाई में बांधते हैं तो यह तीन धागों का सूत्र त्रिदेवों व त्रिशक्तियों को समर्पित हो जाता है जिससे रक्षा-सूत्र धारण करने वाले प्राणी की सब प्रकार से रक्षा होती है। 

इस रक्षा-सूत्र को संकल्पपूर्वक बांधने से व्यक्ति पर मारण, मोहन, विद्वेषण, उच्चाटन, भूत-प्रेत और जादू-टोने का असर नहीं होता। 

आध्यात्मिक पक्ष ,,,,

शास्त्रों का ऐसा मत है कि मौली बांधने से त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु व महेश तथा तीनों देवियों- लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है। 

ब्रह्मा की कृपा से कीर्ति, विष्णु की कृपा से रक्षा तथा शिव की कृपा से दुर्गुणों का नाश होता है। 

इसी प्रकार लक्ष्मी से धन, दुर्गा से शक्ति एवं सरस्वती की कृपा से बुद्धि प्राप्त होती है। 

यह मौली किसी देवी या देवता के नाम पर भी बांधी जाती है जिससे संकटों और विपत्तियों से व्यक्ति की रक्षा होती है। 

यह मंदिरों में मन्नत के लिए भी बांधी जाती है। 

इसमें संकल्प निहित होता है। 




मौली बांधकर किए गए संकल्प का उल्लंघन करना अनुचित और संकट में डालने वाला सिद्ध हो सकता है। 

यदि आपने किसी देवी या देवता के नाम की यह मौली बांधी है तो उसकी पवित्रता का ध्यान रखना भी जरूरी हो जाता है। 

कमर पर बांधी गई मौली के संबंध में विद्वान लोग कहते हैं कि इससे सूक्ष्म शरीर स्थिर रहता है और कोई दूसरी बुरी आत्मा आपके शरीर में प्रवेश नहीं कर सकती है। 

बच्चों को अक्सर कमर में मौली बांधी जाती है। 

यह काला धागा भी होता है। 

इससे पेट में किसी भी प्रकार के रोग नहीं होते।

 चिकित्सीय पक्ष ,,,,

प्राचीनकाल से ही कलाई, पैर, कमर और गले में भी मौली बांधे जाने की परंपरा के ‍चिकित्सीय लाभ भी हैं। 

शरीर विज्ञान के अनुसार इससे त्रिदोष अर्थात वात, पित्त और कफ का संतुलन बना रहता है। 

पुराने वैद्य और घर-परिवार के बुजुर्ग लोग 

हाथ, कमर, गले व पैर के अंगूठे में मौली का उपयोग करते थे, जो शरीर के लिए लाभकारी था।

ब्लड प्रेशर, हार्टअटैक, डायबिटीज और लकवा जैसे रोगों से बचाव के लिए मौली बांधना हितकर बताया गया है। 

हाथ में बांधे जाने का लाभ ,,, 

शरीर की संरचना का प्रमुख नियंत्रण हाथ की कलाई में होता है अतः यहां मौली बांधने से व्यक्ति स्वस्थ रहता है। 

उसकी ऊर्जा का ज्यादा क्षय नहीं होता है। 

शरीर विज्ञान के अनुसार शरीर के कई प्रमुख अंगों तक पहुंचने वाली नसें कलाई से होकर गुजरती हैं। 

कलाई पर कलावा बांधने से इन नसों की क्रिया नियंत्रित रहती है। 

 कमर पर बांधी गई मौली के संबंध में विद्वान लोग कहते हैं कि इससे सूक्ष्म शरीर स्थिर रहता है और कोई दूसरी बुरी आत्मा आपके शरीर में प्रवेश नहीं कर सकती है। 

बच्चों को अक्सर कमर में मौली बांधी जाती है। 

यह काला धागा भी होता है। 

इससे पेट में किसी भी प्रकार के रोग नहीं होते। 

मनोवैज्ञानिक लाभ ,,,,

मौली बांधने से उसके पवित्र और शक्तिशाली बंधन होने का अहसास होता रहता है और इससे मन में शांति और पवित्रता बनी रहती है। 

व्यक्ति के मन और मस्तिष्क में बुरे विचार नहीं आते और वह गलत रास्तों पर नहीं भटकता है। 

कई मौकों पर इससे व्यक्ति गलत कार्य करने से बच जाता है।

             !!शुभमस्तु!!

जय श्री कृष्ण

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Ramanatha Swami Covil Car Parking Ariya Strits , nr. Maghamaya Amman Covil Strits , V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 WHATSAPP नंबर : + 91 7598240825 ( तमिलनाडु )
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

काशी के कोतवाल काल भैरव !

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........

जय द्वारकाधीश

|| काशी के कोतवाल काल भैरव ||

काशी के कोतवाल काल भैरव 

जब अंग्रेज अधिकारी की रूह कांप गई!  

काल भैरव का सबसे बड़ा रहस्य | 

1853 की सच्ची घटना!

क्या आप जानते हैं कि सन 1853 में काशी की पावन धरती पर एक ऐसी रहस्यमयी घटना घटी थी जिसने एक अहंकारी अंग्रेज अधिकारी के होश उड़ा दिए थे? 

बात उन दिनों की है जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी कर्नल विल्सन ने काशी के प्रसिद्ध मंदिर और काल भैरव की शक्तियों को चुनौती देने की भूल की थी।

सनातन धर्म और इतिहास के पन्नों में दर्ज यह घटना इस बात का प्रमाण है कि जब अहंकार अपनी सीमा लांघता है, तब काल भैरव इतिहास और काशी का रहस्य खुद अपनी गवाही देता है। 

ठीक दोपहर के 12:00 बजे, समय अचानक थम सा गया। 

कर्नल विल्सन की जेब में रखी पुरानी विक्टोरियन घड़ी की सुइयां उसी पल पर जाम हो गईं और उसके सामने प्रकट हुई भगवान शिव के रौद्र रूप यानी काल भैरव की वो अकल्पनीय शक्ति, जिसने पलभर में उसका सारा घमंड चकनाचूर कर दिया।

यह 1853 का इतिहास आज भी हमें यह सिखाता है कि प्रकृति और देव शक्तियों के आगे किसी की नहीं चलती है।

