।। श्री भविष्यपुराण प्रवचन - होनी तो प्रबल है ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्री भविष्यपुराण प्रवचन  - होनी तो प्रबल है ।।


 श्री भविष्यपुराण प्रवचन  - होनी तो प्रबल है

श्री आध्यात्मिकता के नशा की संगत — श्री भविष्यपुराण प्रवचन
श्री सीता विवाह और श्रीराम के राज्याभिषेक का शुभ मुहूर्त, होनी के प्रबल विधान तथा मनुष्य के पुरुषार्थ का शास्त्रोक्त रहस्य।

एक आवश्यक शास्त्रीय स्पष्टता: सीता विवाह और श्रीराम के राज्याभिषेक की कथा का मुख्य प्रमाण वाल्मीकि रामायण और श्रीरामचरितमानस में मिलता है। भविष्यपुराण में ज्योतिष, मुहूर्त, धर्म और कर्म के विषय अवश्य मिलते हैं, परंतु इन दोनों घटनाओं को एक ही भविष्यपुराण प्रसंग के रूप में प्रस्तुत करना प्रमाणित नहीं है।

*सीता विवाह और राम का राज्याभिषेक दोनों शुभ मुहूर्त में किया गया।* 

*फिर भी न वैवाहिक जीवन सफल हुआ न राज्याभिषेक।*

*जब मुनि वसिष्ठ से इसका जवाब मांगा गया तो उन्होंने साफ कह दिया।*

*सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेहूं मुनिनाथ।*

*लाभ हानि, जीवन....!!!

*अर्थात, जो विधि ने निर्धारित किया है वही होकर रहेगा।* 

*न राम के जीवन को बदला जा सका, न कृष्ण के।* 





इस लिए नीचे का प्रवचन उपलब्ध शास्त्रीय प्रमाणों पर आधारित है; जहाँ भविष्यपुराण का सामान्य सिद्धांत है, वहाँ उसे उसी रूप में रखा गया है।

न ही शिव ने शती के मृत्यु को टाल सके, जबकि मृत्युंजय मंत्र उन्ही का आवाहन करता है।*

रामकृष्ण परमहंस भी अपने कैंसर को न टाल सके।

न रावण ने अपने जीवन को बदल पाया न कंस।

जबकि दोनों के पास समस्त शक्तियाँ थी।

मानव अपने जन्म के साथ ही जीवन मरण, यस अपयश, लाभ हानि, स्वास्थ, बीमारी, देह रंग, परिवार समाज, देश स्थान सब पहले से ही निर्धारित कर के आता है।

साथ ही साथ अपने विशेष गुण धर्म, स्वभाव, और संस्कार सब पूर्व से लेकर आता है।

शुभ मुहूर्त का वास्तविक अर्थ ;

सनातन धर्म में मुहूर्त का अर्थ केवल घड़ी देखकर कोई कार्य आरंभ कर देना नहीं है। 

मुहूर्त का संबंध काल, ग्रह-नक्षत्र, तिथि, वार, लग्न, कर्म और कार्य के उद्देश्य से है। 

ज्योतिषशास्त्र में उचित समय का चयन शुभ कर्म को अनुकूल वातावरण देने के लिए किया जाता है।

परंतु शुभ मुहूर्त का यह अर्थ नहीं कि मनुष्य अपने प्रत्येक कर्म का फल अपनी इच्छा के अनुसार निश्चित कर सकता है। 

मुहूर्त पुरुषार्थ का अंग है, भाग्य का पूर्ण स्वामी नहीं।

शास्त्रों में कर्म के फल की व्यवस्था को अत्यंत गंभीरता से समझाया गया है। 

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

अर्थात् मनुष्य का अधिकार कर्म करने में है, फल पर नहीं।

इस सिद्धांत से स्पष्ट होता है कि शुभ मुहूर्त में कर्म करना उचित है, किंतु फल की अंतिम व्यवस्था केवल मनुष्य की इच्छा से नहीं चलती।





सीता विवाह का शुभ मुहूर्त ;

श्रीराम और माता सीता का विवाह सनातन धर्म के महान आदर्शों में से एक है। 

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में राजा जनक द्वारा सीता का स्वयंवर, भगवान श्रीराम द्वारा शिवधनुष का भंग और उसके पश्चात् विवाह का विस्तृत वर्णन मिलता है।

