सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
|| शुभ श्रावण विशेष : ||
|| धर्माधर्म चक्र ||
श्री शिवमहापुराण अनुसार धर्म-अधर्म चक्र का रहस्य !
मनुष्य के कर्म, संस्कार, पाप-पुण्य और भगवान शिव की शरण का गूढ़ विवेचन !
सनातन धर्म की परंपरा में धर्म और अधर्म केवल अच्छे और बुरे कर्मों के नाम नहीं हैं।
धर्म वह जीवन - पद्धति है जो मनुष्य को सत्य, करुणा, संयम, सदाचार, कर्तव्य और ईश्वर - स्मरण की ओर ले जाती है, जबकि अधर्म वह मार्ग है जो मनुष्य को असत्य, हिंसा, लोभ, अहंकार, छल, अन्याय और आसक्ति की ओर ले जाता है।
Lymio Polo T Shirt for Men || T Shirt for Man || Collar T Shirt Style Men (Packs Also Available) (Polo-18-21)
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{ Material composition
Cotton Blend
{ About this item
- Men T-Shirt || T-Shirt for Men || Polo T Shirt || T-Shirt (Pack of 2)
- Regular fit for a comfortable and relaxed feel
- Stylish | Casual
- Classic design with collarneck
- Perfect for casual wear or sports activities }
{ Additional Information
Manufacturer
J B Fashion, J B fashion_Surat-395004
Packer
J B Fashion_Surat-395004
Importer
J B Fashion_Surat-395004
Item Dimensions LxWxH
10 x 2 x 11 Centimeters
इसी कारण धर्म और अधर्म को एक प्रकार के चक्र के रूप में समझा जा सकता है—
मनुष्य जैसा विचार करता है, वैसा कर्म करता है; कर्म से संस्कार बनते हैं; संस्कार से पुनः वैसी ही प्रवृत्ति उत्पन्न होती है और प्रवृत्ति आगे के कर्मों को जन्म देती है।
श्री शिवमहापुराण की शिव - तत्त्व प्रधान शिक्षाओं में कर्म, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और सदाचार का विशेष महत्व दिखाई देता है।
भगवान शिव को केवल संहार के देवता के रूप में देखना अधूरा है।
शिव का संहार वास्तव में केवल विनाश नहीं, बल्कि अधर्म, अज्ञान, अहंकार और बंधन से मुक्ति का भी प्रतीक है।
1-वृषभरूप धर्म -
इस कालचक्र के ऊपर ब्रह्मचर्य का व्रत धारण किये हुए वृषभाकृतिरूप धर्म है।
यह शिव - लोक से आगे स्थित है तथा सत्य आदि चार पैरों से युक्त है।
इस वृषभरूप धर्म के आगे का दक्षिण पाद सत्य रूप है...!
वाम पाद शौच ( पवित्रता ) है....!
पीछे का दक्षिण पाद दया है और वाम पाद 'अहिंसा' है....!
अर्थात् धर्म, सत्य, शुचिता, दया और अहिंसा रूप चार पैरों से चलता है।
जहाँ सत्यादि हैं वहाँ धर्म है।
इसके मुख में वेदध्वनि सुशोभित है....!
आस्तिकता की दृष्टि ( नेत्र ) है....!
क्षमारूपी सींग वाला है.....!
शम - रूपी कान हैं।
धर्म के ऊपर कालचक्र नहीं...!
कालातीत शिव - लिङ्ग स्थित है।
धर्म पर कालचक्र का अधिकार नहीं है।
2-महिषारूढ़ अधर्मरूप कालचक्र :
सर्वथा कामरूपधारी,नास्तिकता (अनीश्वरवादिता ) अलक्ष्मी ( दरिद्रता ) दुःसङ्ग ( कुसंगति ) वेदविरुद्धाचरण, नित्य क्रोधाग्नि दग्ध, कृष्णवर्ण महिष ( भैंसा ) पर आरूढ़ यह कालचक्र है।
उस महिष का शरीर अधर्ममय है।
उसके चारों चरण ( पैर ) असत्य, अशुचि, हिंसा और निर्घृण हैं।
इस कालचक्र के नीचे कर्म भोग है और इसके ऊपर ज्ञान भोग है।
नीचे कर्ममाया है और ऊपर ज्ञानमाया है।
इस कालरूपी दुस्तर सागर से वे ही पार पा सकते है...!