बिजली महादेव मंदिर,हिमाचल प्रदेश में कुल्लू से लगभग 24 किमी दूर काशवारी गाँव में 2,460 मीटर की ऊँचाई पर स्थित एक प्राचीन मंदिर है। 

यह अपने चमत्कारी शिवलिंग के लिए प्रसिद्ध है, जिस पर हर 12 साल में आकाशीय बिजली गिरती है और पुजारी इसे मक्खन के लेप से जोड़ते हैं।

कुल्लू घाटी में प्राचीन समय में कुलान्त नाम का एक दुष्ट राक्षस रहता था, जो अत्यंत मायावी था। एक बार उसने पूरी घाटी को जलमग्न ( पानी में डुबोने ) करने की योजना बनाई। 

इसके लिए उसने एक विशाल अजगर का रूप धारण किया और व्यास नदी के प्रवाह को रोकने के लिए कुंडली मारकर बैठ गया, ताकि घाटी में पानी भर जाए और सभी जीव-जंतु और मनुष्य मर जाएं।

जब भगवान शिव को इस दुष्टता का पता चला,तो उन्होंने इसे रोकने का निश्चय किया। 

शिव जी ने राक्षस को अपनी माया से भ्रमित कर दिया और उसके कान में धीरे से कहा कि उसकी पूंछ में आग लगी है। 

जैसे ही कुलान्त अपनी पूंछ देखने के लिए मुड़ा, शिव जी ने अपने त्रिशूल से उसका वध कर दिया।

राक्षस का शरीर इतना विशाल था कि वह एक ऊंचे पहाड़ में बदल गया, और मान्यता है कि आज की पूरी कुल्लू घाटी उसी का मृत शरीर है।

राक्षस के वध के बाद, शिव जी ने इंद्र देव को आदेश दिया कि वे हर 12 साल में एक बार उस स्थान पर भयंकर आकाशीय बिजली गिराएं। 

भगवान शिव नहीं चाहते थे कि बिजली गिरने से किसी व्यक्ति या संपत्ति की हानि हो, इसलिए उन्होंने उस प्रहार को स्वयं अपने ऊपर लेना स्वीकार किया।

जब बिजली शिवलिंग पर गिरती है, तो वह कई टुकड़ों में टूट ( चकनाचूर हो ) जाता है। 

इस के बाद मंदिर के पुजारी खंडित शिवलिंग के टुकड़ों को मक्खन के लेप से वापस जोड़ते हैं। 

कुछ समय बाद शिवलिंग अपने आप फिर से ठोस रूप धारण कर लेता है।

स्थानीय निवासियों का दृढ़ विश्वास है कि भगवान शिव स्वयं पर बिजली गिरवाकर पूरे कुल्लू क्षेत्र की रक्षा करते हैं। 

इसी कारण उन्हें "बिजली महादेव" कहा जाता है। 

आज भी, हर कुछ वर्षों में यहाँ बिजली गिरने की घटना होती है, जिसे देखने और भगवान शिव के इस चमत्कार को महसूस करने के लिए हज़ारों श्रद्धालु आते हैं।

देवशयनी एकादशी व्रत कथा  ?

देवशयनी एकादशी व्रत की कथा: हिंदू धर्म में देवशयनी एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। 

इस बार देवशयनी एकादशी व्रत को है। 

एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा - 

हे केशव! आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? 

इस व्रत की क्या विधि है और किस देवता के पूजन का विधान है? 

श्री कृष्ण कहने लगे कि हे युधिष्ठिर! जिस कथा को ब्रह्मा जी ने नारद जी को सुनाया था वहीं मैं तुमसे कहता हूं। 

एक बार नारद जी ने भी ब्रह्मा जी से यही प्रश्न किया था।

तब ब्रह्मा जी ने उत्तर दिया था कि हे नारद तुमने कलियुगी जीवों के उद्धार के लिए बहुत अच्छा प्रश्न किया है। 

क्योंकि देवशयनी एकादशी का व्रत सभी व्रतों में उत्तम है। 

व्रत के पु्ण्य प्रभाव से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

ये भी पढ़ें:देवशयनी एकादशी व्रत रखने से क्या फल मिलता है?

देवशयनी एकादशी व्रत की कथा इस प्रकार है:

प्राचीन काल में मांधाता नाम के एक चक्रवर्ती राजा राज्य करते थे। 

वे सत्यवादी, धर्मपरायण, महान प्रतापी और प्रजा के हितों के लिए कार्य करने वाले थे। 

उनके राज्य में प्रजा हमेशा सुखी और धन - धान्य से परिपूर्ण रहती थी। 

उनके राज्य में कभी अकाल नहीं पड़ता था।

1. राज्य में भयंकर पड़ा अकाल:

एक बार राजा मांधाता के राज्य में लगातार तीन वर्षों तक बारिश नहीं हुई। 

बारिश नहीं होने के कारण पूरे राज्य में भयंकर अकाल पड़ गया। 

राज्य में अन्न - जल के अभाव में प्रजा बहुत परेशान रहने लगी। 

अन्न और जल नहीं होने के कारण राज्य में यज्ञ, हवन, पूजन और धार्मिक अनुष्ठान बंद हो गए, राज्य और प्रजा की इस स्थिति को देखकर राजा अत्यंत चिंतित हो गए। 

एक दिन प्रजा राजा के पास जाकर कहने लगी कि राजन पूरा प्रजा परेशान हो रही है क्योंकि सृष्टि का कल्याण वर्षा से होता है। 

वर्षा के अभाव में अकाल पड़ गया है और प्रजा मर रही है। 

इस लिए हे राजन! कोई ऐसा उपाय बताओ जिससे यह दुख दूर हो सके।

राजा मांधाता ने प्रजा की बात सुनकर विचार किया कि अगर उन्होंने कभी कोई गलत काम नहीं किया तो, फिर भी उनकी प्रजा को इतनी परेशानी या कष्ट क्यों भोगने पड़ रहे हैं। 

इस परेशानी का हल खोजने के लिए राजा अपनी सेना के साथ जंगल की ओर निकल पड़े।

महर्षि अंगिरा के पहुंचे आश्रम वन में घूमते हुए राजा मांधाता ब्रह्मा जी के पुत्र महर्षि अंगिरा के आश्रम में पहुंचे। राजा ने घोड़े से उतरकर महर्षि को प्रणाम किया। 

महर्षि अंगिरा ने राजा से उनके वहां आने का कारण पूछा। 

तब राजा ने विनम्र भाव से हाथ जोड़कर कहा कि हे ऋषिवर! 

