सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।। श्री रामचरित्रमानस प्रवचन ।।
*"श्रीरामचन्द्रजी का वनवासी प्रसंग "*
श्रीरामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड की हृदयस्पर्शी कथा :
*पिछली पोस्ट से आगे-*
गोस्वामीजी कहते हैं कि अयोध्याकाण्ड के प्रारंभ में कर्म, भक्ति और उपासना का जो वास्तविक रूप प्रस्तुत किया गया है, तथा रामराज्य की स्थापना में आने वाले जिन विध्नों का संकेत किया गया है, उन्हें हम और आप हृदयंगम करने की चेष्टा करें।
महाराज श्री दशरथ रामराज्य का निर्माण करना चाहते हैं पर रामराज्य का निर्माण वे नहीं कर पाते।
Dakshinavarti Shankh, Natural Pooja Original From Rameswaram / दक्षिणावर्ती शंख - Size 4.5-5 Inch, Without Stand
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| { Colour | Natural |
| Brand | DARMIKA |
| Material | Seashell |
| Style | Traditional |
| Item Weight | 250 g } |
{ About this item
- Dakshinavarti shankh, Natural Pooja Dakshinavarti Shankh Original from Rameswaram
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- 🕉️ Ideal for Pooja & Vastu – Brings positive energy, prosperity, and peace. Perfect for daily rituals, Lakshmi pooja, and vastu correction.
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श्रीरामचरितमानस का अयोध्याकाण्ड केवल श्रीराम के वनवास की कथा नहीं है।
यह उस महान क्षण की कथा है जब अयोध्या के महाराज दशरथ अपने जीवन की सबसे बड़ी इच्छा को पूर्ण करना चाहते हैं—
अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम को अयोध्या का युवराज बनाकर उनके हाथों में राज्य की जिम्मेदारी सौंपना।
अपने संकल्प में उन्हें जो सफलता नहीं मिली उसका कारण है कि उनकी धारणा यह थी कि स्वर्ण के सिंहासन पर जब राम का राजतिलक हो जाएगा, तो रामराज्य की स्थापना अपने आप हो जायेगी।
किन्तु रामराज्य का तात्पर्य स्वर्ण सिंहासन पर श्रीराम का बैठना ही नहीं, अपितु जब राम हमारे हृदय के सिंहासन पर बैठ जायें तब सच्चे अर्थों में रामराज्य की स्थापना होती है।
इसका अभिप्राय यह है कि संसार में जितने राज्य हैं, उन राज्यों में मुख्य वस्तु है व्यवस्था।
जिस राज्य की जितनी श्रेष्ठ व्यवस्था होती है उसकी उतनी ही प्रशंसा की जाती है।
पर रामराज्य का तात्पर्य उत्कृष्ट व्यवस्था नहीं है अपितु रामराज्य का तात्पर्य है कि जब व्यक्ति का हृदय इतना बदल जाय कि उसको नियंत्रित करने ( सही मार्ग पर चलाने ) के लिए किसी बाह्य व्यवस्था की आवश्यकता न रह जाय।
किन्तु प्रारंभ में रामराज्य क्यों नहीं स्थापित हो पाया तथा आगे चलकर स्थापित हुआ, उन दोनों परिस्थितियों में क्या अंतर था?
महाराज दशरथ वृद्ध हो चुके थे।
उन्होंने अपने जीवन में अनेक युद्ध किए, प्रजा की रक्षा की और अयोध्या के राज्य को समृद्ध बनाया।
अब उनके मन में एक ही विचार था—
मेरे बाद अयोध्या का शासन किसके हाथ में हो?