जो सदाशिव के चरणकमलों में अपने आपको समर्पित कर देते हैं....!
वे इस दुस्तर कर्मभोग व कर्ममाया से परे ज्ञान भोग व ज्ञानमाया को पार कर जाते है।
जो जीव कोटि के सामान्य प्राणी हैं....!
वे इस कालचक्र के नीचे तथा पर कोटि के महापुरुष होते हैं;
वे इस काल चक्र से ऊपर पहुँच जाते हैं।
अधर्म महिषारूढ़ कालचक्र को अर्थात् असत्य अशुचि, हिंसा, निर्घृणा आदि को वे ही पार कर सकते हैं जो सत्य, शुचिता, अहिंसा और दया से युक्त होकर भगवान् शिव की उपासना में संलग्न हैं।
( - शिवपुराण )
धर्मचक्र की शुरुआत कहाँ से होती है ?
धर्मचक्र की पहली गति मनुष्य के मन से प्रारंभ होती है।
मन में विचार उत्पन्न होता है, विचार इच्छा को जन्म देता है, इच्छा कर्म को प्रेरित करती है और कर्म उसके फल का कारण बनता है।
यदि मन में सत्य, दया और ईश्वर - भक्ति का विचार है तो मनुष्य के कर्म भी उसी दिशा में जाते हैं।
इस के विपरीत यदि मन में लोभ, क्रोध, द्वेष और अहंकार बढ़ता जाए तो कर्म भी उसी प्रकार के होने लगते हैं।
इस प्रकार समझें—
विचार → इच्छा → कर्म → संस्कार → स्वभाव → पुनः कर्म।
यही कर्म का चक्र धीरे - धीरे मनुष्य के जीवन की दिशा निर्धारित करता है।
शिवतत्त्व की दृष्टि से मनुष्य को अपने भीतर के विकारों पर विजय प्राप्त करनी चाहिए।
भगवान शिव का ध्यान इस लिए केवल बाहरी पूजा नहीं, बल्कि अपने भीतर के अज्ञान और अहंकार को पहचानने का साधन भी माना जा सकता है।
धर्म क्या है ?
धर्म का अर्थ केवल किसी धार्मिक अनुष्ठान को करना नहीं है।
धर्म में सत्य बोलना, अपने कर्तव्य का पालन करना, माता - पिता और गुरु का सम्मान करना, जीवों के प्रति दया रखना, अन्याय से बचना, अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करना तथा ईश्वर का स्मरण करना भी सम्मिलित है।
यदि कोई व्यक्ति मंदिर में पूजा करता है लेकिन बाहर निकलकर किसी निर्बल व्यक्ति के साथ अन्याय करता है, तो उसके आचरण में धर्म की पूर्णता नहीं मानी जा सकती।
धर्म का मूल उद्देश्य मनुष्य के भीतर ऐसी चेतना उत्पन्न करना है जिससे वह स्वयं के साथ - साथ दूसरों के कल्याण का भी विचार करे।
अधर्म की शुरुआत कैसे होती है ?