मैं हमेशा से ही धर्म का पालन करता आया हूं, फिर भी मेरे राज्य में तीन वर्षों से अकाल पड़ा हुआ है।

प्रजा घोर कष्ट में है। 

राजा के पापों से ही प्रजा को कष्ट होता है, ऐसा शास्त्रों में वर्णित है। 

कृपया मुझे कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरी प्रजा का कष्ट दूर हो सके। 

धर्म के अनुसार राज्य में काम करता हूं फिर भी अकाल कैसे पड़ा इसका कारण मुझे अभी तक नहीं मिल सका।

राजा ने कहा कि मैं आपके पास इसी संदेह को दूर कराने के लिए आया हूं। 

कृपा मेरे इस संदेह को दूर कीजिए। 

राजा की बात सुनकर महर्षि अंगिरा ने कहा- 

"हे राजन्! आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम देवशयनी एकादशी ( हरिशयनी एकादशी ) है। 

यह एकादशी सभी पापों से मुक्ति दिलाने वाली और सब प्रकार की सिद्धियों को प्रदान कराने वाली है। 

आप अपनी प्रजा और मंत्रियों सहित इस एकादशी का विधि - विधान से व्रत और पूजन करें। 

भगवान विष्णु की कृपा से आपके राज्य में उत्तम वर्षा होगी और अकाल दूर हो जाएगा।

राज्य में हुई मूसलाधार वर्षा- 

महर्षि अंगिरा से व्रत का विधान जानने के बाद राजा मांधाता अपने राज्य वापस लौट आए। 

उन्होंने आषाढ़ शुक्ल एकादशी पर प्रजा और मंत्रियों के साथ पूरे भक्ति - भाव और श्रद्धा के साथ विधि - विधान से देवशयनी एकादशी का व्रत किया और भगवान विष्णु की उपासना की। 

राजा से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए। एकादशी का व्रत पूर्ण होते ही राज्य में मूसलाधार बारिश हुई।

बारिश के कारण हर तरफ हरियाली छा गई। 

अन्न और जल की परेशानी दूर हो गई। 

राज्य की प्रजा फिर से खुशहाल रहने लगी।

हर अवतार में भगवान विष्णु के साथ शेषनाग क्यों जन्म लेते हैं?

सृष्टि की रचना के समय जब ब्रह्मा जी ने नागों की उत्पत्ति की, तब उनमें सबसे तेजस्वी और तपस्वी थे अनंत शेष। 

जहाँ अन्य नाग शक्ति और वैभव चाहते थे, वहीं शेषनाग ने संसार से दूर रहकर केवल भगवान विष्णु का ध्यान किया। 

उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए और बोले, वत्स,वर मांगो। 

शेषनाग ने विनम्रता से कहा, प्रभु! मुझे न स्वर्ग चाहिए,न राज्य और न ही कोई ऐश्वर्य। 

मैं केवल जीवन भर भगवान नारायण की सेवा करना चाहता हूँ।

ब्रह्मा जी उनकी निस्वार्थ भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्हें दो महान वरदान दिए। 

पहला - तुम अपनी शक्ति से पृथ्वी का भार धारण करोगे। 

दूसरा- जब - जब भगवान विष्णु धर्म की रक्षा के लिए अवतार लेंगे,तब - तब तुम भी उनके साथ जन्म लेकर उनकी सेवा करोगे।

इसी वरदान के कारण त्रेता युग में भगवान श्रीराम के साथ शेषनाग लक्ष्मण बनकर प्रकट हुए। 

उन्होंने चौदह वर्षों तक अपने बड़े भाई की छाया बनकर सेवा की और एक पल के लिए भी उनका साथ नहीं छोड़ा।

फिर द्वापर युग में जब भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लिया,तब शेषनाग बलराम के रूप में उनके बड़े भाई बनकर आए। 

जन्म से लेकर जीवन के अंतिम क्षणों तक वे श्रीकृष्ण के साथ रहे और धर्म की रक्षा में उनका साथ निभाया।

पुराणों में शेषनाग को केवल एक महान नाग नहीं, बल्कि धैर्य, सेवा, समर्पण और अटूट भक्ति का प्रतीक माना गया है। 

यही कारण है कि भगवान विष्णु विश्राम भी उनकी शैया पर करते हैं और हर अवतार में उन्हें अपने सबसे निकट स्थान देते हैं।

यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान के सबसे प्रिय वही बनते हैं जो बिना किसी स्वार्थ के सेवा करते हैं। 

निष्काम भक्ति और समर्पण ही वह मार्ग है जो भक्त को भगवान के सबसे निकट पहुँचा देता है।

क्यों मंदिर से हमेशा उल्टे कदम ही बाहर निकलते हैं लोग ? 

जानिए भगवान की तरफ पीठ न करने के 4 बड़े कारण🌹

⭕मंदिर में जब भी हम पूजा करने जाते हैं तो एक बात अक्सर देखने को मिलती है. दर्शन करने के बाद लोग कभी भी तुरंत पीछे मुड़कर नहीं चलते. वो उल्टे कदमों से पीछे हटते हुए गर्भगृह से बाहर आते हैं.

यानी भगवान की तरफ कभी भी पीठ नहीं करते हैं. ये केवल एक पुरानी परंपरा नहीं है. इसके पीछे बहुत गहरे धार्मिक, मानसिक और व्यावहारिक कारण छिपे हैं. आइए आसान शब्दों में समझते हैं कि ऐसा क्यों किया जाता है.

भगवान के प्रति सम्मान और आदर की भावना हमारे समाज में बड़ों का आदर करना सबसे जरूरी माना जाता है ! 

जब भी घर में कोई बड़ा या गुरु आता है तो हम उनके सामने से तुरंत पीठ घुमाकर नहीं भागते हैं. भगवान तो पूरी सृष्टि के स्वामी हैं !

उनके सामने से सीधे पीठ मोड़कर चले जाना अनजाने में उनका अनादर माना जाता है !

इस लिए जब तक हम मंदिर के मुख्य परिसर से बाहर नहीं निकल जाते ! 

हमारा ध्यान और चेहरा ईश्वर की तरफ ही रहता है. यह हमारे आदर भाव को दिखाता है.

