।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।

सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता,  किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश

।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।

*"श्रीरामचन्द्रजी का वनवासी प्रसंग "*
 
*पिछली पोस्ट से आगे-*

       गोस्वामीजी कहते हैं कि अयोध्याकाण्ड के प्रारंभ में कर्म, भक्ति और उपासना का जो वास्तविक रूप प्रस्तुत किया गया है, तथा रामराज्य की स्थापना में आने वाले जिन विध्नों का संकेत किया गया है, उन्हें हम और आप हृदयंगम करने की चेष्टा करें। 

महाराज श्री दशरथ रामराज्य का निर्माण करना चाहते हैं पर रामराज्य का निर्माण वे नहीं कर पाते। 

अपने संकल्प में उन्हें जो सफलता नहीं मिली उसका कारण है कि उनकी धारणा यह थी कि स्वर्ण के सिंहासन पर जब राम का राजतिलक हो जाएगा, तो रामराज्य की स्थापना अपने आप हो जायेगी। 

किन्तु रामराज्य का तात्पर्य स्वर्ण सिंहासन पर श्रीराम का बैठना ही नहीं, अपितु जब राम हमारे हृदय के सिंहासन पर बैठ जायें तब सच्चे अर्थों में रामराज्य की स्थापना होती है।

इसका अभिप्राय यह है कि संसार में जितने राज्य हैं, उन राज्यों में मुख्य वस्तु है व्यवस्था। 

जिस राज्य की जितनी श्रेष्ठ व्यवस्था होती है उसकी उतनी ही प्रशंसा की जाती है। 

पर रामराज्य का तात्पर्य उत्कृष्ट व्यवस्था नहीं है अपितु रामराज्य का तात्पर्य है कि जब व्यक्ति का हृदय इतना बदल जाय कि उसको नियंत्रित करने ( सही मार्ग पर चलाने ) के लिए किसी बाह्य व्यवस्था की आवश्यकता न रह जाय। 

किन्तु प्रारंभ में रामराज्य क्यों नहीं स्थापित हो पाया तथा आगे चलकर स्थापित हुआ, उन दोनों परिस्थितियों में क्या अंतर था?

इसकी कुछ चर्चा आपके समक्ष की जायेगी।

     अयोध्या में एक नारी पात्र है मंथरा। 

और जब मन्थरा को यह पता चलता है कि कल अयोध्या के राजसिंहासन का उत्तराधिकार राम को प्राप्त होगा तो उसके अन्त:करण में अत्यंत दुख होता है। 

वह निर्णय कर लेती है कि किसी न किसी प्रकार से इस कार्य को रोकना है। 

वह मन्थरा भी कैकेयी जी को बरगलाने में इतनी समर्थ हो जाती है कि अन्त में कैकेयी मन्थरा के वशीभूत हो जाती है। 

उसका परिणाम होता है कि रामराज्य की स्थापना के स्थान पर श्रीराम का वन-गमन हो जाता है। 

यह मन्थरा के द्वारा कैकेयी का बरगला दिया जाना बड़ा अटपटा सा प्रतीत होता है तथा कैकयी जी के प्रारंभिक स्वरुप को देखकर तो कोई यह कल्पना भी नहीं कर सकता है कि ऐसे विचारों वाली कैकेयी बदलकर इस प्रकार का रुप ले लेंगी। 




क्योंकि जिस समय मन्थरा आंसू बहाती हुई और शोक की मुद्रा में कैकेयी जी के महल में प्रवेश करती है, उस समय मन्थरा की दशा देखकर उनको लगा कि अयोध्या में कहीं कोई ऐसी दुर्घटना तो नहीं हो गई है कि जिसका अमांगलिक समाचार लेकर मन्थरा आयी है। 

और तब व्याकुल होकर उन्होंने पहला वाक्य मन्थरा से यह कहा कि मन्थरा! 

तुम सही-सही बताओ कि सब लोग कुशलपूर्वक तो हैं?

और तब मन्थरा ने पूछ दिया कि आप किसकी कुशलता के विषय में सबसे अधिक चिंतित हैं? 

और तब जो वाक्य कैकेयीजी ने कहा उसको पढ़कर आश्चर्य होता है। 

शेष अगले अंक में.....
         -तुलशीकृत रामायण
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पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
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(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
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नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

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