।। श्रीमद देवी भागवत प्रवचन ।। *

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्रीमद देवी भागवत प्रवचन ।।

*☀️(((दुर्गा सप्तशती के पाठ का महत्व)))*

*🕟माँ दुर्गा की आराधना और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ सर्वोत्तम है।* 

भुवनेश्वरी संहिता में कहा गया है- जिस प्रकार से ''वेद'' अनादि है, उसी प्रकार ''सप्तशती'' भी अनादि है।

 *दुर्गा सप्तशती के 700 श्लोकों में देवी-चरित्र का वर्णन है।* 

*दुर्गा सप्तशती में कुल 13 अध्याय हैं।* 

दुर्गा सप्तशती के सभी तेरह अध्याय अलग अलग इच्छित मनोकामना की सहर्ष ही पूर्ति करते है।

*🚩प्रथम अध्याय: -* 

इसके पाठ से सभी प्रकार की चिंता दूर होती है एवं शक्तिशाली से शक्तिशाली शत्रु का भी भय दूर होता है शत्रुओं का नाश होता है . .

*🚩 द्वितीय अध्याय:-* 

इसके पाठ से बलवान शत्रु द्वारा घर एवं भूमि पर अधिकार करने एवं किसी भी प्रकार के वाद विवाद आदि में विजय प्राप्त होती है . .

*🚩 तृतीय अध्याय: -* 

तृतीय अध्याय के पाठ से युद्ध एवं मुक़दमे में विजय, शत्रुओं से छुटकारा मिलता है . .!




*🚩 चतुर्थ अध्याय: -* 

इस अध्याय के पाठ से धन, सुन्दर जीवन साथी एवं माँ की भक्ति की प्राप्ति होती है .

*🚩 पंचम अध्याय: -* 

पंचम अध्याय के पाठ से भक्ति मिलती है, भय, बुरे स्वप्नों और भूत प्रेत बाधाओं का निराकरण होता है . .!




*🚩 छठा अध्याय: -* 

इस अध्याय के पाठ से समस्त बाधाएं दूर होती है और समस्त मनवाँछित फलो की प्राप्ति होती है . .

*🚩 सातवाँ अध्याय: -* 

इस अध्याय के पाठ से ह्रदय की समस्त कामना अथवा किसी विशेष गुप्त कामना की पूर्ति होती है .

*🚩 आठवाँ अध्याय: -*

 अष्टम अध्याय के पाठ से धन लाभ के साथ वशीकरण प्रबल होता है . .

*🚩 नौवां अध्याय:-* 

नवम अध्याय के पाठ से खोये हुए की तलाश में सफलता मिलती है, संपत्ति एवं धन का लाभ भी प्राप्त होता है .




*🚩 दसवाँ अध्याय:-* 

इस अध्याय के पाठ से गुमशुदा की तलाश होती है, शक्ति और संतान का सुख भी प्राप्त होता है . .,

*🚩 ग्यारहवाँ अध्याय:-*

 ग्यारहवें अध्याय के पाठ से किसी भी प्रकार की चिंता से मुक्ति , व्यापार में सफलता एवं सुख-संपत्ति की प्राप्ति होती है .
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*🚩 बारहवाँ अध्याय:-* 

इस अध्याय के पाठ से रोगो से छुटकारा, निर्भयता की प्राप्ति होती है एवं समाज में मान-सम्मान मिलता है।

*🚩 तेरहवां अध्याय:-* 

तेरहवें अध्याय के पाठ से माता की भक्ति एवं सभी इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति होती है।

*🙏 मनुष्य की इच्छाएं अनंत है और इन्ही की पूर्ति के लिए दुर्गा सप्तशती से सुगम और कोई भी मार्ग नहीं है।*

 इसी लिए नवरात्र में विशेष रूप से दुर्गा सप्तशती के तेरह अध्यायों का पाठ करने का विधान है!!!                 
*🌏ॐ नमः जगदम्बा मातारानी 🌍*
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नवरात्रि 9 दिन की ही क्यों मनाई जाती है?