अधर्म अचानक जीवन में प्रवेश नहीं करता।
वह अक्सर छोटी - सी उपेक्षा से प्रारंभ होता है।
पहले मनुष्य असत्य को छोटा समझता है।
फिर लोभ के कारण किसी दूसरे का अधिकार छीनता है।
उसके बाद अपने गलत कर्म को सही सिद्ध करने के लिए अहंकार का सहारा लेता है।
धीरे - धीरे उसका विवेक कमजोर होने लगता है।
यहीं से अधर्म का चक्र तेज हो जाता है।
लोभ → मोह → छल → अन्याय → अपराध-बोध → पुनः मोह और अहंकार।
यदि मनुष्य समय रहते इस चक्र को नहीं रोकता तो वही प्रवृत्ति उसके स्वभाव का हिस्सा बन सकती है।
कर्म और कर्मफल का संबंध :
शिवमहापुराण की व्यापक कर्म - दृष्टि के अनुसार मनुष्य अपने कर्मों से मुक्त नहीं हो सकता।
कर्म का फल किस रूप में और कब प्राप्त होगा, यह सूक्ष्म विषय है; परंतु कर्म मनुष्य के जीवन पर प्रभाव अवश्य डालते हैं।
एक किसान जैसा बीज बोता है, वैसी ही फसल प्राप्त होने की संभावना रहती है।
उसी प्रकार मनुष्य अपने जीवन में जैसे कर्मों के बीज बोता है, उनके अनुरूप संस्कार और परिणाम विकसित होते हैं।
इस लिए धर्मचक्र का सबसे महत्वपूर्ण नियम है—
कर्म को बदलने से जीवन की दिशा बदल सकती है।
यदि किसी व्यक्ति से पूर्व में गलतियां हुई हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह सदैव अधर्म के मार्ग पर ही चलता रहेगा।
प्रायश्चित्त, सदाचार, सेवा, संयम, सत्संग और शिवभक्ति के द्वारा वह अपनी वर्तमान दिशा बदल सकता है।
भगवान शिव और अधर्म का विनाश :
भगवान शिव के अनेक स्वरूप हमें धर्म - अधर्म के गहरे रहस्य को समझाते हैं।
शिव का रुद्र स्वरूप अधर्म और आसुरी प्रवृत्तियों के विनाश का प्रतीक है।
उनका नीलकंठ स्वरूप त्याग और लोककल्याण का संदेश देता है।
उनका दक्षिणामूर्ति स्वरूप ज्ञान का प्रतीक है।
उनका नटराज स्वरूप सृष्टि, स्थिति और संहार की निरंतर गति को दर्शाता है।
नटराज के cosmic नृत्य की कल्पना धर्मचक्र को समझने में अत्यंत सुंदर प्रतीक देती है।
संसार में कोई भी स्थिति स्थायी नहीं है।
निर्माण होता है, स्थिति रहती है और फिर परिवर्तन आता है।
इसी प्रकार मनुष्य के भीतर भी संस्कारों का निर्माण होता है, वे मजबूत होते हैं और फिर ज्ञान तथा साधना से उनका परिवर्तन किया जा सकता है।
धर्म केवल बाहरी आचरण नहीं :
शिवपुराणीय दृष्टि में शिवभक्ति का अर्थ केवल जल चढ़ाना नहीं है।
पूजा के साथ मन की शुद्धि भी आवश्यक है।
यदि व्यक्ति शिवलिंग पर जल चढ़ाता है लेकिन मन में निरंतर द्वेष रखता है, तो उसे आत्मचिंतन करना चाहिए कि उसकी पूजा उसके व्यवहार में कितनी दिखाई दे रही है।
सच्ची शिवभक्ति का प्रभाव व्यवहार में दिखाई देता है—
वाणी में मधुरता, कर्म में ईमानदारी, मन में करुणा और जीवन में संयम।
यही धर्म को जीवित रखता है।
धर्मचक्र और चार पुरुषार्थ :
सनातन परंपरा में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को चार पुरुषार्थ माना गया है।
इन में धर्म को आधार माना गया है।
अर्थ की प्राप्ति आवश्यक है, लेकिन अर्थ अधर्म से प्राप्त न हो।
इच्छाओं की पूर्ति स्वाभाविक है, लेकिन इच्छाएं विवेक और मर्यादा से नियंत्रित हों।
अंततः मनुष्य का लक्ष्य आत्मिक उन्नति और मोक्ष की ओर बढ़ना है।
यदि अर्थ और काम धर्म से अलग हो जाएं, तो जीवन में असंतुलन उत्पन्न हो सकता है।
इसलिए धर्मचक्र का सिद्धांत कहता है—
धर्म के आधार पर अर्थ, धर्मसम्मत काम और अंततः मोक्ष की ओर यात्रा।
acer Aspire 5 15, Intel Core i5-13th Gen 13420H Processor, NVIDIA GeForce RTX 2050-4GB GDDR6(8GB/512GB) IPS FHD, 15.6"/39.62cm, 60Hz, Win 11 Home, Steel Gray, 1.78KG, A515-58GM, Metal Gaming Laptop
| { Brand | Acer |
| Model Name | Aspire 5 |
| Screen Size | 15.6 Inches |
| Colour | Steel Gray |
| Hard Disk Size | 512 GB |
| CPU Model | Core i5 |
| RAM Memory Installed Size | 8 GB |
| Operating System | Windows 11 Home |
| Special Feature | Thin |
| Graphics Card Description} | Dedicated |
{ About this item
- Processor : Great Performance with the Intel Core i5-13420H Processor | Memory: 8 GB of onboard Dual-channel DDR4 SDRAM support | Storage: 512 GB SSD
- Display : 39.62cm (15.6") Display with IPS (In-Plane Switching) technology, Full HD 1920 x 1080, Acer ComfyView LED-backlit TFT LCD
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- Ports: 1 x Type-C with DC-in /Thunderbolt 4 port, 1 x USB 3.2 port, and 1 x USB port with power-off charging.