पॉजिटिव एनर्जी को अपने अंदर समेटना मंदिर का गर्भगृह ऊर्जा का एक बहुत बड़ा केंद्र होता है !  

जहां भगवान की मूर्ति होती है वहां सबसे ज्यादा सकारात्मक ऊर्जा पाई जाती है ! 

जब हम हाथ जोड़कर ईश्वर के सामने खड़े होते हैं तो वह ऊर्जा हमारे शरीर में प्रवेश करती है.

अगर हम दर्शन करते ही तुरंत पीछे मुड़ जाएंगे तो उस ऊर्जा का प्रवाह रुक जाता है ! 

उल्टे कदमों से बाहर आने का मतलब है कि हम उस शांति और आशीर्वाद को अपने साथ समेटकर घर ले जा रहे हैं.

मन के घमंड और अहंकार को मिटाना सीधे पीठ मोड़कर चले जाना कभी - कभी इंसान के अहंकार को दर्शाता है ! 

ऐसा लगता है जैसे काम खत्म हुआ और हम चलते बने. लेकिन जब हम धीरे - धीरे पीछे की तरफ कदम बढ़ाते हैं तो ये हमारी नम्रता को दिखाता है.

ये तरीका इंसान को यह याद दिलाता है कि ईश्वर के सामने हम बहुत छोटे हैं. जो कुछ भी हमारे पास है वह सब उन्हीं की कृपा का फल है. इससे इंसान का मन शांत और विनम्र बनता है.

ध्यान और मन की शांति को बनाए रखना जैसे ही हम मंदिर से बाहर जाने के लिए मुड़ते हैं, हमारा ध्यान तुरंत भटक जाता है ! 

हमारा मन बाहर खड़ी गाड़ियों, जूते - चप्पलों या सांसारिक बातों में उलझ जाता है.

लेकिन जब हम भगवान को देखते हुए पीछे हटते हैं तो हमारा ध्यान आखिरी समय तक मूर्ति पर टिका रहता है ! 

इस से मन में भटकाव नहीं आता है ! 

मंदिर में मिली मानसिक शांति लंबे समय तक हमारे साथ बनी रहती है और हमारा दिन अच्छा बीतता है !

पिशाचमोचन विमल तीर्थ का महत्व महादेव की नगरी का ऐसा कुंड जहां भटकती आत्माओं को मिलती मुक्ति- 

पिशाचमोचन-में ही मिलती है पितरों के प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु के बाद व्याधियों से मुक्ति.....!

वाराणसी या काशी नगरी - मोक्ष की नगरी कही जाती है। 

ऐसा माना जाता है कि यहां प्राण त्यागने वाले मनुष्यों को भगवान शंकर स्वयं मोक्ष प्रदान करते हैं, मगर जो लोग काशी से बाहर या काशी में अकाल मौत के शिकार होते हैं, उनके मोक्ष के लिए यहां के पिशाच मोचन कुण्ड पर त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाता है।

त्रिपिंडी श्राद्ध- करने के लिए पिशाचमोचन घाट पर लोगों का ताता लग जाता है। 

काशी के अति प्राचीन पिशाच मोचन कुण्ड पर होने वाले त्रिपिंडी श्राद्ध के साथ ये मान्यता जुड़ी है कि पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मरने के बाद व्याधियों से मुक्ति मिल जाती है। 

इसी लिये पितृ पक्ष के दिनों पिशाच मोचन कुंड पर लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है।सिर्फ काशी में होती है त्रिपिंडि श्राद्ध!

काशी- पूरे विश्व में घाटों और तीर्थों के लिए जाना जाता है। 

12 महीने चैत्र से फाल्गुन तक 15-15 दिन का शुक्ल और कृष्ण पक्ष का होता है लेकिन पितृ पक्ष अश्विन मास के कृष्ण पक्ष से शुरू होता है। 

इन 15 दिनों को पितरों की मुक्ति का दिन माना जाता है और इन 15 दिनों के अन्दर देश के विभिन्न तीर्थ स्थलों पर श्राद्ध और तर्पण का कार्य होता है। 

देश भर में सिर्फ काशी के ही अति प्राचीन पिशाचमोचन कुण्ड पर यह त्रिपिंडी श्राद्ध होता है जो पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मरने के बाद व्याधियों से मुक्ति दिलाता है। 

इस श्राद्ध कार्य में इस विमल तीर्थ पर वेदोक्त कर्मकांड विधि से तीन मिटटी के कलश की स्थापना की जाती है। 

जो काले, लाल और सफेद झंडों से प्रतिकमान होते हैं। 

प्रेत बाधाएं तीन तरह की मानी जाती हैं। 

सात्विक, राजस, और तामस। 

इन तीनों बाधाओं से पितरों को मुक्ति दिलाने के लिए काले, लाल और सफेद झंडे लगाये जाते हैं।

जिसको कि भगवन शंकर, ब्रह्मा, और विष्णु के प्रतीक के रूप में मानकर तर्पण और श्राद्ध का कार्य किया जाता है। 

ऐसी मान्यता है कि पिशाच मोचन पर श्राद्ध करवाने से अकाल मृत्यु से मरने वाले पितरों को प्रेत बाधा से मुक्ति के साथ मोक्ष की प्राप्ति होती है। 

पिशाच मोचन तीर्थ स्थली का वर्णन गरुण पुराण में भी वर्णित है।

भोलेशंकर की नगरी काशी - में वैसे तो मणिकर्णिका घाट को मुक्ति की स्थली कहा जाता है लेकिन अपने पितरों की मुक्ति की कामना से पिशाच मोचन कुण्ड पर श्राद्ध और तर्पण करने के लिए लोगों की भीड़ पितृ पक्ष के महीने में यहां जुटती है। 

मान्यता है कि जिन पूर्वजों की मृत्य अकाल हुई है वो प्रेत योनि में जाते हैं और उनकी आत्मा भटकती है। 

उन्हीं की शांति और मोक्ष के लिये यहां तर्पण का कार्य किया जाता है। 

यहां पिंड दान और तर्पण करने के लिए दूर दृ दूर से लोग आते हैं। 

यहां पिंड दान करने के बाद ही लोग गया जाते हैं। 

धार्मिक स्थली पिशाच मोचन के साथ ये मान्यता जुडी हुई है कि यहां का तर्पण का कर्मकांड करने के बाद ही गया में पिंड दान किया जाता है, ताकि पितरों के लिये स्वर्ग का द्वार निस्संदेह खुला रहें।