"नवरात्रि एक हिंदू पर्व है। नवरात्रि  संस्कृत  शब्द है, जिसका अर्थ होता है 'नौ रातें'। 
इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति  देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। 
दसवाँ दिन दशहरा के नाम से प्रसिद्ध है।

नवरात्रि वर्ष में चार बार आता है पौष, चैत्र,आषाढ,अश्विन प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ रातों में तीन देवियों - महालक्ष्मी, महासरस्वती या सरस्वती और दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। 
इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति  देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। 
दुर्गा का मतलब जीवन के दुख कॊ हटानेवाली होता है। 
नवरात्रि एक महत्वपूर्ण प्रमुख त्योहार है जिसे पूरे भारत में महान उत्साह के साथ मनाया जाता है।*
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नवरात्री का महत्व :

नवरात्रि उत्सव देवी अंबा ( विद्युत ) का प्रतिनिधित्व है। 
वसंत की शुरुआत और शरद ऋतु की शुरुआत, जलवायु और सूरज के प्रभावों का महत्वपूर्ण संगम माना जाता है। 
इन दो समय मां दुर्गा की पूजा के लिए पवित्र अवसर माने जाते है। 
त्योहार की तिथियाँ चंद्र कैलेंडर के अनुसार निर्धारित होती हैं। 
नवरात्रि पर्व, माँ - दुर्गा की अवधारणा भक्ति और परमात्मा की शक्ति ( उदात्त, परम, परम रचनात्मक ऊर्जा ) की पूजा का सबसे शुभ और अनोखा अवधि माना जाता है। 
यह पूजा वैदिक युग से पहले, प्रागैतिहासिक काल से है। 
ऋषि के वैदिक युग के बाद से, नवरात्रि के दौरान की भक्ति प्रथाओं में से मुख्य रूप गायत्री साधना का हैं।
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नवरात्रि के पहले तीन दिन :

नवरात्रि के पहले तीन दिन देवी दुर्गा की पूजा करने के लिए समर्पित किए गए हैं। 
यह पूजा उसकी ऊर्जा और शक्ति की की जाती है। 
प्रत्येक दिन दुर्गा के एक अलग रूप को समर्पित है। 
त्योहार के पहले दिन बालिकाओं की पूजा की जाती है। 
दूसरे दिन युवती की पूजा की जाती है। 
तीसरे दिन जो महिला परिपक्वता के चरण में पहुंच गयी है उसकि पूजा की जाती है। 
देवी दुर्गा के विनाशकारी पहलु सब बुराई प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करने के प्रतिबद्धता के प्रतीक है।
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नवरात्रि के चौथा से छठे दिन :

व्यक्ति जब अहंकार, क्रोध, वासना और अन्य पशु प्रवृत्ति की बुराई प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर लेता है, वह एक शून्य का अनुभव करता है। 
यह शून्य आध्यात्मिक धन से भर जाता है। 
प्रयोजन के लिए, व्यक्ति सभी भौतिकवादी, आध्यात्मिक धन और समृद्धि प्राप्त करने के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा करता है। 
नवरात्रि के चौथे, पांचवें और छठे दिन लक्ष्मी- समृद्धि और शांति की देवी, की पूजा करने के लिए समर्पित है। 
शायद व्यक्ति बुरी प्रवृत्तियों और धन पर विजय प्राप्त कर लेता है पर वह अभी सच्चे ज्ञान से वंचित है। ज्ञान एक मानवीय जीवन जीने के लिए आवश्यक है भले हि वह सत्ता और धन के साथ समृद्ध है। 
इस लिए, नवरात्रि के पांचवें दिन देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। 
सभी पुस्तकों और अन्य साहित्य सामग्रियों को एक स्थान पर इकट्ठा कर दिया जाता हैं और एक दीया देवी आह्वान और आशीर्वाद लेने के लिए, देवता के सामने जलाया जाता है।
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नवरात्रि का सातवां और आठवां दिन :

