।। श्रीमददेवीभागवत प्रवचन - माँ कालरात्रि ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्रीमददेवीभागवत  प्रवचन - माँ कालरात्रि।।

श्रीमददेवीभागवत  प्रवचन - माँ कालरात्रि !

श्रीमददेवीभागवत  प्रवचन - माँ कालरात्रि !

नवरात्र का सातवाँ दिन माँ कालरात्रि :


एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता। 
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा। 
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥



 

Lavie Sport 47cm Osprey 28 Litres Laptop Backpack For Men & Women | Business Laptop Bag | Upto 15.6" Notebook/Macbook Compatible (Black)

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Care instructions
Machine Wash
Country of Origin
India






About this item
  • This modern laptop backpack features a padded laptop sleeve, a simple organizer, mesh-padded back panel 2 side pockets and an adjustable shoulder strap, making it easy for you to express yourself and stand out from the crowd
  • The laptop sleeve fits up to a 15.6" laptop. The organizer lets you store all your necessary things like keys, pens, cell phones, power bank etc with easy access
  • This backpack is built with water-resistant polyester fabric
  • External Dimension: Length – 31.5cm, Width – 19cm, Height – 47cm. Capacity – 28 litres.
  • Manufacturer warranty - 12 months




नाम से अभिव्यक्त होता है कि मां दुर्गा की यह सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है अर्थात जिनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है। 

नाम से ही जाहिर है कि इनका रूप भयानक है। 

सिर के बाल बिखरे हुए हैं और गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है। 

अंधकारमय स्थितियों का विनाश करने वाली शक्ति हैं कालरात्रि। 

काल से भी रक्षा करने वाली यह शक्ति है। 
 
इस देवी के तीन नेत्र हैं। 

ये तीनों ही नेत्र ब्रह्मांड के समान गोल हैं। 

इनकी सांसों से अग्नि निकलती रहती है। 

ये गर्दभ की सवारी करती हैं। 

ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वर मुद्रा भक्तों को वर देती है। 

दाहिनी ही तरफ का नीचे वाला हाथ अभय मुद्रा में है। 

यानी भक्तों हमेशा निडर, निर्भय रहो। 
 
बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा तथा नीचे वाले हाथ में खड्ग है। 

इनका रूप भले ही भयंकर हो लेकिन ये सदैव शुभ फल देने वाली मां हैं। 

इसी लिए ये शुभंकरी कहलाईं अर्थात् इनसे भक्तों को किसी भी प्रकार से भयभीत या आतंकित होने की कतई आवश्यकता नहीं। 

उनके साक्षात्कार से भक्त पुण्य का भागी बनता है। 
 
कालरात्रि की उपासना करने से ब्रह्मांड की सारी सिद्धियों के दरवाजे खुलने लगते हैं और तमाम असुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भागने लगती हैं। 

इस लिए दानव, दैत्य, राक्षस और भूत-प्रेत उनके स्मरण से ही भाग जाते हैं। 
 
ये ग्रह बाधाओं को भी दूर करती हैं और अग्नि, जल, जंतु, शत्रु और रात्रि भय दूर हो जाते हैं। 

इनकी कृपा से भक्त हर तरह के भय से मुक्त हो जाता है।

माँ कालरात्रि की कथा!!!!!!!!

माँ काल रात्रि  प्रत्येक भक्त का कल्याण करने वाली है। 

माँ के विषय में पुराणों कई कथानक मिलते हैं।

जिसमें सबसे प्रमाणिक दुर्गा सप्तशती है ।

जो दुर्गा के नवरूपों की उत्पत्ति के विषय को बड़े ही सार गर्भित रूप से जानकारी देती है। 

इसके अतिरिक्त देवी भागवत तथा अन्य पुराणों में भी माँ की कथा व महिमा के अंश प्राप्त होते है।

 काल रात्रि को काली का ही रूप माना जाता है। 

काली माँ इस कलियुग मे प्रत्यक्ष फल देने वाली है। 

क्योंकि काली, भैरव तथा हनुमान जी ही ऐसे देवता व देवी हैं, जो शीघ्र ही जागृत होकर भक्त को मनोवांछित फल देते हैं।

काली के नाम व रूप अनेक हैं। 

किन्तु लोगों की सुविधा व जानकारी के लिए इन्हें भद्रकाली, दक्षिण काली, मातृ काली व महाकाली भी कहा जाता है।

 इनका यह प्रत्येक रूप नाम समान रूप से शुभ फल देने वाला है, जिससे इन्हें शुभंकारी भी कहते हैं। 

अर्थात् भक्तों का सदा शुभ करने वाली हैं। 

दुर्गा सप्तशती में महिषासुर के बध के समय माँ भद्रकाली की कथा वर्णन मिलता है। 

कि युद्ध के समय महाभयानक दैत्य समूह देवी को रण भूमि में आते देखकर उनके ऊपर ऐसे बाणों की वर्षा करने लगा ।

जैसे बादल मेरूगिरि के शिखर पर पानी की धार की बरसा रहा हो। 

तब देवी ने अपने बाणों से उस बाण समूह को अनायास ही काटकर उसके घोड़े और सारथियों को भी मार डाला।

 साथ ही उसके धनुष तथा अत्यंत ऊॅची ध्वजा को भी तत्काल काट गिराया। 

धनुष कट जाने पर उसके अंगों को अपने बाणों से बींध डाला।

और भद्रकाली ने शूल का प्रहार किया। 

उससे राक्षस के शूल के सैकड़ों टुकड़े हो गये, वह महादैत्य प्राणों से हाथ धो बैठा।

इसी प्रकार चण्ड और मुण्ड के वध के लिए माँ विकराल मुखी काली प्रकट हुई। 

जिसकी कथा के कुछ अंश इस प्रकार हैं ऋषि कहते हैं – 

तदन्तर शुम्भ की आज्ञा पाकर वे चण्ड -मुण्ड आदि दैत्य चतुरंगिणी सेना के साथ अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित हो चल दिये। 

फिर गिरिराज हिमालय के सुवर्णमय ऊॅचे शिखर पर पहॅंचकर उन्होंने सिंह पर बैठी देवी को देखा।

