।। सुंदर कहानी ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। सुंदर कहानी ।।

🌹🌹 *अद्भुत अलौकिक भोग*🌹🌹
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एक गाँव के बाहर छोटा सा शिव मंदिर था, जिसमें एक वृद्ध पुजारी रहते थे।
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एक दिन एक गरीब माँ अपने नन्हे से बालक को मंदिर के द्वार पर छोड़कर चली गई। 
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बहुत खोजने पर भी पुजारीजी को बालक के परिवार का कुछ भी पता न चला। 
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जब गाँव का भी कोई व्यक्ति उस बालक का लालन-पालन करने को तैयार न हुआ तो पुजारीजी ने भगवान् शिव की इच्छा समझकर उसे अपने पास रख लिया और उसका नाम भोला रख दिया।
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गाँव के श्रद्धालु भक्तों से जो कुछ प्राप्त होता, उसी से भगवान् शिव का, पुजारीजी का और बालक भोला का किसी तरह गुजारा चलता।
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यदि किसी दिन कम भी पड़ता तो पुजारीजी बालक और भगवान् को भोग लगाकर स्वयं गंगाजल पीकर रह जाते।
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धीरे-धीरे भोला बड़ा होने लगा और अब वह पुजारीजी के कामों में हाथ बँटाने लगा। 

वृद्ध पुजारीजी के थके-हारे हाथों को कुछ आराम मिलने लगा, 
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इसलिए उन्होंने भोला को मंदिर की सफाई, भगवान् शिव की पूजा, उनको भोग लगाने और उनकी आरती करने की विधि अच्छी प्रकार समझा दी।
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अब वे स्वयं भगवान् शिव के नाम जप और संकीर्तन में समय व्यतीत करने लगे। 
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एक दिन भगवान् शिव के मंगलकारी नाम शिव, शिव, शिव, शिव का जप करते हुए ही उनके प्राण छूट गए।
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अब बालक भोला का इस संसार में भगवान् शिव के सिवा और कोई सहारा न रहा। 

उसने पुजारीजी की ये तीन बातें कभी नहीं भूलीं...
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भगवान् भोलेनाथ शिव शंकर को ताजी-गर्म रसोई का ही भोग लगाना।
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भगवान् को भोग लगाए बिना स्वयं कुछ भी नहीं खाना।
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भगवान् शिव पर विश्वास रख कर कभी भी किसी भी वस्तु का संग्रह न करना, बासी भोजन का भी नहीं।
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यदि कोई भक्त पहले से बना भोजन या मिठाई मंदिर में दे जाता, तो बालक भोला उसे गरीबों में बाँट देता। 
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वह ताजी रसोई बनाकर ही भगवान् को भोग लगता, उसके बाद ही स्वयं प्रसाद ग्रहण करता और यदि बचता तो उसे बाँट देता।
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यदि रसोई बनाने को सामग्री न होती, तो भोलेबाबा और भोला भगत दोनों गंगाजल पीकर ही रह जाते।
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एक बार बरसात का मौसम आया और तीन-चार दिन तक मूसलाधार वर्षा होने से मंदिर में एक भी भक्त नहीं झाँका।
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भोला अपने भोलेबाबा को गंगाजल का ही भोग लगाता और उसे ही पीकर रह जाता। 

भोले बाबा बालक की भक्ति और सहनशक्ति की परीक्षा लेते रहे।
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किंतु आखिर में अपने भक्त बालक को भूख से तड़पते देख उनसे रहा न गया।
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वे सेठ के नौकर का रूप धरकर, हाथ में भोजन सामग्री की पोटली लेकर वर्षा में भीगते हुए मंदिर के द्वार पर जा पहुँचे। 
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उन्होंने आवाज लगाकर भोला को बुलाया और उसके हाथ में पोटली देते हुए बोले.. 
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सेठजी ने यह सीधा ( कच्चा राशन ) भेजा है। 

इससे रसोई बनाओ, भोग लगाओ और स्वयं भी प्रसाद पाओ। 

मैं कल फिर आऊँगा।
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भोला भगत ने आशीर्वाद देकर उसे विदा किया और सूखी-गीली लकड़ियों के धुएँ में गर्म रसोई बनाकर भोलेबाबा को भोग लगाया।
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पूरे बरसात के मौसम में भोलेबाबा नौकर के वेष में भोला भगत को सीधा देने आते रहे और स्वयं भी गर्मागर्म रसोई का भोग पाते रहे।
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एक दिन भोला भगत ने सोचा कि सेठजी को सीधा भेजते हुए चार महीने हो चले हैं, किंतु वे स्वयं कभी मंदिर में भोले बाबा का प्रसाद ग्रहण करने नहीं आए। 
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अगले दिन जब भोले बाबा नौकर के वेष में सीधे की पोटली देने आए तो भोला भगत उनसे बोला...
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भाई ! 