एक बार देवर्षि नारद विभिन्न शिव तीर्थों और क्षेत्रों का भ्रमण करते हुए पवित्र नैमिषारण्य पहुँचे। 

वहाँ उपस्थित ऋषियों ने उनका भव्य स्वागत किया और लिंग पुराण के विषय में जानने की तीव्र जिज्ञासा प्रकट की। 

देवर्षि नारद ने उन्हें भगवान शिव की अनेक अद्भुत कथाएं सुनाईं।

उसी समय परम ज्ञानी सूत जी का वहाँ आगमन हुआ। 

ऋषियों और नारद जी ने उनका सत्कार किया और उनसे लिंग पुराण के गूढ़ रहस्यों को उद्घाटित करने का विशेष आग्रह किया। 

ऋषियों के आग्रह पर सूत जी ने ब्रह्मांड और शिव के स्वरूप का वर्णन निम्न प्रकार से किया:-

ब्रह्म और ॐ ( ओम् ): सूत जी ने बताया कि ‘शब्द’ ही ब्रह्म का शरीर है और वही उसका प्रकाशक भी है।ओम्’ ( ॐ ) ही ब्रह्म का स्थूल, सूक्ष्म और परात्पर स्वरूप है।

वेदों को ब्रह्म के शरीर के विभिन्न अंगों के रूप में दर्शाया गया है:-

ऋग्वेद:-मुख

सामवेद:- जीभ

यजुर्वेद:- ग्रीवा ( गर्दन )

अथर्ववेद:- हृदय

सत्,रज और तम - इन तीनों गुणों के आश्रय से ही परमात्मा ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में व्यक्त होता है। 

परंतु भगवान महेश्वर इन सभी से परे परम निर्गुण रूप हैं।

उद त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतव:।

        दृशे  विश्वाय सूर्यम्।।

             ( ऋग्वेद,1/50/1 )

सारे संसार को प्रकाश रूप दृष्टि प्रदान करने के लिए सम्पूर्ण प्राणियों के ज्ञाता सूर्य अपनी रश्मियों द्वारा प्रकाशित होते हैं।

अप त्ये तायवो यथा नक्षत्रा यन्त्यक्तुभि:।

            सूराय विश्वचक्षसे।।

                 ( ऋग्वेद,1/50/2 )

सबको प्रकाशित करने वाले सूर्य के उदय होते ही रात्रि के साथ नक्षत्र आदि जैसे चोर छिप जाते हैं,वैसे ही लोप हो जाते हैं।

अदृश्रमस्य केतवो वि रश्मयो जनां अनु।

          भ्राजन्तो अग्नयो यथा।।

                 ( ऋग्वेद,1/50/3 )

प्रज्ज्वलित हुई अग्नि की ज्वालाओं के समान सूर्य की प्रकाशमयी रश्मियां अपने प्रभाव से सम्पूर्ण जीव जगत् को प्रकाशित करती हैं।

ग्रहाणां ग्रहभूतं च सर्वग्रहनिवारणम्

 मृत्युंजयं महाकालं नमस्यामि शनैश्चरम्।

कालस्य वशगा:सर्वे म काल:कस्यचिद्वश:

तस्मात्त्वां कालपुरुष  प्रणतोऽस्मि  शनैश्चरम्।।

समस्त ग्रहों के लिए ग्रह स्वरूप,समस्त ग्रहों के निवारण करने वाले, मृत्यु को जीतने वाले महाकाल भगवान् शनिदेव को मैं नमस्कार करता हूं।

काल सबसे अधिक बलवान होता है और इसके वश में सभी रहा करते हैं और यह काल किसीके भी वश में रहने वाला नहीं हुआ करता, इसी कारण से उस काल पुरुष शनैश्चर के आगे प्रणत होता हूं।

पात्रता का महत्व वेदान्त का अमृत,

  अपात्र के हाथों विष क्यों बन जाता है?

श्लोक-

पात्रापात्रविशेषोऽस्ति,धेनुपन्नगयोरिव।

तृणादुत्पद्यते दुग्धं, दुग्धादुत्पद्यते विषम्॥

बहुत ध्यान से समझें -

अर्थ-पात्र और अपात्र में बहुत बड़ा अंतर होता है। 

जैसे गाय और साँप में। 

गाय उसी घास को खाकर अमृततुल्य दूध देती है, जबकि साँप उसी दूध को पीकर विष उत्पन्न कर देता है।

यह केवल एक नैतिक शिक्षा नहीं है; यह भारतीय दर्शन, विशेषतः वेदान्त का एक अत्यन्त गहन सिद्धान्त है।

ज्ञान दोषी नहीं होता,पात्रता का अभाव दोषी होता है आज अनेक लोग प्रश्न करते हैं-

यदि उपनिषदों का ज्ञान इतना महान है,तो उसे सबको क्यों न बता दिया जाए?

उत्तर है-ज्ञान को छिपाया नहीं गया था,बल्कि उसकी गरिमा की रक्षा की गई थी।

ऋषि जानते थे कि प्रत्येक सत्य को समझने के लिए मन की तैयारी आवश्यक होती है।

जिस प्रकार तेज औषधि रोगी को स्वस्थ भी कर सकती है और अनुचित मात्रा में मृत्यु का कारण भी बन सकती है ! 

उसी प्रकार वेदान्त का ज्ञान भी पात्र के लिए अमृत है और अपात्र के लिए भ्रम का कारण बन सकता है।

उपनिषदों ने भी पात्रता पर बल दिया-

उपनिषद बार - बार संकेत करते हैं कि ब्रह्मविद्या केवल बुद्धि का विषय नहीं, जीवन की परिपक्वता का विषय है।

इस लिए गुरु पहले शिष्य की परीक्षा करते थे।

वे देखते थे - क्या इसमें सत्य के प्रति निष्ठा है?

क्या इसका मन शांत है?

क्या इसमें अहंकार कम हुआ है?

क्या यह सुनने के लिए आया है या केवल वाद - विवाद के लिए?

क्योंकि यदि शिष्य केवल तर्क करने आया है, तो वेदान्त उसके लिए आत्मज्ञान का नहीं, अहंकार का साधन बन जाएगा।

अपात्र वेदान्त का क्या करता है?