उन्हें देखकर दैत्य लोग तत्परता से पकड़ने का उद्योग करने लगे। 

तब अम्बिका ने  उन शत्रुओं के प्रति बड़ा क्रोध किया। 

उस समय क्रोध के कारण उनका मुख काला पड़ गया। 

ललाट में भौंहें टेढ़ी हो गयीं और वहाँ  से तुरंत विकराल मुखी काली प्रकट हुई, जो तलवार और पाश लिये हुए थी। 

वे विचित्र खट्वांग धारण किये और चीते के चर्म की साड़ी पहने नर-मुण्डों की माला से विभूषित थीं। 

उनके शरीर का मांस सूख गया था। 

केवल हड्यिों का ढ़ाचा था ।

जिससे वे अत्यंत भंयकर जान पड़ती थी। 

उनका मुख बहुत विशाल था ।

जीभ लपलपाने के कारण वै और भी डरावनी प्रतीत होती थीं।

उनकी आंखें भीतर को धॅसी हुई और कुछ लाल थीं ।




वे अपनी भयंकर गर्जना से सम्पूर्ण दिशाओं को गुंजा रही थी। 

बड़े-बड़े दैत्यों का वध करती हुई वे कालिका देवी बड़े बेग से दैत्यों की उस सेना पर टूट पड़ीं और उन सबको भक्षण करने लगीं। आदि कथानक है।

काल रात्रि के मंत्र : - 

माँ काल रात्रि माता के अनेकों उपयोगी मंत्र यथा स्थान संबंधित ग्रथों में उपलब्ध होते हैं।

 जिसमें प्रत्येक मंत्र का अपना महत्व है। 

जिसमें विभिन्न प्रकार के भय, शत्रु भय, जल भय, रोग भय आदि को दूर करने के मंत्र है। 

माँ अपने श्रद्धालु भक्तों को सभी वांछित वस्तुएं प्रदान करने वाली हैं। 

यहाँ  काल रात्रि के आराधना के मंत्रों को दिया जा रहा है।

दंष्ट्राकरालवदने   शिरोमालाविभूषणे।
 चामुण्डे मुण्डमथने  नारायणि नमोऽस्तु ते ।।

 या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।           

माता काल रात्रि के महात्म्य को दुर्गा सप्तशती में कई स्थानों पर वर्णित किया है। 

भक्तों को अभय देने व विभिन्न प्रकार के भयों से मुक्ति देने वाली कालिरात्रि का बड़ा ही महात्म्य है। 

अतः श्रद्धालुओं को वैदिक रीति द्वारा अनुष्ठान व व्रत का पालन करते हुए । 

माँ कालरात्रि की पूजा बड़े ही निष्ठा से करना चाहिए।

जय माँ अंबे...!!!
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।। श्री भविष्यपुराण प्रवचन - होनी तो प्रबल है ।।

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।। श्री भविष्यपुराण प्रवचन  - होनी तो प्रबल है ।।


 श्री भविष्यपुराण प्रवचन  - होनी तो प्रबल है

श्री आध्यात्मिकता के नशा की संगत — श्री भविष्यपुराण प्रवचन
श्री सीता विवाह और श्रीराम के राज्याभिषेक का शुभ मुहूर्त, होनी के प्रबल विधान तथा मनुष्य के पुरुषार्थ का शास्त्रोक्त रहस्य।

एक आवश्यक शास्त्रीय स्पष्टता: सीता विवाह और श्रीराम के राज्याभिषेक की कथा का मुख्य प्रमाण वाल्मीकि रामायण और श्रीरामचरितमानस में मिलता है। भविष्यपुराण में ज्योतिष, मुहूर्त, धर्म और कर्म के विषय अवश्य मिलते हैं, परंतु इन दोनों घटनाओं को एक ही भविष्यपुराण प्रसंग के रूप में प्रस्तुत करना प्रमाणित नहीं है।

*सीता विवाह और राम का राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त में किया गया।* 

*फिर भी न वैवाहिक जीवन सफल हुआ न राज्याभिषेक।*

*जब मुनि वसिष्ठ से इसका जवाब मांगा गया तो उन्होंने साफ कह दिया।*

*सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेहूं मुनिनाथ।*

*लाभ हानि, जीवन....!!!

*अर्थात, जो विधि ने निर्धारित किया है वही होकर रहेगा।* 

*न राम के जीवन को बदला जा सका, न कृष्ण के।* 





इस लिए नीचे का प्रवचन उपलब्ध शास्त्रीय प्रमाणों पर आधारित है; जहाँ भविष्यपुराण का सामान्य सिद्धांत है, वहाँ उसे उसी रूप में रखा गया है।

न ही शिव ने शती के मृत्यु को टाल सके, जबकि मृत्युंजय मंत्र उन्ही का आवाहन करता है।*

रामकृष्ण परमहंस भी अपने कैंसर को न टाल सके।

न रावण ने अपने जीवन को बदल पाया न कंस।

जबकि दोनों के पास समस्त शक्तियाँ थी।

मानव अपने जन्म के साथ ही जीवन मरण, यस अपयश, लाभ हानि, स्वास्थ, बीमारी, देह रंग, परिवार समाज, देश स्थान सब पहले से ही निर्धारित कर के आता है।

साथ ही साथ अपने विशेष गुण धर्म, स्वभाव, और संस्कार सब पूर्व से लेकर आता है।

शुभ मुहूर्त का वास्तविक अर्थ ;

सनातन धर्म में मुहूर्त का अर्थ केवल घड़ी देखकर कोई कार्य आरंभ कर देना नहीं है। 

मुहूर्त का संबंध काल, ग्रह-नक्षत्र, तिथि, वार, लग्न, कर्म और कार्य के उद्देश्य से है। 

ज्योतिषशास्त्र में उचित समय का चयन शुभ कर्म को अनुकूल वातावरण देने के लिए किया जाता है।

परंतु शुभ मुहूर्त का यह अर्थ नहीं कि मनुष्य अपने प्रत्येक कर्म का फल अपनी इच्छा के अनुसार निश्चित कर सकता है। 

मुहूर्त पुरुषार्थ का अंग है, भाग्य का पूर्ण स्वामी नहीं।

शास्त्रों में कर्म के फल की व्यवस्था को अत्यंत गंभीरता से समझाया गया है। 

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

अर्थात् मनुष्य का अधिकार कर्म करने में है, फल पर नहीं।

इस सिद्धांत से स्पष्ट होता है कि शुभ मुहूर्त में कर्म करना उचित है, किंतु फल की अंतिम व्यवस्था केवल मनुष्य की इच्छा से नहीं चलती।