तुम्हारे इतने धर्मात्मा सेठजी कभी स्वयं मंदिर में प्रसाद लेने नहीं आए। 

इस कारण मेरा हृदय अत्यंत दुःखी हो रहा है। 
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अपने सेठजी से कहना कि कल वे भी मंदिर में प्रसाद ग्रहण करने अवश्य पधारें।
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सुनकर नौकर बने भोलेबाबा चौंककर घबरा उठे और बोले... 
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पुजारीजी ! 

सेठजी मेरे द्वारा आपको सीधा भेजते हैं, आप इससे भगवान् को भी भोग लगा लेते हैं और स्वयं भी प्रसाद पाते हैं। 
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फिर सेठजी को बीच में बुलाने की क्या जरुरत है ? 

जैसा चल रहा है, वैसे ही चलने दीजिए न..!
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भोला बोला, ऐसे कैसे चलने दूँ ?

आपके धर्मात्मा सेठजी इतने दिनों से सीधा भेज रहे हैं, क्या मैं उन्हें भगवान् का प्रसाद देने का अपना कर्तव्य भी पूरा न करूँ ? 
.
मैं किसी का उधार खाने वाला नहीं हूँ। 

अपने सेठजी से कह देना कि यदि कल भोले बाबा का प्रसाद ग्रहण करने न पधारे, तो मैं उनका सीधा लेना बंद कर दूँगा।
.
नौकर बने भोलेबाबा तो अपने भोले भगत की अकड़ देखकर काँप उठे और यह सोचकर मन ही मन हँसे कि वाह ! 

आज तो लेने वाला ही देने वाले पर धौंस दिखा रहा है। 
.
लेकिन सरल हृदय भक्त के मनोभाव पर रीझकर वे बोले, ठीक है पुजारीजी ! 

कल सेठजी मंदिर में प्रसाद ग्रहण करने जरूर पधारेंगे।
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दूसरे दिन बड़े सबेरे ही भोलेबाबा नौकर के वेष में दूध और बहुत सारी भोजन सामग्री लेकर मंदिर पहुँच गए। 
.
भोला चौंकते हुए बोला, भाई ! 

आज इतना सारा सीधा किसलिए ले आए ? 
.
नौकर बने भोलेबाबा बोले, 
पुजारीजी ! 

भूल गए क्या ? 

आज आपने सेठजी को प्रसाद के लिए बुलाया है।
.
इसलिए आप छककर रसोई बनाइए और भोलेबाबा को भोग लगाइए। 

हाँ ! 

यह तो बता दीजिए कि सेठजी किस समय पधारें ? 
.
भोला ने प्रसन्न होकर उन्हें सेठजी के आने का समय बता दिया।
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अब भोलाभगत की इच्छा पूर्ण करने के लिए भोलेबाबा कैलाश पर सेठ का रूप धारण करने लगे। 
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इधर अपने स्वामी को एक प्यारे भक्त के यहाँ जीमने जाने का समाचार सुनकर ममतामयी अन्नपूर्णा माँ पार्वती भी भला कैसे पीछे रहतीं ? 
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वे भी पति की आज्ञा लेकर सेठानी का रूप धारण करने में जुट गईं।
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भोलेबाबा ने अपने गले से मुंडों की माला उतार दी, शरीर पर लगी भस्म, कमर पर पहना हुआ बाघांबर और बाँहों और कानों में पहने साँपों के हार भी उतारकर रख दिए। 
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उन्होंने एक मखमल का सुंदर कुर्ता धारण कर लिया। 

