।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।"रावणत्व" है क्या?? 01??"हे ब्राह्मणों! संस्कार के वर्णसंकरता से बचो "!!!"उपजे" जदपि पुलत्स्य कुल पावन! अमल!! अनूप!!!जदपि महिसुर श्राप बस भए सकल अघरूप।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।

"रावणत्व" है क्या?? 01??

"हे ब्राह्मणों! संस्कार के वर्णसंकरता से बचो "!!!

"उपजे" जदपि पुलत्स्य कुल पावन! 

अमल!! 

अनूप!!!

जदपि महिसुर श्राप बस भए सकल अघरूप।।

पुलत्स्य ऋषि ब्रह्मा जी के मानस पुत्र जो अत्यंत पवित्र, निर्दोष और जिस वंश के श्रेष्ठता की कोई उपमा नहीं, उदाहरण नहीं , रावण उसी वंश में "उपजा" है।

तुलसी की अतुल सी कला देखिए..

"उपजे"- 

उपज शब्द सामान्यतः खेती के लिए प्रयोग किया जाता है। 

पशु के उत्पन्न होने पर

 "बियानी" 

ब्याना शब्द का प्रयोग करते हैं।

श्रीराम विमुख संतान को जन्म देना अर्थात्

 "बिआनी" ,

पशुवत्...नतरु बाँझ भलि, बादि बिआनी। 
राम बिमुख सुत तें हित हानी।।

"उपजे" जदपि पुलत्स्य कुल पावन अमल अनूप...

किसान कभी नहीं चाहता कि उसके खेत में खर पतवार उगे और फसलों को नष्ट करे ,
उसी प्रकार पुलत्स्य कुल में रावणत्व उनके इच्छा विरुद्ध है।

नियम कहता है कि...
प्रीति बिरोध समान सन करिअ नीति असि आही।

अर्थात् विवाह के लिए वर कुल और कन्या कुल में समानता, स्वभाव मेल खाता हो।

अब जरा विचार करें कि विश्रवा मुनि और राक्षस पुत्री कैकशी के संस्कार में कोई समानता थी??

विश्रवा मुनि उत्तम ब्राह्मण पुलत्स्य पुत्र
और कैकशी मदिरा प्रेमी राक्षस पुत्री,

अर्थात् ये वर्णसंकर विवाह हुआ कि नहीं?

और वर्णसंकरता का परिणाम क्या होता है वह गीता में देखिए...

"अधर्माभिभवात्कृष्णः प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णशंकरः।।
संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः।।
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः।।
सात्विक ब्राह्मण काम पूर्ति हेतु यदि तामसी ( राक्षसी ) प्रवृत्ति के कन्या से विवाह करेगा तो क्या होगा?

 जो ब्राह्मण यज्ञ आदि अनुष्ठान के माध्यम से देवताओं को पोषित करते हैं, दैत्य गुरु शुक्राचार्य राक्षसों को उन्हीं ब्राह्मणों को मोहरा बनाने को कहे जिसके परिणामस्वरूप विश्रवा कैकशी विवाह हुआ। 

योजना स्पष्ट है कि ब्राह्मण कुल में जन्मा राक्षस अधिक बलवान, बुद्धिमान होगा। 

चूँकि राक्षस देवताओं से अधिक बलवान होने पर भी बुद्धि में पराजित हो जाते थे , 

अतः ब्राह्मण कुल  ( पुलत्स्य वंश ) , शुक्राचार्य के षड्यंत्र का शिकार हुआ, जिसमें विश्रवा मुनि की कामेक्षा भावी वश सहायक हुआ।

और यदि उनके संतान..

".महिष खाइ करि मदिरा पाना"!!!
"करसि पान सोवसि दिनु राती "!!

अर्थात् अभक्ष्य भोजन , मदिरा सेवन, कुसमय में शयन  करे तो उसे भी ब्राह्मण कहेंगे ?