राजा जनक ने प्रतिज्ञा की थी कि जो वीर भगवान शिव के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने में समर्थ होगा, उसी के साथ सीता का विवाह किया जाएगा। 

श्रीराम ने गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से धनुष उठाया और उसे भंग कर दिया। 

इस प्रकार सीता का विवाह श्रीराम के साथ निश्चित हुआ।

इसके बाद राजा दशरथ को समाचार भेजा गया। 

अयोध्या से राजा दशरथ अपने पुत्रों और परिवार सहित मिथिला पहुँचे। 

वैदिक रीति से श्रीराम और सीता का विवाह संपन्न हुआ। 

साथ ही लक्ष्मण - उर्मिला, भरत - माण्डवी और शत्रुघ्न - श्रुतकीर्ति के विवाह भी हुए। 

यहाँ शास्त्र का मुख्य संदेश यह है कि विवाह केवल सांसारिक संबंध नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा, कर्तव्य और दो कुलों के मंगल का संस्कार है।

शुभ मुहूर्त का विधान विवाह के लिए इसलिए रखा जाता है कि संस्कार विधिपूर्वक, श्रद्धा से और अनुकूल काल में संपन्न हो। 

किंतु विवाह के पश्चात् आने वाली प्रत्येक परिस्थिति मनुष्य के नियंत्रण में नहीं होती।

श्रीराम और सीता का विवाह अत्यंत मंगलमय था। 

फिर भी आगे चलकर वनवास, रावण द्वारा सीताहरण और अनेक कठिन परिस्थितियाँ आईं। 

इससे विवाह की पवित्रता कम नहीं हुई। 

बल्कि यही सिद्ध हुआ कि धर्ममय जीवन में कठिनाइयाँ आने पर भी सत्य, निष्ठा और मर्यादा का त्याग नहीं करना चाहिए।

इस लिए यदि अपने जीवन मे परिवतर्न चाहते हैं ।

तो अपने कर्म बदलें।

आप के मदद के लिए स्वयं आपकी आत्मा और परमात्मा दोनों खड़े है।

उसे पुकारें। 

वह परमात्मा ही आप का सच्चा साथी है।






श्रीराम का राज्याभिषेक और विधि का विधान ;

वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड में राजा दशरथ ने श्रीराम को युवराज बनाने का निश्चय किया। 

अयोध्या में आनंद का वातावरण था। 

प्रजा प्रसन्न थी और राज्याभिषेक की तैयारियाँ होने लगीं।

राजा दशरथ ने शुभ मुहूर्त में श्रीराम के राज्याभिषेक का निर्णय किया। 

गुरु वशिष्ठ ने आवश्यक वैदिक विधियों और तैयारियों का मार्गदर्शन किया। 

श्रीराम स्वयं धर्मनिष्ठ, आज्ञाकारी और प्रजाहितकारी थे। 

उनके राज्याभिषेक का निर्णय राजधर्म और प्रजाधर्म की दृष्टि से अत्यंत उचित था।

किन्तु कैकेयी को पूर्व में प्राप्त दो वरदानों की स्मृति कराई गई। 

उसने दशरथ से भरत के लिए राज्य और श्रीराम के लिए चौदह वर्ष का वनवास माँगा। 

राजा दशरथ वचनबद्ध थे। 

वे अत्यंत दुखी हुए, परंतु दिए हुए वचन से पीछे नहीं हटे।

श्रीराम ने पिता की प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए राज्याभिषेक का अधिकार छोड़कर वनवास स्वीकार किया। 

लक्ष्मण और सीता भी उनके साथ वन गए।

यह प्रसंग बताता है कि शुभ मुहूर्त में निश्चित किया गया कार्य भी व्यापक कर्मफल और परिस्थितियों के कारण स्थगित हो सकता है। 

किंतु इसे इस रूप में नहीं समझना चाहिए कि शुभ मुहूर्त व्यर्थ है। 

शुभ मुहूर्त का उद्देश्य धर्मसम्मत कर्म के लिए अनुकूल समय चुनना है; वह मनुष्य को कर्मफल का स्वामी नहीं बनाता।

क्या शुभ मुहूर्त से होनी बदल सकती है ?