वेदान्त कहता है-

«अहं ब्रह्मास्मि।»

एक पात्र साधक इसे सुनता है और उसका अहंकार गलने लगता है।

उसे अनुभव होता है कि सीमित 'मैं' नहीं, बल्कि समस्त अस्तित्व एक ही चैतन्य की अभिव्यक्ति है

किन्तु वही वाक्य यदि अपात्र सुन ले,तो वह कह सकता है-

मैं ही ब्रह्म हूँ,इसलिए मुझे किसी नियम की आवश्यकता नहीं।यहीं से अर्थ का अनर्थ प्रारम्भ होता है।

वेदान्त अहंकार मिटाना चाहता है।

अपात्र उसी वेदान्त से अहंकार को और बड़ा बना लेता है।

जगत मिथ्या का भी अनर्थ वेदान्त का प्रसिद्ध वाक्य है-

«ब्रह्म सत्यं,जगन्मिथ्या।»

पात्र साधक इसका अर्थ समझता है कि संसार परिवर्तनशील है; इस लिए उसमें आसक्ति मत रखो।

किन्तु अपात्र कहता है-

जब जगत मिथ्या है, तो कर्म क्यों करें ?

सेवा क्यों करें ? 

परिवार की चिंता क्यों करें ?

यही कारण है कि आचार्यों ने बार - बार स्पष्ट किया-

जगत मिथ्या का अर्थ यह नहीं कि जगत निरर्थक है; इसका अर्थ है कि उसका स्वतंत्र और नित्य अस्तित्व नहीं है।

यदि यह सूक्ष्म अंतर न समझा जाए, तो वेदान्त आलस्य और पलायन का साधन बन सकता है।

गाय और साँप का दृष्टान्त-

गाय घास खाती है।

वही घास उसके भीतर दूध बन जाती है।साँप दूध पीता है।

वही दूध उसके भीतर विष बन जाता है।

दोष न घास का है, न दूध का।

दोष या गुण उस पात्र का है जिसमें वह प्रवेश करता है।

ठीक यही स्थिति ज्ञान की भी है।वेदान्त का वचन वही रहता है,बदलता केवल श्रोता का अंतःकरण है।

पात्र कौन है?

वेदान्त के अनुसार पात्र वह नहीं जो बहुत पढ़ा - लिखा हो।

पात्र वह है - जो विनम्र हो।

जो सत्य के लिए अपने अहंकार का त्याग कर सके।

जो जीवन में सदाचार रखता हो।

जो सुनने से पहले स्वयं को बदलने के लिए तैयार हो।जिसे केवल जानकारी नहीं, आत्मपरिवर्तन चाहिए।

ऐसा व्यक्ति वेदान्त सुनकर मुक्त होता है।

अपात्र कौन है ?

अपात्र वह नहीं जो गरीब है, अशिक्षित है या किसी विशेष जाति का है।

अपात्र वह है - जो केवल वाद - विवाद के लिए सुनता है।

जो अपने अहंकार की पुष्टि चाहता है।

जो शास्त्रों का उपयोग दूसरों को नीचा दिखाने के लिए करता है।

जो ज्ञान को जीवन में उतारने के स्थान पर केवल उद्धरणों का संग्रह करता है।

ऐसे व्यक्ति के लिए शास्त्र भी बोझ बन जाते हैं।

जिसके भीतर विनम्रता नहीं, उसके हाथ में वेदान्त भी एक हथियार बन सकता है।

आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती

आज उपनिषद,गीता और वेदान्त की बातें कुछ ही क्षणों में सोशल मीडिया पर उपलब्ध हो जाती हैं।

यह एक अवसर भी है और एक चुनौती भी।यदि कोई व्यक्ति बिना तैयारी के केवल एक - दो वाक्य पढ़कर निष्कर्ष बना ले,तो भ्रम उत्पन्न हो सकता है।

इसी लिए आवश्यक है कि शास्त्रों को सम्पूर्ण संदर्भ में,गुरु - परम्परा के प्रकाश में और साधना के साथ समझा जाए।

ज्ञान को सूचना नहीं, आत्म परिवर्तन का साधन बनाया जाए।

निष्कर्ष-

वेदान्त किसी से भेदभाव नहीं करता।

वह सभी के लिए है।

किन्तु उसके द्वार पर एक शर्त अवश्य लिखी है-

पहले अपने पात्र को निर्मल करो।जिस प्रकार गंदे पात्र में रखा अमृत भी दूषित हो जाता है, उसी प्रकार अशांत,अहंकारी और असंयमित मन में प्रवेश करने वाला वेदान्त भी अपना वास्तविक फल नहीं दे पाता।

इसी लिए भारतीय ऋषियों ने ज्ञान से पहले चित्तशुद्धि, उपदेश से पहले पात्रता, और वेदान्त से पहले विनम्रता पर बल दिया।

ज्ञान का मूल्य उसके शब्दों में नहीं, बल्कि उसे ग्रहण करने वाले के अंतःकरण में है।

गाय घास को दूध बना देती है।

साँप दूध को विष बना देता है।

प्रश्न ज्ञान का नहीं है।

प्रश्न यह है कि हम गाय बनना चाहते हैं या साँप?

          || महाकाल लोक उज्जैन ||

🚩 *जय सोमनाथ* 🚩

🙏 *जय द्वारकाधीश*🙏

!!!!! शुभमस्तु !!!


🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-

PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 

-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-

(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 

" Opp. Shri Ramanatha Swami Kovil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits, V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )

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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 

नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....

जय द्वारकाधीश....

जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏


।। सुंदर कहानी ।।एक बोध कथा 〰🌼🌼〰*एक समय की बात है, एक छोटे से गाँव में, एक वृद्ध किसान अपने एकलौते पुत्र के साथ रहता था।* *उनके स्वामित्व में एक छोटा सा खेत का टुकड़ा, एक गाय, और एक घोड़ा था।*

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। सुंदर कहानी ।।

एक बोध कथा 

〰🌼🌼〰

*एक समय की बात है, एक छोटे से गाँव में, एक वृद्ध किसान अपने एकलौते पुत्र के साथ रहता था।* 

*उनके स्वामित्व में एक छोटा सा खेत का टुकड़ा, एक गाय, और एक घोड़ा था।*

एक दिन उसका घोड़ा कहीं भाग गया। 

उन लोगों ने घोड़े को ढूँढने की बहुत कोशिश की पर घोड़ा नहीं मिला। 

किसान का पुत्र बहुत दुखी हो गया। 

वृद्ध किसान के पड़ोसी भी मिलने आये।

*गांववालों ने किसान को सांत्वना देने के लिए कहा, “ईश्वर आपके प्रति बहुत कठोर है, यह आपके साथ बहुत बुरा हुआ।”*

किसान ने शांत भाव से उत्तर दिया, “यह निश्चित रूप से ईश्वरीय कृपा है।”

*दो दिनों बाद घोड़ा वापस आ गया, लेकिन अकेला नहीं।*

 *चार अच्छे शक्तिशाली जंगली घोड़े भी उसके पीछे-पीछे आये।* 

*इस तरह से उस वृद्ध किसान के पास पांच घोड़े हो गए।*

लोगों ने कहा, “बहुत खूब। तुम तो बहुत भाग्यशाली हो।”

*बहुत ही सम भाव से कृतज्ञ होते हुए वृद्ध किसान ने कहा, “निश्चित रूप से यह भी ईश्वरीय कृपा है।”

उसका पुत्र बहुत उत्साहित हुआ। 

दूसरे ही दिन उसने एक जंगली घोड़े को जाँचने के लिए उसकी सवारी की, किन्तु घोड़े से वो गिर गया और उसका पैर टूट गया।*

पड़ोसियों ने अपनी बुद्धिमता दिखाते हुए कहा,।
ये घोड़े अच्छे नहीं हैं। 

वो आपके लिए दुर्भाग्य लाये हैं, आखिरकार आपके पुत्र का पाँव टूट गया।”

*किसान ने उत्तर दिया, “यह भी उनकी कृपा है।”

कुछ दिनों बाद, राजा के अधिकारीगण गाँव में आवश्यक सैन्य सेवा हेतु युवकों को भर्ती करने के लिए आये। 

वे गाँव के सारे नवयुवकों को ले गए लेकिन टूटे पैर के कारण किसान के पुत्र को छोड़ दिया।*

कुढ़न और स्नेह से गांववालों ने किसान को बधाई दी कि उसका पुत्र जाने से बच गया।

*किसान ने कहा, “निश्चित रूप से यह भी उनकी ही कृपा है।”*

ये हमेशा ध्यान रखे के प्रभु कभी भी किसी का बुरा नही करते ना ही सोचते ॥ 

हुम जीव ऐसे है के हमेशा प्रभु को ही दोष देते है के हुम तो इतना भजन करते है। 

सेवा करते है तब भी भगवान हमरे साथ एस करते है जब की ऐसी मिथ्या शौच जीव की होती है प्रभु पे विश्वास दृढ़ता और धेर्य रखने चहिये चाहिये । 

हमरे जीवन मे जो भी होत है वो हमारे कर्मों क हिसाब होता है चाहे अच्छा हो बुरा हो ये हमरी सोच है ॥
जय श्री कृष्ण
🙏🙏🙏【【【【【{{{{ (((( मेरा पोस्ट पर होने वाली ऐडवताइस के ऊपर होने वाली इनकम का 50 % के आसपास का भाग पशु पक्षी ओर जनकल्याण धार्मिक कार्यो में किया जाता है.... जय जय परशुरामजी ))))) }}}}}】】】】】🙏🙏🙏

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।। श्री व्रतकथा प्रवचन ।।

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जय द्वारकाधीश

।। श्री व्रतकथा प्रवचन ।।


*🌹परमा ( कामदा ) एकादशी*

 

*🌹अर्जुन बोले : हे जनार्दन !*


*आप अधिक ( लौंद / मल / पुरुषोत्तम ) मास के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम तथा उसके व्रत की विधि बतलाइये ।* 







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*इसमें किस देवता की पूजा की जाती है तथा इसके व्रत से क्या फल मिलता है?*
 
*🌹श्रीकृष्ण बोले : हे पार्थ !* 

 *इस एकादशी का नाम ‘परमा’ है ।* 

*इसके व्रत से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं तथा मनुष्य को इस लोक में सुख तथा परलोक में मुक्ति मिलती है ।* 

*भगवान विष्णु की धूप, दीप, नैवेध, पुष्प आदि से पूजा करनी चाहिए ।* 

*महर्षियों के साथ इस एकादशी की जो मनोहर कथा काम्पिल्य नगरी में हुई थी, कहता हूँ ।* 

*ध्यानपूर्वक सुनो :*
 
*🌹काम्पिल्य नगरी में सुमेधा नाम का अत्यंत धर्मात्मा ब्राह्मण रहता था ।* 

*उसकी स्त्री अत्यन्त पवित्र तथा पतिव्रता थी ।* 

*पूर्व के किसी पाप के कारण यह दम्पति अत्यन्त दरिद्र था ।* 

*उस ब्राह्मण की पत्नी अपने पति की सेवा करती रहती थी तथा अतिथि को अन्न देकर स्वयं भूखी रह जाती थी ।*
 
*🌹एक दिन सुमेधा अपनी पत्नी से बोला: ‘हे प्रिये !* 

*गृहस्थी धन के बिना नहीं चलती इसलिए मैं परदेश जाकर कुछ उद्योग करुँ ।’*
 
*🌹उसकी पत्नी बोली: ‘हे प्राणनाथ !* 

*पति अच्छा और बुरा जो कुछ भी कहे, पत्नी को वही करना चाहिए ।* 

*मनुष्य को पूर्वजन्म के कर्मों का फल मिलता है ।* 

*विधाता ने भाग्य में जो कुछ लिखा है, वह टाले से भी नहीं टलता ।* 

*हे प्राणनाथ !* 

*आपको कहीं जाने की आवश्यकता नहीं, जो भाग्य में होगा, वह यहीं मिल जायेगा ।’*
 
*🌹पत्नी की सलाह मानकर ब्राह्मण परदेश नहीं गया ।* 

*एक समय कौण्डिन्य मुनि उस जगह आये ।* 

*उन्हें देखकर सुमेधा और उसकी पत्नी ने उन्हें प्रणाम किया और बोले: ‘आज हम धन्य हुए ।* 