सीता विवाह का शुभ मुहूर्त ;

श्रीराम और माता सीता का विवाह सनातन धर्म के महान आदर्शों में से एक है। 

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में राजा जनक द्वारा सीता का स्वयंवर, भगवान श्रीराम द्वारा शिवधनुष का भंग और उसके पश्चात् विवाह का विस्तृत वर्णन मिलता है।

राजा जनक ने प्रतिज्ञा की थी कि जो वीर भगवान शिव के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने में समर्थ होगा, उसी के साथ सीता का विवाह किया जाएगा। 

श्रीराम ने गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से धनुष उठाया और उसे भंग कर दिया। 

इस प्रकार सीता का विवाह श्रीराम के साथ निश्चित हुआ।

इसके बाद राजा दशरथ को समाचार भेजा गया। 

अयोध्या से राजा दशरथ अपने पुत्रों और परिवार सहित मिथिला पहुँचे। 

वैदिक रीति से श्रीराम और सीता का विवाह संपन्न हुआ। 

साथ ही लक्ष्मण - उर्मिला, भरत - माण्डवी और शत्रुघ्न - श्रुतकीर्ति के विवाह भी हुए। 

यहाँ शास्त्र का मुख्य संदेश यह है कि विवाह केवल सांसारिक संबंध नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा, कर्तव्य और दो कुलों के मंगल का संस्कार है।

शुभ मुहूर्त का विधान विवाह के लिए इसलिए रखा जाता है कि संस्कार विधिपूर्वक, श्रद्धा से और अनुकूल काल में संपन्न हो। 

किंतु विवाह के पश्चात् आने वाली प्रत्येक परिस्थिति मनुष्य के नियंत्रण में नहीं होती।

श्रीराम और सीता का विवाह अत्यंत मंगलमय था। 

फिर भी आगे चलकर वनवास, रावण द्वारा सीताहरण और अनेक कठिन परिस्थितियाँ आईं। 

इससे विवाह की पवित्रता कम नहीं हुई। 

बल्कि यही सिद्ध हुआ कि धर्ममय जीवन में कठिनाइयाँ आने पर भी सत्य, निष्ठा और मर्यादा का त्याग नहीं करना चाहिए।

इस लिए यदि अपने जीवन मे परिवतर्न चाहते हैं ।

तो अपने कर्म बदलें।

आप के मदद के लिए स्वयं आपकी आत्मा और परमात्मा दोनों खड़े है।

उसे पुकारें। 

वह परमात्मा ही आप का सच्चा साथी है।






श्रीराम का राज्याभिषेक और विधि का विधान ;

वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड में राजा दशरथ ने श्रीराम को युवराज बनाने का निश्चय किया। 

अयोध्या में आनंद का वातावरण था। 

प्रजा प्रसन्न थी और राज्याभिषेक की तैयारियाँ होने लगीं।

राजा दशरथ ने शुभ मुहूर्त में श्रीराम के राज्याभिषेक का निर्णय किया। 

गुरु वशिष्ठ ने आवश्यक वैदिक विधियों और तैयारियों का मार्गदर्शन किया। 

श्रीराम स्वयं धर्मनिष्ठ, आज्ञाकारी और प्रजाहितकारी थे। 

उनके राज्याभिषेक का निर्णय राजधर्म और प्रजाधर्म की दृष्टि से अत्यंत उचित था।

किन्तु कैकेयी को पूर्व में प्राप्त दो वरदानों की स्मृति कराई गई। 

उसने दशरथ से भरत के लिए राज्य और श्रीराम के लिए चौदह वर्ष का वनवास माँगा। 

राजा दशरथ वचनबद्ध थे। 

वे अत्यंत दुखी हुए, परंतु दिए हुए वचन से पीछे नहीं हटे।

श्रीराम ने पिता की प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए राज्याभिषेक का अधिकार छोड़कर वनवास स्वीकार किया। 

लक्ष्मण और सीता भी उनके साथ वन गए।

यह प्रसंग बताता है कि शुभ मुहूर्त में निश्चित किया गया कार्य भी व्यापक कर्मफल और परिस्थितियों के कारण स्थगित हो सकता है। 

किंतु इसे इस रूप में नहीं समझना चाहिए कि शुभ मुहूर्त व्यर्थ है। 

शुभ मुहूर्त का उद्देश्य धर्मसम्मत कर्म के लिए अनुकूल समय चुनना है; वह मनुष्य को कर्मफल का स्वामी नहीं बनाता।

क्या शुभ मुहूर्त से होनी बदल सकती है ?

यह प्रश्न ज्योतिष और अध्यात्म दोनों का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है।

यदि शुभ मुहूर्त से प्रत्येक घटना निश्चित रूप से मनुष्य की इच्छा के अनुसार होने लगती, तो संसार में कोई विपरीत परिस्थिति उत्पन्न ही न होती। 

लेकिन शास्त्रों में कर्म, काल, दैव, पुरुषार्थ और ईश्वर की व्यवस्था का वर्णन मिलता है।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।

अर्थात् कोई भी मनुष्य क्षणभर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता।

कर्म करना मनुष्य के जीवन का स्वाभाविक धर्म है। 

शुभ मुहूर्त उसी कर्म को विधिपूर्वक करने की सहायता देता है। 

परंतु कर्म का फल अनेक कारणों से जुड़ा होता है। 

मनुष्य का पूर्वकर्म, वर्तमान पुरुषार्थ, अन्य प्राणियों के कर्म, सामाजिक परिस्थितियाँ और ईश्वर की व्यापक व्यवस्था—

इन सबका संबंध फल से हो सकता है।

इस लिए शुभ मुहूर्त को भाग्य बदलने की जादुई शक्ति मानना शास्त्रोक्त दृष्टि नहीं है।

परमपिता परमात्मा से ज्यादा शुभ चिंतक भला कौन हो सकता है हमारा ?