कहीं आप ब्राह्मण संस्कार में वर्णसंकरता को बढ़ावा नहीं न देना चाहते हैं??

मेरे भाई!

ब्राह्मणों को ऐसे षड्यंत्र से बचना चाहिए। 

लेकिन मूर्खता देखिए कि आजकल रावणत्व का ही महिमा मंडन किया जा रहा है।

राम राम राम सीताराम जय राम राम राम सीताराम........राम राम राम सीताराम राम जय जय राम राम राम सीताराम राम राम राम
🙏🙏🙏【【【【【{{{{ (((( मेरा पोस्ट पर होने वाली ऐडवताइस के ऊपर होने वाली इनकम का 50 % के आसपास का भाग पशु पक्षी ओर जनकल्याण धार्मिक कार्यो में किया जाता है.... जय जय परशुरामजी ))))) }}}}}】】】】】🙏🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 25 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Dhanlakshmi Strits , Marwar Strits, RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 WHATSAPP नंबर : + 91 7598240825 ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।

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।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।

*"श्रीरामचन्द्रजी का वनवासी प्रसंग "*
 
*पिछली पोस्ट से आगे-*

       गोस्वामीजी कहते हैं कि अयोध्याकाण्ड के प्रारंभ में कर्म, भक्ति और उपासना का जो वास्तविक रूप प्रस्तुत किया गया है, तथा रामराज्य की स्थापना में आने वाले जिन विध्नों का संकेत किया गया है, उन्हें हम और आप हृदयंगम करने की चेष्टा करें। 

महाराज श्री दशरथ रामराज्य का निर्माण करना चाहते हैं पर रामराज्य का निर्माण वे नहीं कर पाते। 

अपने संकल्प में उन्हें जो सफलता नहीं मिली उसका कारण है कि उनकी धारणा यह थी कि स्वर्ण के सिंहासन पर जब राम का राजतिलक हो जाएगा, तो रामराज्य की स्थापना अपने आप हो जायेगी। 

किन्तु रामराज्य का तात्पर्य स्वर्ण सिंहासन पर श्रीराम का बैठना ही नहीं, अपितु जब राम हमारे हृदय के सिंहासन पर बैठ जायें तब सच्चे अर्थों में रामराज्य की स्थापना होती है।

इसका अभिप्राय यह है कि संसार में जितने राज्य हैं, उन राज्यों में मुख्य वस्तु है व्यवस्था। 

जिस राज्य की जितनी श्रेष्ठ व्यवस्था होती है उसकी उतनी ही प्रशंसा की जाती है। 

पर रामराज्य का तात्पर्य उत्कृष्ट व्यवस्था नहीं है अपितु रामराज्य का तात्पर्य है कि जब व्यक्ति का हृदय इतना बदल जाय कि उसको नियंत्रित करने ( सही मार्ग पर चलाने ) के लिए किसी बाह्य व्यवस्था की आवश्यकता न रह जाय। 

किन्तु प्रारंभ में रामराज्य क्यों नहीं स्थापित हो पाया तथा आगे चलकर स्थापित हुआ, उन दोनों परिस्थितियों में क्या अंतर था?

इसकी कुछ चर्चा आपके समक्ष की जायेगी।

     अयोध्या में एक नारी पात्र है मंथरा। 

और जब मन्थरा को यह पता चलता है कि कल अयोध्या के राजसिंहासन का उत्तराधिकार राम को प्राप्त होगा तो उसके अन्त:करण में अत्यंत दुख होता है। 

वह निर्णय कर लेती है कि किसी न किसी प्रकार से इस कार्य को रोकना है। 

वह मन्थरा भी कैकेयी जी को बरगलाने में इतनी समर्थ हो जाती है कि अन्त में कैकेयी मन्थरा के वशीभूत हो जाती है। 

उसका परिणाम होता है कि रामराज्य की स्थापना के स्थान पर श्रीराम का वन-गमन हो जाता है। 