- Keyboard: 99-/100-/103-key Acer backlit keyboard with international language support, with indicators of CapsLock and F4/Microphone mute }
पाप और पुण्य का वास्तविक अर्थ :
पाप और पुण्य को केवल बाहरी कर्मों से नहीं समझना चाहिए।
कर्म के पीछे की भावना भी महत्वपूर्ण होती है।
किसी जरूरतमंद की सहायता करना पुण्य का कार्य हो सकता है, लेकिन यदि उसी सहायता के पीछे केवल अहंकार और प्रसिद्धि की इच्छा हो, तो व्यक्ति को अपने मन की भी परीक्षा करनी चाहिए।
इसी प्रकार कठिन परिस्थिति में किया गया कोई कठोर निर्णय बाहर से कठोर दिखाई दे सकता है, लेकिन यदि उसका उद्देश्य अन्याय रोकना और लोककल्याण हो तो उसका मूल्यांकन केवल बाहरी रूप देखकर नहीं किया जा सकता।
इस लिए धर्म का निर्णय करते समय कर्म, उद्देश्य, परिस्थिति और परिणाम को समझना आवश्यक है।
शिवभक्ति धर्मचक्र को कैसे बदलती है ?
मनुष्य के भीतर अधर्म की प्रवृत्तियां मजबूत हो जाएं तो केवल भय से परिवर्तन स्थायी नहीं होता।
स्थायी परिवर्तन के लिए चेतना का परिवर्तन आवश्यक है।
शिवभक्ति मनुष्य को अपने अहंकार से ऊपर उठने का अवसर देती है।
ॐ नमः शिवाय का जप मन को एकाग्र करने का साधन है।
शिवध्यान मनुष्य को अपने भीतर देखने की प्रेरणा देता है।
शिवलिंग की पूजा सृष्टि के मूल तत्त्व के प्रति श्रद्धा का प्रतीक बन सकती है।
जब भक्ति के साथ सदाचार जुड़ता है तो धर्मचक्र सकारात्मक दिशा में घूमने लगता है।
अधर्म के चक्र को रोकने के उपाय :
यदि कोई व्यक्ति अनुभव करे कि उसके जीवन में क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, विवाद या नकारात्मकता लगातार बढ़ रही है, तो उसे अपने दैनिक जीवन का आत्मनिरीक्षण करना चाहिए।
पहला उपाय है—सत्य का पालन।
दूसरा—अन्याय से बचना।
तीसरा—वाणी पर नियंत्रण।
चौथा—दान और सेवा।
पांचवां—सत्संग।
छठा—शिवनाम स्मरण।
सातवां—अपने दोषों को स्वीकार करना।
आठवां—प्रायश्चित्त और सुधार।
इन उपायों का उद्देश्य केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि मनुष्य के चरित्र को बदलना है।
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धर्मचक्र और मृत्यु का रहस्य :
शिवतत्त्व में मृत्यु को अंतिम विनाश के रूप में देखने के बजाय परिवर्तन के रूप में भी समझा जाता है।
शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा के संबंध में सनातन दर्शन अलग दृष्टि प्रस्तुत करता है।
मनुष्य जीवन में जो संस्कार बनाता है, वे उसके आध्यात्मिक मार्ग को प्रभावित करते हैं।
इस लिए जीवन का प्रत्येक क्षण महत्वपूर्ण है।
यदि मनुष्य केवल धन, शरीर, प्रतिष्ठा और भौतिक उपलब्धियों को ही अपना अंतिम लक्ष्य मान लेता है, तो मृत्यु के समय उसके भीतर भय और आसक्ति उत्पन्न हो सकती है।
लेकिन यदि उसने धर्म, भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का अभ्यास किया है तो उसका अंतर्मन अधिक स्थिर हो सकता है।
धर्मचक्र का सबसे बड़ा शत्रु—
अहंकार :
अधर्म की अनेक प्रवृत्तियों के पीछे अहंकार छिपा होता है।