भविष्यपुराण में काल, धर्म और कर्म की शिक्षा ;

भविष्यपुराण के धर्म, दान, व्रत, संस्कार और आचार संबंधी उपदेशों में धर्मानुकूल जीवन, सत्कर्म, संयम और पुण्य की महत्ता पर बल मिलता है। 

पुराणों का सामान्य संदेश यह है कि मनुष्य को धर्म का पालन करना चाहिए, सत्कर्म करना चाहिए और अपने आचरण को शुद्ध रखना चाहिए।

मुहूर्तशास्त्र का संबंध भी इसी व्यापक धर्मव्यवस्था से है। 

विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञ, प्रतिष्ठा, यात्रा और अन्य शुभ कार्यों में उचित समय का विचार किया जाता है। 

किंतु मुहूर्त का उद्देश्य कर्म को धर्मसम्मत और अनुकूल काल में संपन्न करना है, न कि कर्मफल की संपूर्ण व्यवस्था को मनुष्य की इच्छा के अधीन कर देना।

इसलिए जब हम कहते हैं कि होनी प्रबल है, तो उसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य को पुरुषार्थ छोड़ देना चाहिए। 

इसका अर्थ है कि मनुष्य अपने अधिकार के कर्म को करते हुए फल के विषय में विनम्र रहे।

श्रीराम का वनवास: शुभ कर्म का महान फल ;

श्रीराम ने राज्याभिषेक का अधिकार छोड़कर पिता की आज्ञा का पालन किया। 

बाहरी दृष्टि से यह राजसुख का त्याग था, किंतु आध्यात्मिक दृष्टि से यह धर्म की विजय थी।

उन्होंने कहा—

पितु बचन मानहु मन मोरा।

श्रीरामचरितमानस में श्रीराम का चरित्र बताता है कि धर्म का पालन केवल सुख की स्थिति में नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी करना चाहिए।

वनवास का प्रसंग मनुष्य को यह सिखाता है कि यदि कोई शुभ कार्य रुक जाए, तो निराश होकर धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। 

कभी-कभी जीवन में ऐसी परिस्थिति आती है जिसमें तत्काल प्राप्त होने वाला लाभ छोड़कर बड़े धर्म की रक्षा करनी पड़ती है।

श्रीराम ने राज्याभिषेक का अवसर खोया, किंतु मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में संसार को आदर्श दिया। 

उनके वनवास से अनेक महान घटनाएँ हुईं—

ऋषियों की रक्षा, रावण का वध, धर्म की स्थापना और अयोध्या में रामराज्य की प्रतिष्ठा।

इस प्रकार एक स्थगित कार्य के भीतर भी व्यापक कल्याण का मार्ग छिपा हो सकता है।

माता सीता का चरित्र और होनी का रहस्य ;

माता सीता का जीवन भी धर्म, पतिव्रता, धैर्य और सत्यनिष्ठा का महान आदर्श है। 

वे श्रीराम के साथ वनवास में गईं। 

वन में अनेक कठिनाइयों का सामना किया। 

रावण द्वारा हरण के बाद भी उन्होंने अपने धर्म और आत्मसम्मान का त्याग नहीं किया।

शास्त्रीय दृष्टि से माता सीता का चरित्र यह सिखाता है कि बाहरी परिस्थिति मनुष्य के भीतर की पवित्रता को अनिवार्य रूप से नष्ट नहीं कर सकती। 

जो व्यक्ति धर्म में स्थित रहता है, वह कठिन समय में भी आत्मबल बनाए रख सकता है।

यहाँ शुभ मुहूर्त का गहरा आध्यात्मिक अर्थ समझ में आता है। 

शुभ समय में आरंभ किया गया विवाह जीवन की हर कठिनाई से मुक्त होने का वचन नहीं देता। 

बल्कि वह धर्ममय जीवन के लिए संकल्प देता है।

विवाह का संस्कार केवल सुख की प्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि परस्पर धर्मपालन, कर्तव्य, संयम और एक - दूसरे के जीवन में सहारा बनने के लिए भी है।

*परीक्षा संसार की।*

*प्रतीक्षा परमात्मा की।*

*और समीक्षा अपनी करनी चाहिए।*
                      
*लेकिन हम*

*परीक्षा परमात्मा की।*

*प्रतीक्षा सुख की।*

*और समीक्षा दूसरों की करते हैं।*

ज्योतिषशास्त्र में मुहूर्त का महत्व
वैदिक ज्योतिष में मुहूर्त का एक स्वतंत्र महत्व है। मुहूर्त का चयन करते समय तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण, लग्न, ग्रहबल, चंद्रबल और कार्य की प्रकृति जैसे विषयों का विचार किया जाता है।
विवाह के लिए अलग मुहूर्त, गृहप्रवेश के लिए अलग मुहूर्त और यज्ञ के लिए अलग मुहूर्त देखे जाते हैं। यह व्यवस्था इसलिए है कि कार्य को अनुकूल समय में किया जाए।
किन्तु किसी मुहूर्त को पूर्ण रूप से दोषरहित या किसी अन्य समय को पूर्ण रूप से निष्फल मानना उचित नहीं है। ज्योतिष में ग्रहों के फल का विचार भी देश, काल, पात्र और कर्म के अनुसार किया जाता है।
मुहूर्त मनुष्य के पुरुषार्थ का सहायक है। वह मनुष्य की बुद्धि, श्रद्धा, कर्म और अनुशासन को दिशा देता है। परंतु कर्मफल की अंतिम व्यवस्था व्यापक है।
इसलिए शास्त्रीय ज्योतिष का उचित उपयोग यह है कि शुभ कार्य के लिए अनुकूल समय चुना जाए, किंतु परिणाम के प्रति अहंकार न किया जाए।

होनी प्रबल है, पर पुरुषार्थ भी आवश्यक है
कभी-कभी लोग कहते हैं कि यदि होनी प्रबल है, तो कर्म करने की आवश्यकता क्या है?
यह विचार शास्त्रसम्मत नहीं है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म से विमुख नहीं किया। उन्होंने उसे युद्धभूमि में धर्मानुकूल कर्म करने का उपदेश दिया।
मनुष्य का कर्तव्य है कि वह उचित समय चुने, सही तैयारी करे, धर्मानुकूल निर्णय ले और अपने सामर्थ्य के अनुसार पुरुषार्थ करे। फल आने पर उसे प्रसन्नता या दुख के कारण विवेक नहीं खोना चाहिए।
यदि विवाह के लिए शुभ मुहूर्त चुना गया है, तो विवाह के बाद दांपत्य जीवन में प्रेम, सत्य, संयम और परस्पर सम्मान रखना भी आवश्यक है। यदि राज्याभिषेक का शुभ समय निश्चित हुआ है, तो राजा को प्रजापालन, न्याय और धर्म का पालन करना भी आवश्यक है।
केवल मुहूर्त देखकर कार्य कर देना पर्याप्त नहीं। कार्य के पीछे धर्म और सदाचार का होना आवश्यक है।