अपनी जटाएँ सीधी कर गंगा और चंद्रमा को उसमें छिपा लिया और ऊपर से एक सुंदर रंग-बिरंगी पगड़ी पहन ली। 
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सदैव नंगे पैर विचरण करने वाले शिवजी ने आज अपने पैरों में रेशमी जूतियाँ धारण कर लीं। 
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हाथ का त्रिशूल और डमरू भोलेबाबा ने नंदी के हाथ में थमा दिया और अपने हाथ में एक सुंदर छड़ी लेकर पार्वतीजी के तैयार होने की प्रतीक्षा करते हुए कैलाश पर चहलकदमी करने लगे।
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इधर पार्वतीजी घंटों से मेकअप करने में जुटी हुईं थीं। 
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उन्होंने आज अपने पतिदेव के नगर में बनी सुंदर बनारसी साड़ी निकालकर पहनी, जिसका रंग सेठ बने शिवजी के कुर्ते से मैच कर रहा था। 
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उन्होंने सोने-चाँदी-हीरे के जगमगाते हुए आभूषण धारण कर लिए, पैरों में सुंदर सेंडल पहन लीं, बगल में सुंदर-सा पर्स दबा लिया और भोले बाबा के बार-बार आवाज लगाने के बाद शृंगार कक्ष से बाहर निकलकर आईं।
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जब पार्वतीजी और शिवजी ने एक-दूसरे को सेठ-सेठानी के वेष में देखा, तो वे चकित होकर एक-दूसरे को निहारते ही रह गए। 
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दोनों एक-दूसरे को देख-देखकर निहाल हुए जा रहे थे। 

इससे पहले उन्होंने कभी एक-दूसरे का ऐसा सुंदर रूप देखा ही नहीं था। 
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जब भगवान् गौरीशंकर सेठानी-सेठ का रूप धरकर कैलाश से अपने भक्त के यहाँ दावत उड़ाने चले, तो गणेश, कार्तिकेय, नंदी, ऋषि-मुनि, देवता, देवांगनाएँ भी उन्हें देखकर ठगे से रह गए।
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सेठ बने शिवजी अपने हाथ में ली हुई छड़ी को अदा से घुमाते हुए पृथ्वी पर टेकते हुए चल रहे थे... 
.
और उनके पीछे-पीछे बगल में पर्स दबाए, अपनी सेंडल से टक-टक और पायलों से छन-छन की मधुर ध्वनि करती हुई माँ पार्वती सेठानी बनी हुई चल रही थीं।
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इधर भोला भगत आज सुबह से ही सेठजी के स्वागत में भाँति-भाँति के पकवान बनाने में जुटा हुआ था। 
.
अपने भोलेबाबा का भोग तो वह चलते-फिरते बना लेता था, किंतु आज उसे कई महीने से भगवान् को भोग लगाने के लिए सीधा भेजने वाले सेठजी को भगवत्प्रसाद देना था, 
.
अतः आज उसने अपनी सारी पाककला झोंक डाली थी।
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उसने सेठजी द्वारा भेजे हुए चावल धोकर खीर बनाई, उसे धीमी आँच पर पकाकर गाढ़ा किया और उसमें सेठजी के द्वारा भेजे हुए पिस्ते, बादाम, केसर, चिलगोजे, किशमिश डाले। 
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मिर्च और अदरख को कूटकर, उसे बाजरा, बेसन और गेहूँ के आटे में भर-भरकर मोटे-मोटे मिस्से टिक्कड़ बनाए।
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रसोई बनाकर भोला भगत पुनः स्नान करने चला गया ताकि स्वच्छ वस्त्र पहनकर भोले बाबा को भोग लगा सके और सेठजी को उनका प्रसाद पवा सके।
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जब भोला भगत स्नान करके लौटा तो देखा सेठजी प्रसाद ग्रहण करने के लिए स्वयं तो आए ही हैं, संग में अपनी सेठानीजी को भी ले आए हैं।
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भोला ने झट दोनों से राम-राम की, उन्हें आसन देकर बैठाया और बोला...
.
मैं अभी भगवान् को भोग लगाकर आता हूँ, फिर आपको प्रसाद परोसूँगा। 
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भावना के भूखे भोलेबाबा से भूख सहन नहीं हो पा रही थी। 

इसलिए वे बोले.. 
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पुजारीजी ! 

भगवान् को जल्दी से भोग लगाइए, मुझसे भूख सहन नहीं होती।
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भोला भगत बोला, सेठजी ! 

भूख तो मुझे भी बड़े जोर से लग रही है, किंतु मैं अपनी भूख के कारण भगवान् को भोग लगाना नहीं भूलता। 
.
यदि दुनिया के सारे लोग इसी तरह अपनी भूख के लिए भगवान् को भोग लगाना भूल जाएँ तो भगवान् तो भूखों मर जाएँगे।
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सेठजी बने भोलेबाबा एक पत्तल उठाते हुए बोले, पुजारीजी ! 