उनके सामने इसका उत्तर बिल्कुल स्पष्ट था—श्रीराम।
इसकी कुछ चर्चा आपके समक्ष की जायेगी।
अयोध्या में एक नारी पात्र है मंथरा।
और जब मन्थरा को यह पता चलता है कि कल अयोध्या के राजसिंहासन का उत्तराधिकार राम को प्राप्त होगा तो उसके अन्त:करण में अत्यंत दुख होता है।
वह निर्णय कर लेती है कि किसी न किसी प्रकार से इस कार्य को रोकना है।
वह मन्थरा भी कैकेयी जी को बरगलाने में इतनी समर्थ हो जाती है कि अन्त में कैकेयी मन्थरा के वशीभूत हो जाती है।
उसका परिणाम होता है कि रामराज्य की स्थापना के स्थान पर श्रीराम का वन-गमन हो जाता है।
यह मन्थरा के द्वारा कैकेयी का बरगला दिया जाना बड़ा अटपटा सा प्रतीत होता है तथा कैकयी जी के प्रारंभिक स्वरुप को देखकर तो कोई यह कल्पना भी नहीं कर सकता है कि ऐसे विचारों वाली कैकेयी बदलकर इस प्रकार का रुप ले लेंगी।
राम केवल उनके पुत्र नहीं थे।
वे अयोध्या की प्रजा के प्राण थे।
उनके आचरण में सत्य था, वाणी में मधुरता थी, हृदय में करुणा थी और व्यवहार में मर्यादा थी।
वे गुरुजनों का सम्मान करते, छोटे-बड़े सभी से प्रेम करते और प्रजा के सुख - दुःख को अपना सुख - दुःख समझते थे।
इसी लिए महाराज दशरथ ने मन में निश्चय किया कि अब श्रीराम को युवराज बना देना चाहिए।
यहीं से एक ऐसी कथा प्रारंभ होती है, जिसमें रामराज्य की स्थापना का संकल्प तो दिखाई देता है, लेकिन उसी क्षण नियति एक ऐसी परीक्षा लेकर आती है कि रामराज्य का निर्माण तत्काल नहीं हो पाता।
दशरथ के मन में रामराज्य का सपना :
महाराज दशरथ जानते थे कि राज्य चलाना केवल राजसिंहासन पर बैठने का नाम नहीं है। राजा का पहला धर्म प्रजा का पालन करना है।
राजा को अपने सुख से पहले प्रजा का सुख देखना पड़ता है।
दशरथ ने श्रीराम में यही गुण देखे थे।
उन्हें विश्वास था कि यदि राम अयोध्या के राजा बनेंगे तो राज्य में न्याय होगा, धर्म की रक्षा होगी, निर्धन को सहारा मिलेगा, विद्वानों का सम्मान होगा और प्रजा भयमुक्त जीवन जी सकेगी।
इस लिए दशरथ का राम को युवराज बनाने का निर्णय केवल पिता का प्रेम नहीं था।
उसके पीछे राजधर्म और प्रजाधर्म की गहरी भावना थी।
महाराज दशरथ चाहते थे कि जिस राज्य को उन्होंने अपने जीवनभर संभाला है, उसकी बागडोर अब ऐसे हाथों में जाए जो धर्म और मर्यादा को सबसे ऊपर रखे।
उनके मन में मानो एक आदर्श राज्य की कल्पना थी—
जहाँ राजा और प्रजा के बीच दूरी न हो, जहाँ न्याय बिके नहीं, जहाँ धर्म कमजोर न हो और जहाँ प्रजा राजा को अपना रक्षक समझे।
ऐसे राज्य का आधार वे श्रीराम को मानते थे।
क्योंकि जिस समय मन्थरा आंसू बहाती हुई और शोक की मुद्रा में कैकेयी जी के महल में प्रवेश करती है, उस समय मन्थरा की दशा देखकर उनको लगा कि अयोध्या में कहीं कोई ऐसी दुर्घटना तो नहीं हो गई है कि जिसका अमांगलिक समाचार लेकर मन्थरा आयी है।
और तब व्याकुल होकर उन्होंने पहला वाक्य मन्थरा से यह कहा कि मन्थरा!
तुम सही-सही बताओ कि सब लोग कुशलपूर्वक तो हैं?
और तब मन्थरा ने पूछ दिया कि आप किसकी कुशलता के विषय में सबसे अधिक चिंतित हैं?