आध्यात्मिकता का वास्तविक नशा
श्री आध्यात्मिकता के नशा की संगत का अर्थ है कि मनुष्य सांसारिक चिंता, मोह और अहंकार के स्थान पर धर्म, सत्य, भक्ति और आत्मचिंतन में आनंद अनुभव करे।
सांसारिक नशा मनुष्य की बुद्धि को दुर्बल कर सकता है। आध्यात्मिकता का नशा विवेक को जागृत करता है। वह मनुष्य को कर्म करने, सत्य बोलने, संयम रखने और ईश्वर की व्यवस्था पर श्रद्धा रखने की प्रेरणा देता है।
श्रीराम का जीवन आध्यात्मिकता का यही आदर्श प्रस्तुत करता है। उन्होंने राज्याभिषेक के समय विनम्रता रखी और वनवास के समय भी धर्म नहीं छोड़ा। सीता ने सुख और दुख दोनों में अपने धर्म का पालन किया।
आध्यात्मिक व्यक्ति शुभ मुहूर्त का सम्मान करता है, किंतु केवल मुहूर्त पर निर्भर नहीं रहता। वह अपने कर्म, आचरण और मन की शुद्धता को भी महत्व देता है।

शुभ मुहूर्त में कार्य रुक जाए तो क्या करें?
यदि किसी शुभ कार्य का मुहूर्त निश्चित होने के बाद कार्य किसी कारण से रुक जाए, तो मनुष्य को घबराना नहीं चाहिए। पहले वास्तविक कारण को समझना चाहिए। यदि कार्य में कोई बाधा है, तो उसे दूर करने का उचित प्रयास करना चाहिए।
धार्मिक दृष्टि से प्रार्थना, सत्संग, दान, जप और सदाचार मन को स्थिर करने वाले साधन हैं। लेकिन किसी विशेष बाधा के लिए बिना प्रमाण किसी निश्चित दोष, ग्रह या शाप का आरोप नहीं करना चाहिए।
यदि विवाह का कार्य रुक गया है, तो परिवार को शांतिपूर्वक कारण समझना चाहिए। यदि गृहप्रवेश स्थगित हुआ है, तो आवश्यक तैयारी पूरी करके उचित समय चुनना चाहिए। यदि कोई राजकीय या सामाजिक कार्य टल गया है, तो उसके लिए विवेकपूर्ण निर्णय लेना चाहिए।
शुभ मुहूर्त का सम्मान और व्यावहारिक बुद्धि—दोनों का संतुलन ही उचित मार्ग है।

अंतिम शास्त्रीय संदेश
श्री सीता विवाह और श्रीराम के राज्याभिषेक का प्रसंग हमें बताता है कि शुभ मुहूर्त जीवन के धर्ममय कर्मों के लिए उपयोगी है। परंतु संसार की प्रत्येक घटना केवल मनुष्य की इच्छा से नहीं चलती।
श्रीराम का राज्याभिषेक स्थगित हुआ, लेकिन उनका धर्म स्थगित नहीं हुआ। सीता विवाह शुभ मुहूर्त में हुआ, लेकिन जीवन में कठिनाइयाँ आईं। फिर भी दोनों ने धर्म, सत्य और मर्यादा का त्याग नहीं किया।
इसलिए होनी के प्रबल विधान को समझकर मनुष्य को निष्क्रिय नहीं होना चाहिए। उसे शुभ समय चुनना चाहिए, उचित कर्म करना चाहिए और फल को ईश्वर की व्यवस्था मानकर स्वीकार करना चाहिए।
श्रीमद्भगवद्गीता का यह उपदेश इस रहस्य का सार है—
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
अर्थात् हे अर्जुन! योग में स्थित होकर, आसक्ति का त्याग करके कर्म करो।
यही शुभ मुहूर्त का आध्यात्मिक रहस्य है। शुभ समय कर्म के लिए है, धर्म कर्म की दिशा है, पुरुषार्थ मनुष्य का कर्तव्य है और फल की अंतिम व्यवस्था ईश्वर के अधीन है।

🙏जय जय राम राम श्री सीताराम🙏



पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 25 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Dhanlakshmi Strits , Marwar Strits, RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
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जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

।। श्रीमद देवी भागवत प्रवचन - दुर्गा सप्तशती के पाठ का महत्व।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्रीमद देवी भागवत प्रवचन ।।

।। श्रीमद देवी भागवत प्रवचन  - दुर्गा सप्तशती के पाठ का महत्व।। 

☀️(((दुर्गा सप्तशती के पाठ का महत्व)))

🕟माँ दुर्गा की आराधना और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ सर्वोत्तम है।

भुवनेश्वरी संहिता में कहा गया है- जिस प्रकार से ''वेद'' अनादि है, उसी प्रकार ''सप्तशती'' भी अनादि है।

 *दुर्गा सप्तशती के 700 श्लोकों में देवी-चरित्र का वर्णन है।* 

*दुर्गा सप्तशती में कुल 13 अध्याय हैं।* 

दुर्गा सप्तशती के सभी तेरह अध्याय अलग अलग इच्छित मनोकामना की सहर्ष ही पूर्ति करते है।

🚩प्रथम अध्याय : - 


इसके पाठ से सभी प्रकार की चिंता दूर होती है एवं शक्तिशाली से शक्तिशाली शत्रु का भी भय दूर होता है शत्रुओं का नाश होता है . .

🚩 द्वितीय अध्याय : - 


इसके पाठ से बलवान शत्रु द्वारा घर एवं भूमि पर अधिकार करने एवं किसी भी प्रकार के वाद विवाद आदि में विजय प्राप्त होती है . .

🚩 तृतीय अध्याय : -


तृतीय अध्याय के पाठ से युद्ध एवं मुक़दमे में विजय, शत्रुओं से छुटकारा मिलता है . .!