यह मन्थरा के द्वारा कैकेयी का बरगला दिया जाना बड़ा अटपटा सा प्रतीत होता है तथा कैकयी जी के प्रारंभिक स्वरुप को देखकर तो कोई यह कल्पना भी नहीं कर सकता है कि ऐसे विचारों वाली कैकेयी बदलकर इस प्रकार का रुप ले लेंगी। 




क्योंकि जिस समय मन्थरा आंसू बहाती हुई और शोक की मुद्रा में कैकेयी जी के महल में प्रवेश करती है, उस समय मन्थरा की दशा देखकर उनको लगा कि अयोध्या में कहीं कोई ऐसी दुर्घटना तो नहीं हो गई है कि जिसका अमांगलिक समाचार लेकर मन्थरा आयी है। 

और तब व्याकुल होकर उन्होंने पहला वाक्य मन्थरा से यह कहा कि मन्थरा! 

तुम सही-सही बताओ कि सब लोग कुशलपूर्वक तो हैं?

और तब मन्थरा ने पूछ दिया कि आप किसकी कुशलता के विषय में सबसे अधिक चिंतित हैं? 

और तब जो वाक्य कैकेयीजी ने कहा उसको पढ़कर आश्चर्य होता है। 

शेष अगले अंक में.....
         -तुलशीकृत रामायण
############🙏############

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
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। श्रीमद्भागवत गीता प्रर्वचन ।।कृष्ण को समझना इतना सरल नहीं है।🏵️🏵️ 🏵️मनुष्याणां सहस्रेषुकश्चिद्यतति सिद्धयेयततामपि सिद्धानांकश्चिद वेत्ति मां तत्वत: _(भगवद गीता ७.३)कई हजारों, लाखों लोगों में से एक अपने जीवन को सफल बनाने के लिए उत्सुक है ।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।  श्रीमद्भागवत गीता प्रर्वचन ।।

कृष्ण को समझना इतना सरल नहीं है।
🏵️🏵️
   🏵️
मनुष्याणां सहस्रेषु
कश्चिद्यतति सिद्धये
यततामपि सिद्धानां
कश्चिद वेत्ति मां तत्वत:
         _(भगवद गीता ७.३)

कई हजारों, लाखों लोगों में से एक अपने जीवन को सफल बनाने के लिए उत्सुक है । 

कोई भी इच्छुक नहीं । 

व्यावहारिक रूप में, वे वास्तव में जीवन की सफलता क्या है यह जानते नहीं हैं । 

आधुनिक सभ्यता, हर कोई सोच रहा है, "मझे अगर एक अच्छी पत्नी मिलती है और अच्छी मोटर गाड़ी और एक अच्छा मकान मिलता है, वह सफलता है ।" 

यही सफलता नहीं है । 

यह अस्थायी है ।

 वास्तविक सफलता माया के चंगुल से बाहर निकलना है, अर्थ है यह भौतिक बद्ध जीवन जिसके अंतर्गत है जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और बीमारी । 

हम जीवन की कई विविधता से गुजर रहे हैं, और यह मनुष्य जीवन एक अच्छा मौका है निकलने का यह सिलसिला, शरीर एक के बाद एक बदलने का । 

आत्मा शाश्वत और आनंदित है क्योंकि भगवान कृष्ण का अंश है, सच-चिद-आनंद, सच्चिदानन्दमय ।

दुर्भाग्य से, इस भौतिक बद्ध जीवन में हम विभिन्न शरीर बदल रहे हैं, लेकिन हम फिर से उस आध्यात्मिक स्तर पर नहीं हैं, जहाँ कोई जन्म, मृत्यु नहीं है । कोई विज्ञान नहीं है । 