आप भोग लगाइए। 

इधर मैं पत्तल परोस लेता हूँ।

मुझसे भूख सहन नहीं हो पा रही है।
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भोला भगत सेठजी बने भोलेबाबा को डाँटते हुए बोला, सेठजी ! 

भगवान् के काम में न तो जल्दीबाजी चलती है और न कंजूसी।
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मैं जब तक भगवान् को भोग नहीं लगा लेता, आप रसोई के पास भी नहीं फटक सकते।
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चुपचाप इधर बैठ जाइए और ॐ नमः शिवाय जपते रहिए। 

मैं अभी आता हूँ और आपको पेट भर भोजन कराता हूँ।
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सेठ बने शिवजी डाँट खाकर चुपचाप अपने आसन पर जा बैठे। 
.
सेठानी बनी पार्वती उनकी यह दशा देख बड़ी मुश्किल से अपनी हँसी रोक पाईं।
.
लेकिन जैसे ही भोला भगत पत्तल में सामग्री लेकर भगवान् को भोग लगाने मंदिर में गया... 
.
शिवजी पार्वतीजी को मौन रहने का संकेत करते हुए चुपके-चुपके पैर रखते हुए रसोई में पहुँच गए और उन्होंने एक-एक व्यंजन उठाकर चखना शुरू कर दिया।
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भोलेबाबा तो प्रसाद को चखते ही भौंचक्के रह गए... 
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खीर में चीनी की जगह नमक भरा हुआ था और सब्जियों में चीनी भरी हुई थी। 
.
जैसे ही भोले बाबा ने रोटी का एक ग्रास तोड़कर मुँह में दिया, वे सी-सी करने लगे, क्योंकि रोटी में मिर्च ही मिर्च भरी थी। 
.
वे सी-सी करते हुए उल्टे पैर भाग आए और अपने आसन पर जा बैठे।
.
माँ पार्वती अपने स्वामी की यह हालत देखकर खिलखिलाकर हँस पड़ीं।
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इससे पहले कि भोलेबाबा पार्वती जी के सामने कुछ सफाई दे पाते, भोला भगत ॐ नमः शिवाय मंत्र का जप करते हुए आ पहुँचा। 
.
उसने भोग को रसोई में मिलाकर उसे पवित्र बना डाला और फिर सेठजी के सामने पत्तल परोसकर हाथ जोड़कर बोला... 
.
सेठजी ! 

अब आप जी भरकर प्रसाद पाइए।
.
भोलेबाबा तो अभी-अभी भक्त की भक्ति से भी जोरदार उसके हाथ की बनी हुई रसोई चख चुके थे, अतः उसे जीमने की बात सुनकर उनके पसीने छूटने लगे। 
.
कभी वे भोला का तो कभी पार्वती का मुख देखने लगते। 
.
भोला को सेठजी की ढील बर्दाश्त नहीं हुई और बोला, सेठजी ! 

अब क्या हो गया आपको ? 

अभी-अभी तो इतनी उतावली मचा रहे थे ? 
.
अब क्यों नहीं जीमते ? 

आप जीमोगे, तभी तो माताजी भी प्रसाद ग्रहण करेंगीं और फिर मैं भी प्रसाद पाऊँगा।
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भोला की ललकार सुनकर भोलेबाबा ने चुपचाप खीर का कुल्हड़ उठाया और सारी नमकीन खीर गटागट पी गए।
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कुल्हड़ खाली होने की देर थी कि भोला ने उसे झट से भर दिया। 
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अपने प्रिय भक्त के हाथों परोसे हुए भोग में भगवान् को आज दुगना स्वाद आने लगा। 

भोला परोसता गया और भोलेबाबा पीते गए।
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जगन्माता पार्वती भक्त और भगवान् दोनों के प्रेम को देख-देखकर मंत्रमुग्ध होती रहीं। 
.
जब सारी रसोई समाप्त हो गई तो भगवान् ने एक जोर की डकार ली।
.
भोला को होश आया और बोला, वाह सेठजी वाह ! 

मैं ही बावला था, जो इतनी थोड़ी-सी रसोई बनाई। 
.
मुझे पता होता कि आपको प्रसाद ग्रहण करने का इतना शौक है, तो और भी ज्यादा रसोई बनाता।
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भोलेबाबा अपने पेट पर हाथ फेरते हुए सेठानी बनी पार्वतीजी की ओर मुस्कराकर देखते हुए बोले...
.
पुजारीजी ! 