*🚩 चतुर्थ अध्याय: -* 

इस अध्याय के पाठ से धन, सुन्दर जीवन साथी एवं माँ की भक्ति की प्राप्ति होती है .

*🚩 पंचम अध्याय: -* 

पंचम अध्याय के पाठ से भक्ति मिलती है, भय, बुरे स्वप्नों और भूत प्रेत बाधाओं का निराकरण होता है . .!




*🚩 छठा अध्याय: -* 

इस अध्याय के पाठ से समस्त बाधाएं दूर होती है और समस्त मनवाँछित फलो की प्राप्ति होती है . .

*🚩 सातवाँ अध्याय: -* 

इस अध्याय के पाठ से ह्रदय की समस्त कामना अथवा किसी विशेष गुप्त कामना की पूर्ति होती है .

*🚩 आठवाँ अध्याय: -*

 अष्टम अध्याय के पाठ से धन लाभ के साथ वशीकरण प्रबल होता है . .

*🚩 नौवां अध्याय:-* 

नवम अध्याय के पाठ से खोये हुए की तलाश में सफलता मिलती है, संपत्ति एवं धन का लाभ भी प्राप्त होता है .




*🚩 दसवाँ अध्याय:-* 

इस अध्याय के पाठ से गुमशुदा की तलाश होती है, शक्ति और संतान का सुख भी प्राप्त होता है . .,

*🚩 ग्यारहवाँ अध्याय:-*

 ग्यारहवें अध्याय के पाठ से किसी भी प्रकार की चिंता से मुक्ति , व्यापार में सफलता एवं सुख-संपत्ति की प्राप्ति होती है .
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*🚩 बारहवाँ अध्याय:-* 

इस अध्याय के पाठ से रोगो से छुटकारा, निर्भयता की प्राप्ति होती है एवं समाज में मान-सम्मान मिलता है।

*🚩 तेरहवां अध्याय:-* 

तेरहवें अध्याय के पाठ से माता की भक्ति एवं सभी इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति होती है।

*🙏 मनुष्य की इच्छाएं अनंत है और इन्ही की पूर्ति के लिए दुर्गा सप्तशती से सुगम और कोई भी मार्ग नहीं है।*

 इसी लिए नवरात्र में विशेष रूप से दुर्गा सप्तशती के तेरह अध्यायों का पाठ करने का विधान है!!!                 
*🌏ॐ नमः जगदम्बा मातारानी 🌍*

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नवरात्रि 9 दिन की ही क्यों मनाई जाती है ?


"नवरात्रि एक हिंदू पर्व है। 

नवरात्रि  संस्कृत  शब्द है, जिसका अर्थ होता है 'नौ रातें'। 

इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति  देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। 

दसवाँ दिन दशहरा के नाम से प्रसिद्ध है।

नवरात्रि वर्ष में चार बार आता है पौष, चैत्र,आषाढ,अश्विन प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है। 

नवरात्रि के नौ रातों में तीन देवियों - महालक्ष्मी, महासरस्वती या सरस्वती और दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। 

इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति  देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। 

दुर्गा का मतलब जीवन के दुख कॊ हटानेवाली होता है। 

नवरात्रि एक महत्वपूर्ण प्रमुख त्योहार है जिसे पूरे भारत में महान उत्साह के साथ मनाया जाता है।

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नवरात्री का महत्व :


नवरात्रि उत्सव देवी अंबा ( विद्युत ) का प्रतिनिधित्व है। 

वसंत की शुरुआत और शरद ऋतु की शुरुआत, जलवायु और सूरज के प्रभावों का महत्वपूर्ण संगम माना जाता है। 

इन दो समय मां दुर्गा की पूजा के लिए पवित्र अवसर माने जाते है। 

त्योहार की तिथियाँ चंद्र कैलेंडर के अनुसार निर्धारित होती हैं। 

नवरात्रि पर्व, माँ - दुर्गा की अवधारणा भक्ति और परमात्मा की शक्ति ( उदात्त, परम, परम रचनात्मक ऊर्जा ) की पूजा का सबसे शुभ और अनोखा अवधि माना जाता है। 

यह पूजा वैदिक युग से पहले, प्रागैतिहासिक काल से है। 

ऋषि के वैदिक युग के बाद से, नवरात्रि के दौरान की भक्ति प्रथाओं में से मुख्य रूप गायत्री साधना का हैं।

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नवरात्रि के पहले तीन दिन :


नवरात्रि के पहले तीन दिन देवी दुर्गा की पूजा करने के लिए समर्पित किए गए हैं। 

यह पूजा उसकी ऊर्जा और शक्ति की की जाती है। 

प्रत्येक दिन दुर्गा के एक अलग रूप को समर्पित है। 

त्योहार के पहले दिन बालिकाओं की पूजा की जाती है। 

दूसरे दिन युवती की पूजा की जाती है। 

तीसरे दिन जो महिला परिपक्वता के चरण में पहुंच गयी है उसकि पूजा की जाती है। 

देवी दुर्गा के विनाशकारी पहलु सब बुराई प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करने के प्रतिबद्धता के प्रतीक है।

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नवरात्रि के चौथा से छठे दिन :


व्यक्ति जब अहंकार, क्रोध, वासना और अन्य पशु प्रवृत्ति की बुराई प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर लेता है, वह एक शून्य का अनुभव करता है। 

यह शून्य आध्यात्मिक धन से भर जाता है। 

प्रयोजन के लिए, व्यक्ति सभी भौतिकवादी, आध्यात्मिक धन और समृद्धि प्राप्त करने के लिए देवी 
लक्ष्मी की पूजा करता है। 

नवरात्रि के चौथे, पांचवें और छठे दिन लक्ष्मी- समृद्धि और शांति की देवी, की पूजा करने के लिए समर्पित है। 

शायद व्यक्ति बुरी प्रवृत्तियों और धन पर विजय प्राप्त कर लेता है पर वह अभी सच्चे ज्ञान से वंचित है। 
ज्ञान एक मानवीय जीवन जीने के लिए आवश्यक है भले हि वह सत्ता और धन के साथ समृद्ध है। 

इस लिए, नवरात्रि के पांचवें दिन देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। 