उस दिन एक मनोचिकित्सक मुझे मिलने के लिए आया था । 

और तुम्हारी शिक्षा कहाँ है जो आत्मा को समझने के लिए है, उसकी स्वाभाविक स्थिति । 

इसलिए व्यावहारिक रूप से पूरी दुनिया अंधेरे में है । 

वे जीवन के इस काल - पचास, साठ या सौ साल में रुचि रखते हैं, लेकिन उन्हे पता नहीं है कि, हम सच्चिदानन्दमय हैं, और इस भौतिक शरीर के कारण हम जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और बीमारी के अधीन हैं । 

और यह लगातार चल रहा है ।

तो श्री चैतन्य महाप्रभु, उनकी महान दया के कारण गिरी हुई आत्माओं के लिए, वह अवतरित हुए ।

कृष्ण भी आते हैं । 

लेकिन कृष्ण इतने उदार नहीं हैं । 

कृष्ण कि शर्त है "तुम पहले शरण ग्रहण करो । 

तो मैं तुम्हारा उत्तरदायित्व लूँगा । 

" लेकिन चैतन्य महाप्रभु कृष्ण से भी अधिक दयालु हैं, हालांकि श्री कृष्ण और चैतन्य महाप्रभु, एक ही बात है । 

तो चैतन्य महाप्रभु की दया से हम इतनी आसानी से कृष्ण को समझ रहे हैं । 

तो वह चैतन्य महाप्रभु यहां मौजूद हैं । 

तुम इनकी पूजा करो । 

यह बहुत मुश्किल नहीं है । 

यज्ञै: संकीर्तनै: प्रायैर् यजन्ति हि सु-मेधस: ।
 कृष्ण-वर्णं त्विषाकृष्णं सांगोपांगास्त्र-पार्षदं, यज्ञै: संकीर्तनं (श्रीमद भागवतम ११.५.३२)।

 तुम केवल हरे कृष्ण मंत्र का जप करो और जो अर्पण कर सकते हो, करो चैतन्य महाप्रभु को । 

वे बहुत दयालु हैं। 

वे अपराध नहीं लेते हैं । 

 चैतन्य महाप्रभु स्वेच्छा से गिरी हुई आत्माओं का उद्धार करने के लिए आए हैं । 

थोडी सी सेवा, वे संतुष्ट हो जाएंगे । 

लेकिन उपेक्षा न करो । 

क्यों कि वे बहुत ही उदार और दयालु हैं, इसका मतलब यह नहीं है हम उनकी स्थिति भूल जाएँ । 

वे श्रीभगवान हैं ......

इसलिए हमें उन्हे बहुत महान सम्मान प्रदान करना चाहिए, जहाँ तक संभव हो... 

लेकिन लाभ यह है कि चैतन्य महाप्रभु अपराध नहीं लेते हैं । 

और 

उनका पूजा करना, उन्हे प्रसन्न करना, बहुत आसान है । 

यज्ञै: संकीर्तनै: प्रायैर् यजन्ति हि सु-मेधस: । 

केवल तुम हरे कृष्ण महा मंत्र का जप करो और नृत्य करो, और चैतन्य महाप्रभु बहुत प्रसन्न होंगे ।

 उन्होंने इस प्रक्रिया की शुरुआत की- नृत्य और जप, और यह भगवान प्राप्ति का सबसे आसान तरीका है ।

 इसलिए जहां तक ​​संभव हो... यदि संभव हो तो, चौबीस घंटे । 

अगर यह संभव नहीं है, तो कम से कम चार बार, छह बार, हरे कृष्ण मंत्र का जप करो चैतन्य महाप्रभु के सामने, और तुम्हे अपने जीवन में सफलता प्राप्त होगी । 

यह एक सत्य है ।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे 
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।
🙏🙏🙏【【【【【{{{{ (((( मेरा पोस्ट पर होने वाली ऐडवताइस के ऊपर होने वाली इनकम का 50 % के आसपास का भाग पशु पक्षी ओर जनकल्याण धार्मिक कार्यो में किया जाता है.... जय जय परशुरामजी ))))) }}}}}】】】】】🙏🙏🙏

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