यह प्रश्न ज्योतिष और अध्यात्म दोनों का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है।

यदि शुभ मुहूर्त से प्रत्येक घटना निश्चित रूप से मनुष्य की इच्छा के अनुसार होने लगती, तो संसार में कोई विपरीत परिस्थिति उत्पन्न ही न होती। 

लेकिन शास्त्रों में कर्म, काल, दैव, पुरुषार्थ और ईश्वर की व्यवस्था का वर्णन मिलता है।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।

अर्थात् कोई भी मनुष्य क्षणभर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता।

कर्म करना मनुष्य के जीवन का स्वाभाविक धर्म है। 

शुभ मुहूर्त उसी कर्म को विधिपूर्वक करने की सहायता देता है। 

परंतु कर्म का फल अनेक कारणों से जुड़ा होता है। 

मनुष्य का पूर्वकर्म, वर्तमान पुरुषार्थ, अन्य प्राणियों के कर्म, सामाजिक परिस्थितियाँ और ईश्वर की व्यापक व्यवस्था—

इन सबका संबंध फल से हो सकता है।

इस लिए शुभ मुहूर्त को भाग्य बदलने की जादुई शक्ति मानना शास्त्रोक्त दृष्टि नहीं है।

परमपिता परमात्मा से ज्यादा शुभ चिंतक भला कौन हो सकता है हमारा ?

भविष्यपुराण में काल, धर्म और कर्म की शिक्षा ;

भविष्यपुराण के धर्म, दान, व्रत, संस्कार और आचार संबंधी उपदेशों में धर्मानुकूल जीवन, सत्कर्म, संयम और पुण्य की महत्ता पर बल मिलता है। 

पुराणों का सामान्य संदेश यह है कि मनुष्य को धर्म का पालन करना चाहिए, सत्कर्म करना चाहिए और अपने आचरण को शुद्ध रखना चाहिए।

मुहूर्तशास्त्र का संबंध भी इसी व्यापक धर्मव्यवस्था से है। 

विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञ, प्रतिष्ठा, यात्रा और अन्य शुभ कार्यों में उचित समय का विचार किया जाता है। 

किंतु मुहूर्त का उद्देश्य कर्म को धर्मसम्मत और अनुकूल काल में संपन्न करना है, न कि कर्मफल की संपूर्ण व्यवस्था को मनुष्य की इच्छा के अधीन कर देना।

इसलिए जब हम कहते हैं कि होनी प्रबल है, तो उसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य को पुरुषार्थ छोड़ देना चाहिए। 

इसका अर्थ है कि मनुष्य अपने अधिकार के कर्म को करते हुए फल के विषय में विनम्र रहे।

श्रीराम का वनवास: शुभ कर्म का महान फल ;

श्रीराम ने राज्याभिषेक का अधिकार छोड़कर पिता की आज्ञा का पालन किया। 

बाहरी दृष्टि से यह राजसुख का त्याग था, किंतु आध्यात्मिक दृष्टि से यह धर्म की विजय थी।

उन्होंने कहा—

पितु बचन मानहु मन मोरा।

श्रीरामचरितमानस में श्रीराम का चरित्र बताता है कि धर्म का पालन केवल सुख की स्थिति में नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी करना चाहिए।

वनवास का प्रसंग मनुष्य को यह सिखाता है कि यदि कोई शुभ कार्य रुक जाए, तो निराश होकर धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। 

कभी-कभी जीवन में ऐसी परिस्थिति आती है जिसमें तत्काल प्राप्त होने वाला लाभ छोड़कर बड़े धर्म की रक्षा करनी पड़ती है।

श्रीराम ने राज्याभिषेक का अवसर खोया, किंतु मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में संसार को आदर्श दिया। 

उनके वनवास से अनेक महान घटनाएँ हुईं—

ऋषियों की रक्षा, रावण का वध, धर्म की स्थापना और अयोध्या में रामराज्य की प्रतिष्ठा।

इस प्रकार एक स्थगित कार्य के भीतर भी व्यापक कल्याण का मार्ग छिपा हो सकता है।

माता सीता का चरित्र और होनी का रहस्य ;