“मैं ही सब कुछ हूं”, “मुझसे बड़ा कोई नहीं”, “मेरे पास धन है इसलिए मैं कुछ भी कर सकता हूं”—
ऐसी भावना मनुष्य को धर्म से दूर ले जा सकती है।
भगवान शिव का स्वरूप इसके विपरीत संदेश देता है।
वे वैभव के प्रदर्शन से दूर, भस्म धारण करने वाले, कैलासवासी और सहज योगी के रूप में वर्णित हैं।
यह हमें याद दिलाता है कि बाहरी संपत्ति स्थायी नहीं है।
मनुष्य कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, समय के सामने उसे विनम्र होना पड़ता है।
धर्मचक्र में गुरु और ज्ञान का स्थान :
अज्ञान अधर्म की भूमि तैयार कर सकता है।
इस लिए ज्ञान का महत्व अत्यधिक है।
शिव को आदि गुरु के रूप में स्मरण करने की परंपरा इसी आध्यात्मिक ज्ञान की ओर संकेत करती है। गुरु का उद्देश्य केवल मंत्र देना नहीं, बल्कि शिष्य को विवेक, आत्मज्ञान और सही जीवनमार्ग की ओर ले जाना है।
जिस व्यक्ति में विवेक जागृत होता है, वह हर आकर्षक वस्तु को लाभदायक नहीं मानता और हर कठिन परिस्थिति को दुर्भाग्य नहीं समझता।
वह कर्म और उसके परिणाम को समझने का प्रयास करता है।
धर्मचक्र का अंतिम लक्ष्य—
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मोक्ष :
धर्म का अंतिम उद्देश्य केवल सांसारिक सुख प्राप्त करना नहीं है।
सनातन आध्यात्मिक परंपरा में धर्म मनुष्य को धीरे - धीरे मोक्ष की दिशा में ले जाता है।
जब मनुष्य अपने अहंकार, लोभ, मोह और आसक्ति को पहचानकर उनसे ऊपर उठने का प्रयास करता है, तब उसकी चेतना अधिक शुद्ध होती है।
शिवभक्ति में इसी कारण मुक्ति का विशेष महत्व है।
“शिव” का अर्थ ही कल्याणकारी तत्त्व से जोड़ा जाता है।
शिव की शरण का अर्थ केवल संकट में सहायता मांगना नहीं, बल्कि अपने जीवन को कल्याणकारी दिशा में ले जाना भी है।
निष्कर्ष :
श्री शिवमहापुराण की शिक्षाओं के आलोक में धर्म - अधर्म का चक्र मनुष्य के भीतर और उसके कर्मों में निरंतर चलता रहता है।
विचार से कर्म, कर्म से संस्कार, संस्कार से स्वभाव और स्वभाव से भविष्य के कर्म उत्पन्न होते हैं।
यदि विचार शुद्ध हैं तो धर्म का चक्र मजबूत होता है।
यदि लोभ, क्रोध, मोह और अहंकार बढ़ते हैं तो अधर्म का चक्र गति पकड़ता है।
लेकिन सनातन दर्शन मनुष्य को निराश नहीं करता।
यदि जीवन में गलत कर्म हुए हैं, तो सुधार का मार्ग खुला है।
सत्संग, सदाचार, प्रायश्चित्त, सेवा, संयम, ज्ञान और भगवान शिव की भक्ति के द्वारा मनुष्य अपनी जीवन - दिशा बदल सकता है।
इस लिए धर्मचक्र का सबसे गहरा संदेश यही है—
“मनुष्य अपने वर्तमान कर्मों से अपने जीवन की दिशा बदल सकता है।”
भगवान शिव के चरणों में श्रद्धा रखते हुए यदि मनुष्य सत्य, दया, संयम, सेवा और सदाचार को जीवन में उतारता है, तो उसकी भक्ति केवल मंदिर तक सीमित नहीं रहती; वह उसके व्यवहार, विचार और कर्म में दिखाई देने लगती है।
यही वास्तविक शिवभक्ति है।
यही धर्म की स्थापना है।
और यही उस धर्मचक्र को अधर्म से धर्म, अज्ञान से ज्ञान तथा बंधन से मुक्ति की ओर ले जाने का मार्ग है। हर - हर महादेव।
!!!!! शुभमस्तु !!!
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