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जय द्वारकाधीश
।। श्रीमददेवीभागवत प्रवचन - माँ कालरात्रि।।
श्रीमददेवीभागवत प्रवचन - माँ कालरात्रि !
श्रीमददेवीभागवत प्रवचन - माँ कालरात्रि !
नवरात्र का सातवाँ दिन माँ कालरात्रि :
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥
Lavie Sport 47cm Osprey 28 Litres Laptop Backpack For Men & Women | Business Laptop Bag | Upto 15.6" Notebook/Macbook Compatible (Black)
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Care instructions
Machine Wash
Country of Origin
India
About this item
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- Manufacturer warranty - 12 months
नाम से अभिव्यक्त होता है कि मां दुर्गा की यह सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है अर्थात जिनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है।
नाम से ही जाहिर है कि इनका रूप भयानक है।
सिर के बाल बिखरे हुए हैं और गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है।
अंधकारमय स्थितियों का विनाश करने वाली शक्ति हैं कालरात्रि।
काल से भी रक्षा करने वाली यह शक्ति है।
इस देवी के तीन नेत्र हैं।
ये तीनों ही नेत्र ब्रह्मांड के समान गोल हैं।
इनकी सांसों से अग्नि निकलती रहती है।
ये गर्दभ की सवारी करती हैं।
ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वर मुद्रा भक्तों को वर देती है।
दाहिनी ही तरफ का नीचे वाला हाथ अभय मुद्रा में है।
यानी भक्तों हमेशा निडर, निर्भय रहो।
बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा तथा नीचे वाले हाथ में खड्ग है।
इनका रूप भले ही भयंकर हो लेकिन ये सदैव शुभ फल देने वाली मां हैं।
इसी लिए ये शुभंकरी कहलाईं अर्थात् इनसे भक्तों को किसी भी प्रकार से भयभीत या आतंकित होने की कतई आवश्यकता नहीं।
उनके साक्षात्कार से भक्त पुण्य का भागी बनता है।
कालरात्रि की उपासना करने से ब्रह्मांड की सारी सिद्धियों के दरवाजे खुलने लगते हैं और तमाम असुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भागने लगती हैं।
इस लिए दानव, दैत्य, राक्षस और भूत-प्रेत उनके स्मरण से ही भाग जाते हैं।
ये ग्रह बाधाओं को भी दूर करती हैं और अग्नि, जल, जंतु, शत्रु और रात्रि भय दूर हो जाते हैं।
इनकी कृपा से भक्त हर तरह के भय से मुक्त हो जाता है।
माँ कालरात्रि की कथा!!!!!!!!
माँ काल रात्रि प्रत्येक भक्त का कल्याण करने वाली है।
माँ के विषय में पुराणों कई कथानक मिलते हैं।
जिसमें सबसे प्रमाणिक दुर्गा सप्तशती है ।
जो दुर्गा के नवरूपों की उत्पत्ति के विषय को बड़े ही सार गर्भित रूप से जानकारी देती है।
इसके अतिरिक्त देवी भागवत तथा अन्य पुराणों में भी माँ की कथा व महिमा के अंश प्राप्त होते है।
काल रात्रि को काली का ही रूप माना जाता है।
काली माँ इस कलियुग मे प्रत्यक्ष फल देने वाली है।
क्योंकि काली, भैरव तथा हनुमान जी ही ऐसे देवता व देवी हैं, जो शीघ्र ही जागृत होकर भक्त को मनोवांछित फल देते हैं।
काली के नाम व रूप अनेक हैं।
किन्तु लोगों की सुविधा व जानकारी के लिए इन्हें भद्रकाली, दक्षिण काली, मातृ काली व महाकाली भी कहा जाता है।