मैं इतना रोज कहाँ खाता हूँ ? 

किंतु आज प्रसाद इतना स्वादिष्ट बना था कि अपने पर वश ही नहीं रहा और खाता ही चला गया।
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किंतु तभी भोला भक्त रुआँसा होकर बोला... 
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सेठजी

वह तो आपने ठीक किया। 




लेकिन माताजी तो भूखी ही रह गईं।
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ममतामयी पार्वती माँ से भोला का रुआँसा मुख देखा नहीं गया।

उन्होंने बची हुई खीर की चार बूँदें अपने कंठ में टपका लीं।
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भोलेबाबा द्वारा भोग लगाने से प्रसाद में अद्भुत अलौकिक स्वाद भर गया था। 
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ऐसी सुगंधित और मीठी खीर चखकर जगज्जननी आकंठ तृप्त हो गईं और उनके तृप्त होते ही सृष्टि का प्रत्येक प्राणी तृप्त हो गया।
.
भोला भगत बोला, 

सेठजी

आपने और माताजी ने प्रसाद ग्रहण कर लिया, इससे मुझे अत्यंत संतोष हुआ है। 
.
समझ लीजिए कि आप दोनों द्वारा प्रसाद ग्रहण करने से मेरा भी पेट भर गया। 
.
मेरी तो वैसे भी महीने में चार-चार एकादशी हो जाती हैं। 

किंतु मैं भी एक दाना ले ही लेता हूँ, जिससे कि भोलेबाबा के प्रसाद का अनादर न हो।
.
यह कहकर जैसे ही भोला ने खीर के पात्र में लगा चावल का एक दाना उठाकर अपने कंठ में डाला...
.
उसकी जन्म जन्मान्तर की भूख-प्यास मिट गई और समस्त वासनाओं और इच्छाओं की तृप्ति हो गई।
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उसके ज्ञान के नेत्र खुल गए और उसने देखा कि उसके सम्मुख त्रिलोकीनाथ भगवान् शंकर और जगज्जननी माँ पार्वती आशीर्वाद की मुद्रा में मुस्कराते हुए खड़े हैं। 
.
भोला दौड़कर उनके चरणों में लोट गया। 

लोटता गया, लोटता गया.. 
और उन्हीं में समा गया।

 *🌹‼शिव शिव शिव शिव शिव ‼*🌹
हर हर महादेव हर 
🌹🌹🌹🌹जय श्री द्वारकाधीश🌹🌹🌹🌹      

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 25 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Dhanlakshmi Strits , Marwar Strits, RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 WHATSAPP नंबर : + 91 7598240825 ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85
Email: prabhurajyguru@gmail.com
आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।"रावणत्व" है क्या?? 01??"हे ब्राह्मणों! संस्कार के वर्णसंकरता से बचो "!!!"उपजे" जदपि पुलत्स्य कुल पावन! अमल!! अनूप!!!जदपि महिसुर श्राप बस भए सकल अघरूप।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।

"रावणत्व" है क्या?? 01??

"हे ब्राह्मणों! संस्कार के वर्णसंकरता से बचो "!!!

"उपजे" जदपि पुलत्स्य कुल पावन! 

अमल!! 

अनूप!!!

जदपि महिसुर श्राप बस भए सकल अघरूप।।

पुलत्स्य ऋषि ब्रह्मा जी के मानस पुत्र जो अत्यंत पवित्र, निर्दोष और जिस वंश के श्रेष्ठता की कोई उपमा नहीं, उदाहरण नहीं , रावण उसी वंश में "उपजा" है।

तुलसी की अतुल सी कला देखिए..

"उपजे"- 

उपज शब्द सामान्यतः खेती के लिए प्रयोग किया जाता है। 

पशु के उत्पन्न होने पर

 "बियानी" 

ब्याना शब्द का प्रयोग करते हैं।

श्रीराम विमुख संतान को जन्म देना अर्थात्

 "बिआनी" ,

पशुवत्...नतरु बाँझ भलि, बादि बिआनी। 
राम बिमुख सुत तें हित हानी।।

"उपजे" जदपि पुलत्स्य कुल पावन अमल अनूप...

किसान कभी नहीं चाहता कि उसके खेत में खर पतवार उगे और फसलों को नष्ट करे ,
उसी प्रकार पुलत्स्य कुल में रावणत्व उनके इच्छा विरुद्ध है।

नियम कहता है कि...
प्रीति बिरोध समान सन करिअ नीति असि आही।

अर्थात् विवाह के लिए वर कुल और कन्या कुल में समानता, स्वभाव मेल खाता हो।

अब जरा विचार करें कि विश्रवा मुनि और राक्षस पुत्री कैकशी के संस्कार में कोई समानता थी??