माता सीता का जीवन भी धर्म, पतिव्रता, धैर्य और सत्यनिष्ठा का महान आदर्श है। 

वे श्रीराम के साथ वनवास में गईं। 

वन में अनेक कठिनाइयों का सामना किया। 

रावण द्वारा हरण के बाद भी उन्होंने अपने धर्म और आत्मसम्मान का त्याग नहीं किया।

शास्त्रीय दृष्टि से माता सीता का चरित्र यह सिखाता है कि बाहरी परिस्थिति मनुष्य के भीतर की पवित्रता को अनिवार्य रूप से नष्ट नहीं कर सकती। 

जो व्यक्ति धर्म में स्थित रहता है, वह कठिन समय में भी आत्मबल बनाए रख सकता है।

यहाँ शुभ मुहूर्त का गहरा आध्यात्मिक अर्थ समझ में आता है। 

शुभ समय में आरंभ किया गया विवाह जीवन की हर कठिनाई से मुक्त होने का वचन नहीं देता। 

बल्कि वह धर्ममय जीवन के लिए संकल्प देता है।

विवाह का संस्कार केवल सुख की प्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि परस्पर धर्मपालन, कर्तव्य, संयम और एक - दूसरे के जीवन में सहारा बनने के लिए भी है।

*परीक्षा संसार की।*

*प्रतीक्षा परमात्मा की।*

*और समीक्षा अपनी करनी चाहिए।*
                      
*लेकिन हम*

*परीक्षा परमात्मा की।*

*प्रतीक्षा सुख की।*

*और समीक्षा दूसरों की करते हैं।*

ज्योतिषशास्त्र में मुहूर्त का महत्व
वैदिक ज्योतिष में मुहूर्त का एक स्वतंत्र महत्व है। मुहूर्त का चयन करते समय तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण, लग्न, ग्रहबल, चंद्रबल और कार्य की प्रकृति जैसे विषयों का विचार किया जाता है।
विवाह के लिए अलग मुहूर्त, गृहप्रवेश के लिए अलग मुहूर्त और यज्ञ के लिए अलग मुहूर्त देखे जाते हैं। यह व्यवस्था इसलिए है कि कार्य को अनुकूल समय में किया जाए।
किन्तु किसी मुहूर्त को पूर्ण रूप से दोषरहित या किसी अन्य समय को पूर्ण रूप से निष्फल मानना उचित नहीं है। ज्योतिष में ग्रहों के फल का विचार भी देश, काल, पात्र और कर्म के अनुसार किया जाता है।
मुहूर्त मनुष्य के पुरुषार्थ का सहायक है। वह मनुष्य की बुद्धि, श्रद्धा, कर्म और अनुशासन को दिशा देता है। परंतु कर्मफल की अंतिम व्यवस्था व्यापक है।
इसलिए शास्त्रीय ज्योतिष का उचित उपयोग यह है कि शुभ कार्य के लिए अनुकूल समय चुना जाए, किंतु परिणाम के प्रति अहंकार न किया जाए।

होनी प्रबल है, पर पुरुषार्थ भी आवश्यक है
कभी-कभी लोग कहते हैं कि यदि होनी प्रबल है, तो कर्म करने की आवश्यकता क्या है?
यह विचार शास्त्रसम्मत नहीं है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म से विमुख नहीं किया। उन्होंने उसे युद्धभूमि में धर्मानुकूल कर्म करने का उपदेश दिया।
मनुष्य का कर्तव्य है कि वह उचित समय चुने, सही तैयारी करे, धर्मानुकूल निर्णय ले और अपने सामर्थ्य के अनुसार पुरुषार्थ करे। फल आने पर उसे प्रसन्नता या दुख के कारण विवेक नहीं खोना चाहिए।
यदि विवाह के लिए शुभ मुहूर्त चुना गया है, तो विवाह के बाद दांपत्य जीवन में प्रेम, सत्य, संयम और परस्पर सम्मान रखना भी आवश्यक है। यदि राज्याभिषेक का शुभ समय निश्चित हुआ है, तो राजा को प्रजापालन, न्याय और धर्म का पालन करना भी आवश्यक है।
केवल मुहूर्त देखकर कार्य कर देना पर्याप्त नहीं। कार्य के पीछे धर्म और सदाचार का होना आवश्यक है।