सभी पुस्तकों और अन्य साहित्य सामग्रियों को एक स्थान पर इकट्ठा कर दिया जाता हैं और एक दीया देवी आह्वान और आशीर्वाद लेने के लिए, देवता के सामने जलाया जाता है।

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नवरात्रि का सातवां और आठवां दिन :


सातवें दिन, कला और ज्ञान की देवी, सरस्वती, की पूजा की है। 

प्रार्थनायें, आध्यात्मिक ज्ञान की तलाश के उद्देश्य के साथ की जाती हैं। 

आठवे दिन पर एक 'यज्ञ' किया जाता है। 

यह एक बलिदान है जो देवी दुर्गा को सम्मान तथा उनको विदा करता है।

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नवरात्रि का नौवां दिन :


नौवा दिन नवरात्रि समारोह का अंतिम दिन है। 

यह महानवमी के नाम से भी जाना जाता है। 

इस दिन कन्या पूजन होता है। 

उन नौ कुमारी लड़कियों की पूजा होती है जो अभी तक यौवन की अवस्था तक नहीं पहुँची है। 

इन नौ लड़कियों को देवी दुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक माना जाता है। 

लड़कियों का सम्मान तथा स्वागत करने के लिए उनके पैर धोए जाते हैं। 

पूजा के अंत में लड़कियों को उपहार के रूप में नए कपड़े पेश किए जाते हैं।

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लघु दुर्गा सप्तशती :


माँ दुर्गा के पूजा और व्रत के लिए नवरात्रि सबसे पावन दिन होते हैं, इन दिनों में भक्तजन माता को प्रसन्न करने के लिए विभिन्न उपाय व मंत्र का जाप करते है, इसी क्रम में श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ भी किया जाता है। 

जिस से अत्यंत फलदायी परिणाम मिलते हैं।

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परंतु आज व्यस्तता के समय में श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ सभी भक्तजन नहीं कर पाते हैं, क्यूंकी इसके पाठ में पर्याप्त समय लगता है, इसमें कुल 13 अध्याय हैं। 

इस लिए इसकी जगह पर मार्कण्डेय मुनि के द्वारा रचित लघु दुर्गा सप्तशती का पाठ करने से भी समान फल प्राप्त होता है। 

क्यूंकी लघु दुर्गा सप्तशती में बीज मंत्र समाहित है। 

इस लिए समय के अभाव में लघु दुर्गा सप्तशती का पाठ कर सकते हैं।

इसका पाठ कसी भी नवरात्री में माँ दुर्गा के सामने गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करके और धूपबत्ती करके प्रतिदिन नौ पाठ करने चाहिए। 

इसके पाठ से सभी कामनाये सिद्ध हो सकती है, इसके पाठ से शत्रु बाधा शांत होती है, इसके पाठ से नवग्रह बाध्ये शांत हो जाती है, यह पाठ बीजमंत्रों से भरपूर है इसके पाठ से माँ दुर्गा की सम्पूर्ण कृपा प्राप्त होती है।

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इस स्तोत्र को पढ़ने से पहले हो सके तो तंत्रोक्त दुर्गाकवच, सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करे और बाद में इस लघु गुप्त सप्तशती का पाठ करे। 

इसका कोई विनियोग न्यास आदि नहीं है नाही यह शापित या कीलित है।



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मार्कण्डेय कृत लघु दुर्गा सप्तशती पाठ : 


ॐ वीं वीं वीं वेणुहस्ते स्तुतिविधवटुके हां तथा तानमाता स्वानन्देनन्दरूपे अविहतनिरुते भक्तिदे मुक्तिदे त्वम् | 
हंसः सोऽहं विशाले वलयगतिहसे सिद्धिदे वाममार्गे ह्रीं ह्रीं ह्रीं सिद्धलोके कष कष विपुले वीरभद्रे नमस्ते || १ || 

ॐ ह्रींकारं चोच्चरन्ती ममहरतु भयं चर्ममुण्डे प्रचन्डे खां खां खां खड्गपाणे ध्रकध्रकध्रकिते उग्ररूपे स्वरूपे | 
हुंहुंहुंकारनादे गगनभुवि तथा व्यापिनी व्योमरूपे हं हं हंकारनादे सुरगणनमिते राक्षसानां निहंत्री || २ || 

ऐं लोके कीर्तयन्ति मम हरतु भयं चण्डरुपे नमस्ते घ्रांघ्रांघ्रां घोररूपे घघघघघटिते घर्घरे घोररावे | 
निर्मांसे काकजङ्घे घसितनखनखाधूम्रनेत्रे त्रिनेत्रे हस्ताब्जे शुलमुण्डे कलकुलकुकुले श्रीमहेशी नमस्ते || ३ || 

क्रीं क्रीं क्रीं ऐं कुमारी कुहकुहमखिले कोकिले मानुरागे मुद्रासंज्ञत्रिरेखां कुरु कुरु सततं श्रीमहामारी गुह्ये | 
तेजोंगे सिद्धिनाथे मनुपवनचले नैव आज्ञा निधाने ऐंकारे रात्रिमध्ये शयितपशुजने तंत्रकांते नमस्ते || ४ || 

ॐ व्रां व्रीं व्रुं व्रूं कवित्ये दहनपुरगते रुक्मरूपेण चक्रे त्रिः शक्त्या युक्तवर्णादिककरनमिते दादिवंपूर्णवर्णे | 
ह्रींस्थाने कामराजे ज्वल ज्वल ज्वलिते कोशितैस्तास्तुपत्रे स्वच्छदं कष्टनाशे सुरवरवपुषे गुह्यमुंडे नमस्ते || ५ || 

ॐ घ्रां घ्रीं घ्रूं घोरतुण्डे घघघघघघघे घर्घरान्यांघ्रिघोषे ह्रीं क्री द्रं द्रौं च चक्र र र र र रमिते सर्वबोधप्रधाने | 
द्रीं तीर्थे द्रीं तज्येष्ठ जुगजुगजजुगे म्लेच्छदे कालमुण्डे सर्वाङ्गे रक्तघोरामथनकरवरे वज्रदण्डे नमस्ते || ६ || 