विश्रवा मुनि उत्तम ब्राह्मण पुलत्स्य पुत्र
और कैकशी मदिरा प्रेमी राक्षस पुत्री,

अर्थात् ये वर्णसंकर विवाह हुआ कि नहीं?

और वर्णसंकरता का परिणाम क्या होता है वह गीता में देखिए...

"अधर्माभिभवात्कृष्णः प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णशंकरः।।
संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः।।
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः।।
सात्विक ब्राह्मण काम पूर्ति हेतु यदि तामसी ( राक्षसी ) प्रवृत्ति के कन्या से विवाह करेगा तो क्या होगा?

 जो ब्राह्मण यज्ञ आदि अनुष्ठान के माध्यम से देवताओं को पोषित करते हैं, दैत्य गुरु शुक्राचार्य राक्षसों को उन्हीं ब्राह्मणों को मोहरा बनाने को कहे जिसके परिणामस्वरूप विश्रवा कैकशी विवाह हुआ। 

योजना स्पष्ट है कि ब्राह्मण कुल में जन्मा राक्षस अधिक बलवान, बुद्धिमान होगा। 

चूँकि राक्षस देवताओं से अधिक बलवान होने पर भी बुद्धि में पराजित हो जाते थे , 

अतः ब्राह्मण कुल  ( पुलत्स्य वंश ) , शुक्राचार्य के षड्यंत्र का शिकार हुआ, जिसमें विश्रवा मुनि की कामेक्षा भावी वश सहायक हुआ।

और यदि उनके संतान..

".महिष खाइ करि मदिरा पाना"!!!
"करसि पान सोवसि दिनु राती "!!

अर्थात् अभक्ष्य भोजन , मदिरा सेवन, कुसमय में शयन  करे तो उसे भी ब्राह्मण कहेंगे ?

कहीं आप ब्राह्मण संस्कार में वर्णसंकरता को बढ़ावा नहीं न देना चाहते हैं??

मेरे भाई!

ब्राह्मणों को ऐसे षड्यंत्र से बचना चाहिए। 

लेकिन मूर्खता देखिए कि आजकल रावणत्व का ही महिमा मंडन किया जा रहा है।

राम राम राम सीताराम जय राम राम राम सीताराम........राम राम राम सीताराम राम जय जय राम राम राम सीताराम राम राम राम
🙏🙏🙏【【【【【{{{{ (((( मेरा पोस्ट पर होने वाली ऐडवताइस के ऊपर होने वाली इनकम का 50 % के आसपास का भाग पशु पक्षी ओर जनकल्याण धार्मिक कार्यो में किया जाता है.... जय जय परशुरामजी ))))) }}}}}】】】】】🙏🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
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*"श्रीरामचन्द्रजी का वनवासी प्रसंग "*
 
*पिछली पोस्ट से आगे-*

       गोस्वामीजी कहते हैं कि अयोध्याकाण्ड के प्रारंभ में कर्म, भक्ति और उपासना का जो वास्तविक रूप प्रस्तुत किया गया है, तथा रामराज्य की स्थापना में आने वाले जिन विध्नों का संकेत किया गया है, उन्हें हम और आप हृदयंगम करने की चेष्टा करें। 

महाराज श्री दशरथ रामराज्य का निर्माण करना चाहते हैं पर रामराज्य का निर्माण वे नहीं कर पाते। 

अपने संकल्प में उन्हें जो सफलता नहीं मिली उसका कारण है कि उनकी धारणा यह थी कि स्वर्ण के सिंहासन पर जब राम का राजतिलक हो जाएगा, तो रामराज्य की स्थापना अपने आप हो जायेगी। 

किन्तु रामराज्य का तात्पर्य स्वर्ण सिंहासन पर श्रीराम का बैठना ही नहीं, अपितु जब राम हमारे हृदय के सिंहासन पर बैठ जायें तब सच्चे अर्थों में रामराज्य की स्थापना होती है।

इसका अभिप्राय यह है कि संसार में जितने राज्य हैं, उन राज्यों में मुख्य वस्तु है व्यवस्था। 

जिस राज्य की जितनी श्रेष्ठ व्यवस्था होती है उसकी उतनी ही प्रशंसा की जाती है। 

पर रामराज्य का तात्पर्य उत्कृष्ट व्यवस्था नहीं है अपितु रामराज्य का तात्पर्य है कि जब व्यक्ति का हृदय इतना बदल जाय कि उसको नियंत्रित करने ( सही मार्ग पर चलाने ) के लिए किसी बाह्य व्यवस्था की आवश्यकता न रह जाय। 

किन्तु प्रारंभ में रामराज्य क्यों नहीं स्थापित हो पाया तथा आगे चलकर स्थापित हुआ, उन दोनों परिस्थितियों में क्या अंतर था?