आध्यात्मिकता का वास्तविक नशा
श्री आध्यात्मिकता के नशा की संगत का अर्थ है कि मनुष्य सांसारिक चिंता, मोह और अहंकार के स्थान पर धर्म, सत्य, भक्ति और आत्मचिंतन में आनंद अनुभव करे।
सांसारिक नशा मनुष्य की बुद्धि को दुर्बल कर सकता है। आध्यात्मिकता का नशा विवेक को जागृत करता है। वह मनुष्य को कर्म करने, सत्य बोलने, संयम रखने और ईश्वर की व्यवस्था पर श्रद्धा रखने की प्रेरणा देता है।
श्रीराम का जीवन आध्यात्मिकता का यही आदर्श प्रस्तुत करता है। उन्होंने राज्याभिषेक के समय विनम्रता रखी और वनवास के समय भी धर्म नहीं छोड़ा। सीता ने सुख और दुख दोनों में अपने धर्म का पालन किया।
आध्यात्मिक व्यक्ति शुभ मुहूर्त का सम्मान करता है, किंतु केवल मुहूर्त पर निर्भर नहीं रहता। वह अपने कर्म, आचरण और मन की शुद्धता को भी महत्व देता है।

शुभ मुहूर्त में कार्य रुक जाए तो क्या करें?
यदि किसी शुभ कार्य का मुहूर्त निश्चित होने के बाद कार्य किसी कारण से रुक जाए, तो मनुष्य को घबराना नहीं चाहिए। पहले वास्तविक कारण को समझना चाहिए। यदि कार्य में कोई बाधा है, तो उसे दूर करने का उचित प्रयास करना चाहिए।
धार्मिक दृष्टि से प्रार्थना, सत्संग, दान, जप और सदाचार मन को स्थिर करने वाले साधन हैं। लेकिन किसी विशेष बाधा के लिए बिना प्रमाण किसी निश्चित दोष, ग्रह या शाप का आरोप नहीं करना चाहिए।
यदि विवाह का कार्य रुक गया है, तो परिवार को शांतिपूर्वक कारण समझना चाहिए। यदि गृहप्रवेश स्थगित हुआ है, तो आवश्यक तैयारी पूरी करके उचित समय चुनना चाहिए। यदि कोई राजकीय या सामाजिक कार्य टल गया है, तो उसके लिए विवेकपूर्ण निर्णय लेना चाहिए।
शुभ मुहूर्त का सम्मान और व्यावहारिक बुद्धि—दोनों का संतुलन ही उचित मार्ग है।

अंतिम शास्त्रीय संदेश
श्री सीता विवाह और श्रीराम के राज्याभिषेक का प्रसंग हमें बताता है कि शुभ मुहूर्त जीवन के धर्ममय कर्मों के लिए उपयोगी है। परंतु संसार की प्रत्येक घटना केवल मनुष्य की इच्छा से नहीं चलती।
श्रीराम का राज्याभिषेक स्थगित हुआ, लेकिन उनका धर्म स्थगित नहीं हुआ। सीता विवाह शुभ मुहूर्त में हुआ, लेकिन जीवन में कठिनाइयाँ आईं। फिर भी दोनों ने धर्म, सत्य और मर्यादा का त्याग नहीं किया।
इसलिए होनी के प्रबल विधान को समझकर मनुष्य को निष्क्रिय नहीं होना चाहिए। उसे शुभ समय चुनना चाहिए, उचित कर्म करना चाहिए और फल को ईश्वर की व्यवस्था मानकर स्वीकार करना चाहिए।
श्रीमद्भगवद्गीता का यह उपदेश इस रहस्य का सार है—
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
अर्थात् हे अर्जुन! योग में स्थित होकर, आसक्ति का त्याग करके कर्म करो।
यही शुभ मुहूर्त का आध्यात्मिक रहस्य है। शुभ समय कर्म के लिए है, धर्म कर्म की दिशा है, पुरुषार्थ मनुष्य का कर्तव्य है और फल की अंतिम व्यवस्था ईश्वर के अधीन है।

🙏जय जय राम राम श्री सीताराम🙏



पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 25 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Dhanlakshmi Strits , Marwar Strits, RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . + 91- 7010668409 / + 91- 7598240825 WHATSAPP नंबर : + 91 7598240825 ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85
Email: prabhurajyguru@gmail.com
आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

No comments:

Post a Comment