सातवें दिन, कला और ज्ञान की देवी, सरस्वती, की पूजा की है। 
प्रार्थनायें, आध्यात्मिक ज्ञान की तलाश के उद्देश्य के साथ की जाती हैं। 
आठवे दिन पर एक 'यज्ञ' किया जाता है। 
यह एक बलिदान है जो देवी दुर्गा को सम्मान तथा उनको विदा करता है।
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नवरात्रि का नौवां दिन :

नौवा दिन नवरात्रि समारोह का अंतिम दिन है। 
यह महानवमी के नाम से भी जाना जाता है। 
इस दिन कन्या पूजन होता है। 
उन नौ कुमारी लड़कियों की पूजा होती है जो अभी तक यौवन की अवस्था तक नहीं पहुँची है। 
इन नौ लड़कियों को देवी दुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक माना जाता है। 
लड़कियों का सम्मान तथा स्वागत करने के लिए उनके पैर धोए जाते हैं। 
पूजा के अंत में लड़कियों को उपहार के रूप में नए कपड़े पेश किए जाते हैं।
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लघु दुर्गा सप्तशती :

माँ दुर्गा के पूजा और व्रत के लिए नवरात्रि सबसे पावन दिन होते हैं, इन दिनों में भक्तजन माता को प्रसन्न करने के लिए विभिन्न उपाय व मंत्र का जाप करते है, इसी क्रम में श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ भी किया जाता है। 
जिस से अत्यंत फलदायी परिणाम मिलते हैं।
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परंतु आज व्यस्तता के समय में श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ सभी भक्तजन नहीं कर पाते हैं, क्यूंकी इसके पाठ में पर्याप्त समय लगता है, इसमें कुल 13 अध्याय हैं। 
इस लिए इसकी जगह पर मार्कण्डेय मुनि के द्वारा रचित लघु दुर्गा सप्तशती का पाठ करने से भी समान फल प्राप्त होता है। 
क्यूंकी लघु दुर्गा सप्तशती में बीज मंत्र समाहित है। 
इस लिए समय के अभाव में लघु दुर्गा सप्तशती का पाठ कर सकते हैं।

इसका पाठ कसी भी नवरात्री में माँ दुर्गा के सामने गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करके और धूपबत्ती करके प्रतिदिन नौ पाठ करने चाहिए। 
इसके पाठ से सभी कामनाये सिद्ध हो सकती है, इसके पाठ से शत्रु बाधा शांत होती है, इसके पाठ से नवग्रह बाध्ये शांत हो जाती है, यह पाठ बीजमंत्रों से भरपूर है इसके पाठ से माँ दुर्गा की सम्पूर्ण कृपा प्राप्त होती है।
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इस स्तोत्र को पढ़ने से पहले हो सके तो तंत्रोक्त दुर्गाकवच, सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करे और बाद में इस लघु गुप्त सप्तशती का पाठ करे। 

इसका कोई विनियोग न्यास आदि नहीं है नाही यह शापित या कीलित है।



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मार्कण्डेय कृत लघु दुर्गा सप्तशती पाठ : 

ॐ वीं वीं वीं वेणुहस्ते स्तुतिविधवटुके हां तथा तानमाता स्वानन्देनन्दरूपे अविहतनिरुते भक्तिदे मुक्तिदे त्वम् | 
हंसः सोऽहं विशाले वलयगतिहसे सिद्धिदे वाममार्गे ह्रीं ह्रीं ह्रीं सिद्धलोके कष कष विपुले वीरभद्रे नमस्ते || १ || 

ॐ ह्रींकारं चोच्चरन्ती ममहरतु भयं चर्ममुण्डे प्रचन्डे खां खां खां खड्गपाणे ध्रकध्रकध्रकिते उग्ररूपे स्वरूपे | 
हुंहुंहुंकारनादे गगनभुवि तथा व्यापिनी व्योमरूपे हं हं हंकारनादे सुरगणनमिते राक्षसानां निहंत्री || २ || 

ऐं लोके कीर्तयन्ति मम हरतु भयं चण्डरुपे नमस्ते घ्रांघ्रांघ्रां घोररूपे घघघघघटिते घर्घरे घोररावे | 
निर्मांसे काकजङ्घे घसितनखनखाधूम्रनेत्रे त्रिनेत्रे हस्ताब्जे शुलमुण्डे कलकुलकुकुले श्रीमहेशी नमस्ते || ३ || 