इसकी कुछ चर्चा आपके समक्ष की जायेगी।

     अयोध्या में एक नारी पात्र है मंथरा। 

और जब मन्थरा को यह पता चलता है कि कल अयोध्या के राजसिंहासन का उत्तराधिकार राम को प्राप्त होगा तो उसके अन्त:करण में अत्यंत दुख होता है। 

वह निर्णय कर लेती है कि किसी न किसी प्रकार से इस कार्य को रोकना है। 

वह मन्थरा भी कैकेयी जी को बरगलाने में इतनी समर्थ हो जाती है कि अन्त में कैकेयी मन्थरा के वशीभूत हो जाती है। 

उसका परिणाम होता है कि रामराज्य की स्थापना के स्थान पर श्रीराम का वन-गमन हो जाता है। 

यह मन्थरा के द्वारा कैकेयी का बरगला दिया जाना बड़ा अटपटा सा प्रतीत होता है तथा कैकयी जी के प्रारंभिक स्वरुप को देखकर तो कोई यह कल्पना भी नहीं कर सकता है कि ऐसे विचारों वाली कैकेयी बदलकर इस प्रकार का रुप ले लेंगी। 




क्योंकि जिस समय मन्थरा आंसू बहाती हुई और शोक की मुद्रा में कैकेयी जी के महल में प्रवेश करती है, उस समय मन्थरा की दशा देखकर उनको लगा कि अयोध्या में कहीं कोई ऐसी दुर्घटना तो नहीं हो गई है कि जिसका अमांगलिक समाचार लेकर मन्थरा आयी है। 

और तब व्याकुल होकर उन्होंने पहला वाक्य मन्थरा से यह कहा कि मन्थरा! 

तुम सही-सही बताओ कि सब लोग कुशलपूर्वक तो हैं?

और तब मन्थरा ने पूछ दिया कि आप किसकी कुशलता के विषय में सबसे अधिक चिंतित हैं? 

और तब जो वाक्य कैकेयीजी ने कहा उसको पढ़कर आश्चर्य होता है। 

शेष अगले अंक में.....
         -तुलशीकृत रामायण
############🙏############

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 25 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Dhanlakshmi Strits , Marwar Strits, RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

। श्रीमद्भागवत गीता प्रर्वचन ।।कृष्ण को समझना इतना सरल नहीं है।🏵️🏵️ 🏵️मनुष्याणां सहस्रेषुकश्चिद्यतति सिद्धयेयततामपि सिद्धानांकश्चिद वेत्ति मां तत्वत: _(भगवद गीता ७.३)कई हजारों, लाखों लोगों में से एक अपने जीवन को सफल बनाने के लिए उत्सुक है ।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।  श्रीमद्भागवत गीता प्रर्वचन ।।

कृष्ण को समझना इतना सरल नहीं है।
🏵️🏵️
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मनुष्याणां सहस्रेषु
कश्चिद्यतति सिद्धये
यततामपि सिद्धानां
कश्चिद वेत्ति मां तत्वत:
         _(भगवद गीता ७.३)

कई हजारों, लाखों लोगों में से एक अपने जीवन को सफल बनाने के लिए उत्सुक है । 

कोई भी इच्छुक नहीं । 

व्यावहारिक रूप में, वे वास्तव में जीवन की सफलता क्या है यह जानते नहीं हैं । 

आधुनिक सभ्यता, हर कोई सोच रहा है, "मझे अगर एक अच्छी पत्नी मिलती है और अच्छी मोटर गाड़ी और एक अच्छा मकान मिलता है, वह सफलता है ।" 

यही सफलता नहीं है । 

यह अस्थायी है ।

 वास्तविक सफलता माया के चंगुल से बाहर निकलना है, अर्थ है यह भौतिक बद्ध जीवन जिसके अंतर्गत है जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और बीमारी । 