और तब जो वाक्य कैकेयीजी ने कहा उसको पढ़कर आश्चर्य होता है।
अयोध्या में राज्याभिषेक की तैयारी
जब यह निर्णय हुआ कि श्रीराम का युवराज पद पर अभिषेक किया जाएगा, तब अयोध्या में आनंद की लहर दौड़ गई।
नगर को सजाया जाने लगा।
घरों पर मंगल चिह्न बनाए जाने लगे।
सड़कों को सजाया गया।
मंदिरों में पूजा होने लगी।
ब्राह्मणों और विद्वानों को आमंत्रित किया गया।
प्रजा के हृदय में ऐसा आनंद था मानो स्वयं उनका राज्याभिषेक होने जा रहा हो।
क्योंकि अयोध्यावासी श्रीराम को केवल राजकुमार नहीं मानते थे। वे उन्हें अपने जीवन का आधार मानते थे।
दशरथ को लगा कि अब उनका स्वप्न पूरा होने वाला है।
वृद्धावस्था में पिता अपने योग्य पुत्र को राज्य सौंपकर निश्चिंत होना चाहते थे।
उन्हें क्या पता था कि जिस दिन वे राम को युवराज बनाने की तैयारी कर रहे हैं, उसी दिन उनके जीवन का सबसे बड़ा दुःख उनके सामने आने वाला है।
रामराज्य से पहले वनराज्य की ओर
यही श्रीरामचरितमानस की लीला का अद्भुत मोड़ है।
जिस राम को अयोध्या का राजा बनाया जाना था, वही राम अगले ही दिन वन जाने के लिए तैयार हो जाते हैं।
जिस राजमहल में उत्सव की तैयारी थी, वहीं अचानक विलाप होने लगता है।
जिस पिता ने पुत्र को राजसिंहासन देने का निर्णय लिया था, वही पिता पुत्र को वन जाने से रोकने के लिए तड़पने लगते हैं।
इस परिवर्तन का कारण बनती हैं—
महारानी कैकेयी के दो वरदान।
कैकेयी को कभी महाराज दशरथ ने युद्ध के समय प्रसन्न होकर दो वरदान देने का वचन दिया था।
समय बीत गया।
दशरथ उस वचन को भूल चुके थे।
लेकिन जब श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी हुई, तब मंथरा ने कैकेयी के मन में भय और मोह उत्पन्न किया।
उसने कैकेयी को समझाया कि यदि राम राजा बन गए तो भरत पीछे रह जाएंगे।
मोह धीरे-धीरे बुद्धि पर छा गया।
कैकेयी ने राजा दशरथ से अपने दो वरदान माँग लिए।
पहला—भरत को अयोध्या का राजा बनाया जाए।
दूसरा—श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास दिया जाए।
दशरथ के सामने धर्म की सबसे कठिन परीक्षा
जब दशरथ ने यह सुना तो उनके पैरों तले से मानो धरती खिसक गई।
जिस पुत्र का राज्याभिषेक करने की वे तैयारी कर रहे थे, उसी पुत्र को वन भेजने का आदेश उन्हें स्वयं देना था।
दशरथ के सामने दो मार्ग थे।
एक ओर पिता का प्रेम था।
दूसरी ओर दिया हुआ वचन।
वे राजा थे।
उनका वचन केवल व्यक्तिगत प्रतिज्ञा नहीं था; राजा का वचन राज्य की प्रतिष्ठा से जुड़ा था।
लेकिन उनका हृदय पिता का था।
वे राम को खोने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे।
उनका शरीर राजमहल में था, लेकिन मन राम के चरणों में पड़ा हुआ था।
वे कैकेयी से बार-बार अपना वरदान बदलने का आग्रह करते हैं।
लेकिन कैकेयी अपने निर्णय पर अडिग रहती हैं।
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दशरथ टूट जाते हैं।
यहीं श्रीरामचरितमानस हमें एक गहरी शिक्षा देता है—मनुष्य भविष्य की योजना बना सकता है, लेकिन परिणाम हमेशा उसके हाथ में नहीं होता।
राम की दृष्टि में वनवास
जब श्रीराम को वनवास का समाचार मिलता है, तब वे न तो क्रोधित होते हैं और न ही राजसिंहासन के लिए संघर्ष करते हैं।
उनके लिए पिता का वचन सर्वोपरि था।
उन्होंने समझ लिया कि अब उनका कर्तव्य राजसिंहासन पर बैठना नहीं, बल्कि पिता के वचन की रक्षा करना है।
यही श्रीराम के चरित्र की महानता है।
दशरथ रामराज्य बनाना चाहते थे।
राम स्वयं राज्य प्राप्त करना चाहते तो अयोध्या में रह सकते थे।
प्रजा भी उनके साथ थी।
लेकिन श्रीराम ने व्यक्तिगत अधिकार से ऊपर धर्म को रखा।
उन्होंने मानो यह संदेश दिया—
जिस राज्य की नींव धर्म पर नहीं रखी गई हो, वह रामराज्य नहीं हो सकता।
इसलिए राम ने राजसिंहासन का त्याग कर दिया।
क्या दशरथ का रामराज्य का सपना समाप्त हो गया?
यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है।
बाहरी दृष्टि से देखें तो लगता है कि दशरथ की योजना असफल हो गई।
राम राजा नहीं बन पाए।
भरत को भी तत्काल राज्य स्वीकार नहीं हुआ।
दशरथ स्वयं पुत्र-वियोग में प्राण त्याग देते हैं।
अयोध्या शोक में डूब जाती है।
लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।
वास्तव में यहीं से रामराज्य की वास्तविक नींव पड़ती है।
क्योंकि रामराज्य केवल राजसिंहासन पर बैठने से नहीं बनता।
रामराज्य पहले राम के हृदय में था।
राम के जीवन में सत्य था।
राम के जीवन में त्याग था।
राम के जीवन में मर्यादा थी।
राम के जीवन में प्रजा के प्रति प्रेम था।
राम के जीवन में पिता के वचन की रक्षा थी।
अतः वनवास ने रामराज्य को रोका नहीं—उसकी नींव को और मजबूत किया।
भरत का चरित्र और रामराज्य
जब भरत को इस घटना का समाचार मिलता है तो वे अत्यंत दुःखी होते हैं।
उन्हें राज्य चाहिए ही नहीं था।
वे समझते हैं कि राम के अधिकार को लेकर उन्हें राजा बनना उचित नहीं है।
यहीं भरत का चरित्र सामने आता है।
भरत अयोध्या लौटकर राम को वापस लाने के लिए वन की ओर जाते हैं।
वे श्रीराम से अयोध्या लौटने का आग्रह करते हैं।
लेकिन श्रीराम कहते हैं कि पिता का वचन पूरा करना उनका धर्म है।
तब भरत श्रीराम की चरण-पादुकाएँ लेकर अयोध्या लौटते हैं।
वे स्वयं राजा की तरह सुख भोगने के बजाय राम की पादुकाओं को सिंहासन पर स्थापित करते हैं और स्वयं सेवक की तरह राज्य का संचालन करते हैं।
Kratos TW02 Ear Buds Wireless with 60H Playtime, Noise Isolation & Clear Calls, Bluetooth Earbuds with Voice Assistant, Ear Buds with Bluetooth V 5.3 & with Type C Fast Charging, IPX5 TWS Earphones
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| Brand | Kratos |
| Colour | White |
| Ear Placement | In Ear |
| Form Factor | In Ear |
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{ About this item
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यह प्रसंग रामराज्य के अर्थ को और स्पष्ट करता है।
रामराज्य का अर्थ केवल राम का राजा बनना नहीं है।
रामराज्य का अर्थ है—राज्य की सत्ता को व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठाना।
भरत ने सत्ता को अधिकार नहीं, जिम्मेदारी माना।
यही रामराज्य की आत्मा है।
चौदह वर्ष का वनवास क्यों आवश्यक बना?
श्रीराम का वनवास बाहरी दृष्टि से दुःखद था, लेकिन कथा के व्यापक स्वरूप में यही वनवास आगे चलकर धर्म की स्थापना का कारण बनता है।
वन में श्रीराम ऋषियों से मिलते हैं।
वनवासियों से मिलते हैं।
निषादराज से प्रेम करते हैं।
शबरी जैसी भक्त के प्रेम को स्वीकार करते हैं।
वानरों और भालुओं से संबंध बनता है।
सुग्रीव से मित्रता होती है।
हनुमानजी जैसे महान भक्त का प्राकट्य होता है।
अंततः श्रीराम रावण के अत्याचार का अंत करते हैं।
इस प्रकार अयोध्या का राजसिंहासन छोड़ना केवल व्यक्तिगत त्याग नहीं था।
यह धर्म की व्यापक स्थापना की यात्रा बन गया।
यदि श्रीराम राज्याभिषेक के बाद अयोध्या में ही रह जाते, तो वनवास की वे घटनाएँ कैसे घटतीं?
रावण का अंत कैसे होता?
वानर सेना का संगठन कैसे होता?
हनुमानजी की भक्ति संसार के सामने कैसे आती?
विभीषण को धर्म का मार्ग कैसे मिलता?