इनका यह प्रत्येक रूप नाम समान रूप से शुभ फल देने वाला है, जिससे इन्हें शुभंकारी भी कहते हैं।
अर्थात् भक्तों का सदा शुभ करने वाली हैं।
दुर्गा सप्तशती में महिषासुर के बध के समय माँ भद्रकाली की कथा वर्णन मिलता है।
कि युद्ध के समय महाभयानक दैत्य समूह देवी को रण भूमि में आते देखकर उनके ऊपर ऐसे बाणों की वर्षा करने लगा ।
जैसे बादल मेरूगिरि के शिखर पर पानी की धार की बरसा रहा हो।
तब देवी ने अपने बाणों से उस बाण समूह को अनायास ही काटकर उसके घोड़े और सारथियों को भी मार डाला।
साथ ही उसके धनुष तथा अत्यंत ऊॅची ध्वजा को भी तत्काल काट गिराया।
धनुष कट जाने पर उसके अंगों को अपने बाणों से बींध डाला।
और भद्रकाली ने शूल का प्रहार किया।
उससे राक्षस के शूल के सैकड़ों टुकड़े हो गये, वह महादैत्य प्राणों से हाथ धो बैठा।
इसी प्रकार चण्ड और मुण्ड के वध के लिए माँ विकराल मुखी काली प्रकट हुई।
जिसकी कथा के कुछ अंश इस प्रकार हैं ऋषि कहते हैं –
तदन्तर शुम्भ की आज्ञा पाकर वे चण्ड -मुण्ड आदि दैत्य चतुरंगिणी सेना के साथ अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित हो चल दिये।
फिर गिरिराज हिमालय के सुवर्णमय ऊॅचे शिखर पर पहॅंचकर उन्होंने सिंह पर बैठी देवी को देखा।
उन्हें देखकर दैत्य लोग तत्परता से पकड़ने का उद्योग करने लगे।
तब अम्बिका ने उन शत्रुओं के प्रति बड़ा क्रोध किया।
उस समय क्रोध के कारण उनका मुख काला पड़ गया।
ललाट में भौंहें टेढ़ी हो गयीं और वहाँ से तुरंत विकराल मुखी काली प्रकट हुई, जो तलवार और पाश लिये हुए थी।
वे विचित्र खट्वांग धारण किये और चीते के चर्म की साड़ी पहने नर-मुण्डों की माला से विभूषित थीं।
उनके शरीर का मांस सूख गया था।
केवल हड्यिों का ढ़ाचा था ।
जिससे वे अत्यंत भंयकर जान पड़ती थी।
उनका मुख बहुत विशाल था ।
जीभ लपलपाने के कारण वै और भी डरावनी प्रतीत होती थीं।
उनकी आंखें भीतर को धॅसी हुई और कुछ लाल थीं ।
वे अपनी भयंकर गर्जना से सम्पूर्ण दिशाओं को गुंजा रही थी।
बड़े-बड़े दैत्यों का वध करती हुई वे कालिका देवी बड़े बेग से दैत्यों की उस सेना पर टूट पड़ीं और उन सबको भक्षण करने लगीं। आदि कथानक है।
काल रात्रि के मंत्र : -
माँ काल रात्रि माता के अनेकों उपयोगी मंत्र यथा स्थान संबंधित ग्रथों में उपलब्ध होते हैं।
जिसमें प्रत्येक मंत्र का अपना महत्व है।
जिसमें विभिन्न प्रकार के भय, शत्रु भय, जल भय, रोग भय आदि को दूर करने के मंत्र है।
माँ अपने श्रद्धालु भक्तों को सभी वांछित वस्तुएं प्रदान करने वाली हैं।
यहाँ काल रात्रि के आराधना के मंत्रों को दिया जा रहा है।
दंष्ट्राकरालवदने शिरोमालाविभूषणे।
चामुण्डे मुण्डमथने नारायणि नमोऽस्तु ते ।।
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
माता काल रात्रि के महात्म्य को दुर्गा सप्तशती में कई स्थानों पर वर्णित किया है।
भक्तों को अभय देने व विभिन्न प्रकार के भयों से मुक्ति देने वाली कालिरात्रि का बड़ा ही महात्म्य है।
अतः श्रद्धालुओं को वैदिक रीति द्वारा अनुष्ठान व व्रत का पालन करते हुए ।
माँ कालरात्रि की पूजा बड़े ही निष्ठा से करना चाहिए।
जय माँ अंबे...!!!
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