*आपके दर्शन से हमारा जीवन सफल हुआ ।’* 

*मुनि को उन्होंने आसन तथा भोजन दिया ।*
 
*🌹भोजन के पश्चात् पतिव्रता बोली: ‘हे मुनिवर !* 

*मेरे भाग्य से आप आ गये हैं ।* 

*मुझे पूर्ण विश्वास है कि अब मेरी दरिद्रता शीघ्र ही नष्ट होनेवाली है ।* 

*आप हमारी दरिद्रता नष्ट करने के लिए उपाय बतायें ।’*
 
*🌹इस पर कौण्डिन्य मुनि बोले : ‘अधिक मास’ ( मल मास ) की कृष्णपक्ष की ‘परमा एकादशी’ के व्रत से समस्त पाप, दु:ख और दरिद्रता आदि नष्ट हो जाते हैं ।* 

*जो मनुष्य इस व्रत को करता है, वह धनवान हो जाता है ।* 

*इस व्रत में कीर्तन भजन आदि सहित रात्रि जागरण करना चाहिए ।* 

*महादेवजी ने कुबेर को इसी व्रत के करने से धनाध्यक्ष बना दिया है ।’*
 
*🌹फिर मुनि कौण्डिन्य ने उन्हें ‘परमा एकादशी’ के व्रत की विधि कह सुनायी ।* 

*मुनि बोले: ‘हे ब्राह्मणी !* 

*इस दिन प्रात: काल नित्यकर्म से निवृत्त होकर विधिपूर्वक पंचरात्रि व्रत आरम्भ करना चाहिए ।* 

*जो मनुष्य पाँच दिन तक निर्जल व्रत करते हैं, वे अपने माता पिता और स्त्रीसहित स्वर्गलोक को जाते हैं ।* 

*हे ब्राह्मणी !* 

*तुम अपने पति के साथ इसी व्रत को करो ।* 

*इससे तुम्हें अवश्य ही सिद्धि और अन्त में स्वर्ग की प्राप्ति होगी |’*
 
*🌹कौण्डिन्य मुनि के कहे अनुसार उन्होंने ‘परमा एकादशी’ का पाँच दिन तक व्रत किया ।* 

*व्रत समाप्त होने पर ब्राह्मण की पत्नी ने एक राजकुमार को अपने यहाँ आते हुए देखा ।* 

*राजकुमार ने ब्रह्माजी की प्रेरणा से उन्हें आजीविका के लिए एक गाँव और एक उत्तम घर जो कि सब वस्तुओं से परिपूर्ण था, रहने के लिए दिया ।* 

*दोनों इस व्रत के प्रभाव से इस लोक में अनन्त सुख भोगकर अन्त में स्वर्गलोक को गये ।*
 
*🌹हे पार्थ !* 

*जो मनुष्य ‘परमा एकादशी’ का व्रत करता है।* 

*उसे समस्त तीर्थों व यज्ञों आदि का फल मिलता है ।* 

*जिस प्रकार संसार में चार पैरवालों में गौ, देवताओं में इन्द्रराज श्रेष्ठ हैं।* 






उसी प्रकार मासों में अधिक मास उत्तम है ।* 

*इस मास में पंचरात्रि अत्यन्त पुण्य देनेवाली है ।* 

*इस महीने में ‘पद्मिनी एकादशी’ भी श्रेष्ठ है।*

*उसके व्रत से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और पुण्यमय लोकों की प्राप्ति होती है ।*
 
*🌹व्रत खोलने की विधि :*

 *द्वादशी को सेवापूजा की जगह पर बैठकर ।* 

*भुने हुए सात चनों के चौदह टुकड़े करके अपने सिर के पीछे फेंकना चाहिए ।*

*‘मेरे सात जन्मों के शारीरिक, वाचिक और मानसिक पाप नष्ट हुए’ -* 

*यह भावना करके सात अंजलि जल पीना और चने के सात दाने खाकर व्रत खोलना चाहिए ।*
*जय श्री कृष्ण*

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।। श्री गरुड़ पुराण प्रवचन ।।#मादा_बिच्छू_के_जन्म_का_दुःख जब मनुष्य जन्म में कैसा पाप धर्म होता है उसके कर्म के आधारित ही नया जन्म के शुरुआती होती है ।इस जन्म के आधारित जितना पाप पुण्य किये हो इसका फल इस जन्म में मिल जाय या तो नया जन्म भी उसका लेनदेन का हिशाब अचूक चूकते करना ही पड़ता है।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्री गरुड़ पुराण प्रवचन ।।


#मादा_बिच्छू_के_जन्म_का_दुःख 

जब मनुष्य जन्म में कैसा पाप धर्म होता है उसके कर्म के आधारित ही नया जन्म के शुरुआती होती है ।

इस जन्म के आधारित जितना पाप पुण्य किये हो इसका फल इस जन्म में मिल जाय या तो नया जन्म भी उसका लेनदेन का हिशाब अचूक चूकते करना ही पड़ता है।

इसकी अस्थिमज्जा पर मौजूद ये इसके बच्चे हैं।

ये जन्म लेते ही अपनी मां की पीठ पर बैठ जाते हैं और उसके शरीर को ही खाना प्रारम्भ कर देते हैं।

तब तक खाते हैं।

जब तक कि  उसकी केवल अस्थियां ही शेष ना रह जाए। 

वो तङपती है ।

कराहती है ।

लेकिन ये पिछा नहीं छोङते ।

नीचे दिया गया चित्र एक मादा बिच्छु का है ।
और पलभर में नही मार देते बलकि कई दिनों तक यह मौत से बदतर असहनीय पीङा को झेलती हुई दम तोङती है। 

लख चौरासी के कुचक्र में ऐसी ऐसी असंख्य योनियां हैं ।

जिनकी स्थितियां अज्ञात हैं ।

कदाचित् इसीलिए भवसागर को अगम अपार कहा गया है।  

गरुड़ पुराण एवं ऋषिमत के मुताबिक। 

यह भी इन्सानी जूनीं मे किए गये कर्मों का ही भुगतान है। 

इन्सान इस मनुष्य जीवन में जो कर्म करेगा ।

नाना प्रकार  की असंख्य योनियों में इन कर्मों के आधार से ही उसे दुःख सुख मिलते रहेंगे। 

  चलती चक्की देखकर दिया कबीरा रोय 
दोय पाटन के बीच में।
 साबुत बचा ना कोय।
जय श्री कृष्ण...!
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