क्रीं क्रीं क्रीं ऐं कुमारी कुहकुहमखिले कोकिले मानुरागे मुद्रासंज्ञत्रिरेखां कुरु कुरु सततं श्रीमहामारी गुह्ये | 
तेजोंगे सिद्धिनाथे मनुपवनचले नैव आज्ञा निधाने ऐंकारे रात्रिमध्ये शयितपशुजने तंत्रकांते नमस्ते || ४ || 

ॐ व्रां व्रीं व्रुं व्रूं कवित्ये दहनपुरगते रुक्मरूपेण चक्रे त्रिः शक्त्या युक्तवर्णादिककरनमिते दादिवंपूर्णवर्णे | 
ह्रींस्थाने कामराजे ज्वल ज्वल ज्वलिते कोशितैस्तास्तुपत्रे स्वच्छदं कष्टनाशे सुरवरवपुषे गुह्यमुंडे नमस्ते || ५ || 

ॐ घ्रां घ्रीं घ्रूं घोरतुण्डे घघघघघघघे घर्घरान्यांघ्रिघोषे ह्रीं क्री द्रं द्रौं च चक्र र र र र रमिते सर्वबोधप्रधाने | 
द्रीं तीर्थे द्रीं तज्येष्ठ जुगजुगजजुगे म्लेच्छदे कालमुण्डे सर्वाङ्गे रक्तघोरामथनकरवरे वज्रदण्डे नमस्ते || ६ || 

ॐ क्रां क्रीं क्रूं वामभित्ते गगनगडगड़े गुह्ययोन्याहिमुण्डे वज्राङ्गे वज्रहस्ते सुरपतिवरदे मत्तमातङ्गरूढे | 
सुतेजे शुद्धदेहे ललललललिते छेदिते पाशजाले कुण्डल्याकाररूपे वृषवृषभहरे ऐन्द्रि मातर्नमस्ते || ७ || 

ॐ हुंहुंहुंकारनादे कषकषवसिनी माँसि वैतालहस्ते सुंसिद्धर्षैः सुसिद्धिर्ढढढढढढढ़ः सर्वभक्षी प्रचन्डी | 
जूं सः सौं शांतिकर्मे मृतमृतनिगडे निःसमे सीसमुद्रे देवि त्वं साधकानां भवभयहरणे भद्रकाली नमस्ते || ८ || 

ॐ देवि त्वं तुर्यहस्ते करधृतपरिघे त्वं वराहस्वरूपे त्वं चेंद्री त्वं कुबेरी त्वमसि च जननी त्वं पुराणी महेन्द्री | 
ऐं ह्रीं ह्रीं कारभूते अतलतलतले भूतले स्वर्गमार्गे पाताले शैलभृङ्गे हरिहरभुवने सिद्धिचंडी नमस्ते || ९ || 

हँसि त्वं शौंडदुःखं शमितभवभये सर्वविघ्नान्तकार्ये गांगींगूंगैंषडंगे गगनगटितटे सिद्धिदे सिद्धिसाध्ये | 
क्रूं क्रूं मुद्रागजांशो गसपवनगते त्र्यक्षरे वै कराले ॐ हीं हूं गां गणेशी गजमुखजननी त्वं गणेशी नमस्ते || १० ||  
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|| मां चामुण्डा देवी ||
        
चामुण्डा देवी का स्वरूप भारतीय शाक्त परंपरा में अत्यंत उग्र, रहस्यमय और गूढ़ माना गया है। 
यह वह शक्ति हैं जो केवल बाहरी दैत्यों का ही नहीं, बल्कि साधक के भीतर छिपे अंधकार, भय, अहंकार और अज्ञान का भी संहार करती हैं। 
उनका उल्लेख प्रमुख रूप से देवी महात्म्य ( दुर्गा सप्तशती ), जो कि मार्कण्डेय पुराण का एक महत्वपूर्ण भाग है, में प्राप्त होता है। इस ग्रंथ में देवी के अनेक रूपों का वर्णन है, जिनमें चामुण्डा का प्राकट्य एक अत्यंत महत्वपूर्ण और भयावह क्षण के रूप में सामने आता है।