ॐ क्रां क्रीं क्रूं वामभित्ते गगनगडगड़े गुह्ययोन्याहिमुण्डे वज्राङ्गे वज्रहस्ते सुरपतिवरदे मत्तमातङ्गरूढे | 
सुतेजे शुद्धदेहे ललललललिते छेदिते पाशजाले कुण्डल्याकाररूपे वृषवृषभहरे ऐन्द्रि मातर्नमस्ते || ७ || 

ॐ हुंहुंहुंकारनादे कषकषवसिनी माँसि वैतालहस्ते सुंसिद्धर्षैः सुसिद्धिर्ढढढढढढढ़ः सर्वभक्षी प्रचन्डी | 
जूं सः सौं शांतिकर्मे मृतमृतनिगडे निःसमे सीसमुद्रे देवि त्वं साधकानां भवभयहरणे भद्रकाली नमस्ते || ८ || 

ॐ देवि त्वं तुर्यहस्ते करधृतपरिघे त्वं वराहस्वरूपे त्वं चेंद्री त्वं कुबेरी त्वमसि च जननी त्वं पुराणी महेन्द्री | 
ऐं ह्रीं ह्रीं कारभूते अतलतलतले भूतले स्वर्गमार्गे पाताले शैलभृङ्गे हरिहरभुवने सिद्धिचंडी नमस्ते || ९ || 

हँसि त्वं शौंडदुःखं शमितभवभये सर्वविघ्नान्तकार्ये गांगींगूंगैंषडंगे गगनगटितटे सिद्धिदे सिद्धिसाध्ये | 
क्रूं क्रूं मुद्रागजांशो गसपवनगते त्र्यक्षरे वै कराले ॐ हीं हूं गां गणेशी गजमुखजननी त्वं गणेशी नमस्ते || १० ||  
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|| मां चामुण्डा देवी ||

        
चामुण्डा देवी का स्वरूप भारतीय शाक्त परंपरा में अत्यंत उग्र, रहस्यमय और गूढ़ माना गया है। 

यह वह शक्ति हैं जो केवल बाहरी दैत्यों का ही नहीं, बल्कि साधक के भीतर छिपे अंधकार, भय, अहंकार और अज्ञान का भी संहार करती हैं। 

उनका उल्लेख प्रमुख रूप से देवी महात्म्य ( दुर्गा सप्तशती ), जो कि मार्कण्डेय पुराण का एक महत्वपूर्ण भाग है, में प्राप्त होता है। 

इस ग्रंथ में देवी के अनेक रूपों का वर्णन है, जिनमें चामुण्डा का प्राकट्य एक अत्यंत महत्वपूर्ण और भयावह क्षण के रूप में सामने आता है।

जब देवी चंडी असुरों के विरुद्ध युद्ध कर रही थीं, तब चण्ड और मुण्ड नामक दो अत्यंत क्रूर और शक्तिशाली दैत्य उनके समक्ष उपस्थित हुए। 

ये दोनों असुर केवल बाहरी शक्ति का प्रतीक नहीं थे, बल्कि वे अहंकार और अज्ञान जैसे गहरे मानसिक और आध्यात्मिक दोषों का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। 

उनके आक्रमण के समय देवी के ललाट से एक भयानक और विकराल शक्ति प्रकट हुई यह शक्ति काली के रूप में थी, परंतु उसका स्वरूप और भी अधिक उग्र, कंकाल समान, और मृत्यु की ऊर्जा से भरा हुआ था।
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उस देवी का शरीर मांसहीन,अस्थियों से उभरा हुआ, आँखें धँसी हुई किंतु अग्नि की तरह प्रज्वलित, और जटाएँ बिखरी हुई थीं। 

वह खोपड़ियों की माला धारण किए हुए थीं और उनके हाथ में एक खप्पर था जिसमें रक्त भरा हुआ था। 

उनका निवास स्थान श्मशान बताया गया है, जहाँ चारों ओर प्रेत, पिशाच और मृत देहों का वातावरण रहता है। 

यह वर्णन केवल भय उत्पन्न करने के लिए नहीं है, बल्कि यह उस परम सत्य का संकेत है जहाँ जीवन और मृत्यु का भेद समाप्त हो जाता है।
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उस उग्र देवी ने युद्ध में चण्ड और मुण्ड दोनों का वध किया और उनके कटे हुए सिर देवी चंडी के चरणों में अर्पित किए। 

तब देवी ने प्रसन्न होकर उन्हें “चामुण्डा” नाम प्रदान किया, जो चण्ड और मुण्ड के नामों से मिलकर बना है। 

इस प्रकार चामुण्डा केवल एक देवी का नाम नहीं, बल्कि एक घटना, एक ऊर्जा और एक तत्त्व का प्रतीक बन गईं।

तांत्रिक दृष्टिकोण से चामुण्डा का अर्थ और भी गहरा हो जाता है। 

यहाँ चण्ड को अहंकार और मुण्ड को अज्ञान के रूप में देखा जाता है। 

जब साधक अपने भीतर के इन दोनों दैत्यों का संहार करता है, तब उसके भीतर चामुण्डा की शक्ति जागृत होती है। 

यह शक्ति साधक को उसके भय, आसक्ति और सीमाओं से मुक्त करती है। 

चामुण्डा का उग्र रूप इस बात का प्रतीक है कि आध्यात्मिक मार्ग हमेशा कोमल नहीं होता; कभी - कभी यह मार्ग कठोर, भयावह और पूर्णतः निर्वस्त्र सत्य से भरा होता है।
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चामुण्डा का स्वरूप हमें यह भी सिखाता है कि मृत्यु कोई अंत नहीं, बल्कि परिवर्तन का द्वार है। 

श्मशान, जो सामान्यतः भय का स्थान माना जाता है,उनके लिए साधना का स्थल है, क्योंकि वहीं जीवन का वास्तविक स्वरूप स्पष्ट होता है। 

जहाँ सब कुछ समाप्त होता है, वहीं से एक नए चक्र की शुरुआत भी होती है।

इस प्रकार चामुण्डा केवल एक देवी नहीं, बल्कि वह चेतना हैं जो विनाश के माध्यम से सृजन का मार्ग प्रशस्त करती है। 

वह उस शक्ति का प्रतीक हैं जो हमें हमारे भीतर के अंधकार से सामना करवाती है और अंततः उसे नष्ट करके हमें मुक्त करती है।

         || चामुण्डा देवी की जय हो ||
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