हम जीवन की कई विविधता से गुजर रहे हैं, और यह मनुष्य जीवन एक अच्छा मौका है निकलने का यह सिलसिला, शरीर एक के बाद एक बदलने का । 

आत्मा शाश्वत और आनंदित है क्योंकि भगवान कृष्ण का अंश है, सच-चिद-आनंद, सच्चिदानन्दमय ।

दुर्भाग्य से, इस भौतिक बद्ध जीवन में हम विभिन्न शरीर बदल रहे हैं, लेकिन हम फिर से उस आध्यात्मिक स्तर पर नहीं हैं, जहाँ कोई जन्म, मृत्यु नहीं है । कोई विज्ञान नहीं है । 

उस दिन एक मनोचिकित्सक मुझे मिलने के लिए आया था । 

और तुम्हारी शिक्षा कहाँ है जो आत्मा को समझने के लिए है, उसकी स्वाभाविक स्थिति । 

इसलिए व्यावहारिक रूप से पूरी दुनिया अंधेरे में है । 

वे जीवन के इस काल - पचास, साठ या सौ साल में रुचि रखते हैं, लेकिन उन्हे पता नहीं है कि, हम सच्चिदानन्दमय हैं, और इस भौतिक शरीर के कारण हम जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और बीमारी के अधीन हैं । 

और यह लगातार चल रहा है ।

तो श्री चैतन्य महाप्रभु, उनकी महान दया के कारण गिरी हुई आत्माओं के लिए, वह अवतरित हुए ।

कृष्ण भी आते हैं । 

लेकिन कृष्ण इतने उदार नहीं हैं । 

कृष्ण कि शर्त है "तुम पहले शरण ग्रहण करो । 

तो मैं तुम्हारा उत्तरदायित्व लूँगा । 

" लेकिन चैतन्य महाप्रभु कृष्ण से भी अधिक दयालु हैं, हालांकि श्री कृष्ण और चैतन्य महाप्रभु, एक ही बात है । 

तो चैतन्य महाप्रभु की दया से हम इतनी आसानी से कृष्ण को समझ रहे हैं । 

तो वह चैतन्य महाप्रभु यहां मौजूद हैं । 

तुम इनकी पूजा करो । 

यह बहुत मुश्किल नहीं है । 

यज्ञै: संकीर्तनै: प्रायैर् यजन्ति हि सु-मेधस: ।
 कृष्ण-वर्णं त्विषाकृष्णं सांगोपांगास्त्र-पार्षदं, यज्ञै: संकीर्तनं (श्रीमद भागवतम ११.५.३२)।

 तुम केवल हरे कृष्ण मंत्र का जप करो और जो अर्पण कर सकते हो, करो चैतन्य महाप्रभु को । 

वे बहुत दयालु हैं। 

वे अपराध नहीं लेते हैं । 

 चैतन्य महाप्रभु स्वेच्छा से गिरी हुई आत्माओं का उद्धार करने के लिए आए हैं । 

थोडी सी सेवा, वे संतुष्ट हो जाएंगे । 

लेकिन उपेक्षा न करो । 

क्यों कि वे बहुत ही उदार और दयालु हैं, इसका मतलब यह नहीं है हम उनकी स्थिति भूल जाएँ । 

वे श्रीभगवान हैं ......

इसलिए हमें उन्हे बहुत महान सम्मान प्रदान करना चाहिए, जहाँ तक संभव हो... 

लेकिन लाभ यह है कि चैतन्य महाप्रभु अपराध नहीं लेते हैं । 

और 

उनका पूजा करना, उन्हे प्रसन्न करना, बहुत आसान है । 

यज्ञै: संकीर्तनै: प्रायैर् यजन्ति हि सु-मेधस: । 

केवल तुम हरे कृष्ण महा मंत्र का जप करो और नृत्य करो, और चैतन्य महाप्रभु बहुत प्रसन्न होंगे ।

 उन्होंने इस प्रक्रिया की शुरुआत की- नृत्य और जप, और यह भगवान प्राप्ति का सबसे आसान तरीका है ।

 इसलिए जहां तक ​​संभव हो... यदि संभव हो तो, चौबीस घंटे । 

अगर यह संभव नहीं है, तो कम से कम चार बार, छह बार, हरे कृष्ण मंत्र का जप करो चैतन्य महाप्रभु के सामने, और तुम्हे अपने जीवन में सफलता प्राप्त होगी । 

यह एक सत्य है ।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे 
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।
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पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
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