जब देवी चंडी असुरों के विरुद्ध युद्ध कर रही थीं, तब चण्ड और मुण्ड नामक दो अत्यंत क्रूर और शक्तिशाली दैत्य उनके समक्ष उपस्थित हुए। 
ये दोनों असुर केवल बाहरी शक्ति का प्रतीक नहीं थे, बल्कि वे अहंकार और अज्ञान जैसे गहरे मानसिक और आध्यात्मिक दोषों का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। 
उनके आक्रमण के समय देवी के ललाट से एक भयानक और विकराल शक्ति प्रकट हुई यह शक्ति काली के रूप में थी, परंतु उसका स्वरूप और भी अधिक उग्र, कंकाल समान, और मृत्यु की ऊर्जा से भरा हुआ था।
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उस देवी का शरीर मांसहीन,अस्थियों से उभरा हुआ, आँखें धँसी हुई किंतु अग्नि की तरह प्रज्वलित, और जटाएँ बिखरी हुई थीं। 
वह खोपड़ियों की माला धारण किए हुए थीं और उनके हाथ में एक खप्पर था जिसमें रक्त भरा हुआ था। 
उनका निवास स्थान श्मशान बताया गया है, जहाँ चारों ओर प्रेत, पिशाच और मृत देहों का वातावरण रहता है। 
यह वर्णन केवल भय उत्पन्न करने के लिए नहीं है, बल्कि यह उस परम सत्य का संकेत है जहाँ जीवन और मृत्यु का भेद समाप्त हो जाता है।
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उस उग्र देवी ने युद्ध में चण्ड और मुण्ड दोनों का वध किया और उनके कटे हुए सिर देवी चंडी के चरणों में अर्पित किए। 
तब देवी ने प्रसन्न होकर उन्हें “चामुण्डा” नाम प्रदान किया, जो चण्ड और मुण्ड के नामों से मिलकर बना है। 
इस प्रकार चामुण्डा केवल एक देवी का नाम नहीं, बल्कि एक घटना, एक ऊर्जा और एक तत्त्व का प्रतीक बन गईं।

तांत्रिक दृष्टिकोण से चामुण्डा का अर्थ और भी गहरा हो जाता है। 
यहाँ चण्ड को अहंकार और मुण्ड को अज्ञान के रूप में देखा जाता है। 
जब साधक अपने भीतर के इन दोनों दैत्यों का संहार करता है, तब उसके भीतर चामुण्डा की शक्ति जागृत होती है। 
यह शक्ति साधक को उसके भय, आसक्ति और सीमाओं से मुक्त करती है। 
चामुण्डा का उग्र रूप इस बात का प्रतीक है कि आध्यात्मिक मार्ग हमेशा कोमल नहीं होता; कभी-कभी यह मार्ग कठोर, भयावह और पूर्णतः निर्वस्त्र सत्य से भरा होता है।
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चामुण्डा का स्वरूप हमें यह भी सिखाता है कि मृत्यु कोई अंत नहीं, बल्कि परिवर्तन का द्वार है। श्मशान, जो सामान्यतः भय का स्थान माना जाता है,उनके लिए साधना का स्थल है, क्योंकि वहीं जीवन का वास्तविक स्वरूप स्पष्ट होता है। 
जहाँ सब कुछ समाप्त होता है, वहीं से एक नए चक्र की शुरुआत भी होती है।

इस प्रकार चामुण्डा केवल एक देवी नहीं, बल्कि वह चेतना हैं जो विनाश के माध्यम से सृजन का मार्ग प्रशस्त करती है। 
वह उस शक्ति का प्रतीक हैं जो हमें हमारे भीतर के अंधकार से सामना करवाती है और अंततः उसे नष्ट करके हमें मुक्त करती है।

         || चामुण्डा देवी की जय हो ||
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