अर्थात जो घटना दशरथ के लिए उस समय विनाश जैसी प्रतीत हुई, वही आगे चलकर धर्म की विजय का मार्ग बन गई।
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दशरथ की सबसे बड़ी पीड़ा :
फिर भी एक पिता के रूप में दशरथ के दुःख को कम नहीं किया जा सकता।
वे राम को वन जाते हुए देखते हैं।
उनका हृदय पुकारता है कि राम वापस आ जाएँ।
लेकिन वे अपने वचन से बंधे हैं।
श्रीराम वन चले जाते हैं।
दशरथ राम-वियोग सहन नहीं कर पाते और अंततः उनका जीवन समाप्त हो जाता है।
उनका अंतिम स्मरण भी राम से जुड़ा रहता है।
यह प्रसंग हमें बताता है कि संसार में सबसे बड़ी परीक्षा कभी-कभी बाहरी शत्रु से नहीं, बल्कि अपने ही मोह से होती है।
दशरथ राजा होते हुए भी अपने पुत्र-वियोग के सामने असहाय हो गए।
लेकिन श्रीराम ने पिता के दुःख को समझते हुए भी धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा।
रामराज्य का वास्तविक निर्माण
यहाँ एक अत्यंत गहरा रहस्य समझना चाहिए।
महाराज दशरथ रामराज्य की व्यवस्था बनाना चाहते थे।
श्रीराम ने रामराज्य का आदर्श अपने आचरण से बनाया।
दशरथ का विचार था कि राम राजा बनेंगे तो अच्छा राज्य बनेगा।
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लेकिन राम ने दिखाया कि अच्छा राज्य बनाने से पहले अच्छे चरित्र का निर्माण आवश्यक है।
राजा धर्मात्मा होगा तो राज्य में धर्म आएगा।
राजा सत्यवादी होगा तो सत्य की प्रतिष्ठा होगी।
राजा त्यागी होगा तो प्रजा में भी त्याग और मर्यादा का आदर होगा।
इसलिए रामराज्य की शुरुआत सिंहासन से नहीं होती।
रामराज्य की शुरुआत मनुष्य के चरित्र से होती है।
आज के जीवन के लिए अयोध्याकाण्ड की शिक्षा
आज भी प्रत्येक परिवार, समाज और शासन में लोग अपने-अपने रामराज्य का सपना देखते हैं।
हर माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे संस्कारी बनें।
हर समाज चाहता है कि न्याय मिले।
हर नागरिक चाहता है कि शासन ईमानदार हो।
हर व्यक्ति चाहता है कि उसके आसपास शांति हो।
लेकिन रामचरितमानस हमें बताता है कि केवल इच्छा करने से रामराज्य नहीं बनता।
रामराज्य के लिए दशरथ जैसी जिम्मेदारी चाहिए।
राम जैसा सत्य चाहिए।
भरत जैसा त्याग चाहिए।
लक्ष्मण जैसी सेवा चाहिए।
सीता जैसी निष्ठा चाहिए।
हनुमान जैसी भक्ति चाहिए।
और सबसे बढ़कर—अपने स्वार्थ से ऊपर धर्म को रखने की क्षमता चाहिए।
महाराज दशरथ रामराज्य बनाना चाहते थे, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें अवसर नहीं दिया।
परंतु उनकी इच्छा व्यर्थ नहीं गई।
उनका पुत्र राम वन गया, धर्म की रक्षा की, अधर्म का नाश किया और अंततः अयोध्या लौटकर ऐसा शासन स्थापित करता है जिसे भारतीय संस्कृति में आदर्श शासन के रूप में स्मरण किया जाता है।
इसलिए अयोध्याकाण्ड की यह कथा हमें एक बहुत बड़ा सत्य समझाती है—
कभी-कभी ईश्वर हमारी बनाई हुई योजना को रोकता हुआ दिखाई देता है, लेकिन उसी के भीतर किसी बड़ी योजना का मार्ग खुल रहा होता है।
दशरथ चाहते थे—राम तुरंत राजा बनें।
ईश्वर की लीला में था—राम पहले वन जाएँ, धर्म की स्थापना करें और फिर लौटकर राज्य संभालें।
दशरथ का रामराज्य का सपना उस दिन टूटता हुआ दिखाई दिया, जिस दिन राम वन गए।
लेकिन वास्तव में उसी दिन रामराज्य की सबसे मजबूत नींव रखी गई।
क्योंकि रामराज्य पहले अयोध्या में नहीं, राम के आचरण में जन्मा था।
और जब राम का आचरण अयोध्या के सिंहासन तक पहुँचा, तब वह केवल एक राजा का शासन नहीं रहा—वह धर्म, सत्य, न्याय, करुणा और मर्यादा पर आधारित आदर्श शासन बन गया।
यही श्रीरामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड की सबसे बड़ी शिक्षा है—
सच्चा रामराज्य राजमहल से नहीं, मनुष्य के हृदय से प्रारंभ होता है।
जहाँ सत्य है, वहाँ राम हैं।
जहाँ धर्म है, वहाँ राम हैं।
जहाँ सेवा है, वहाँ राम हैं।
जहाँ त्याग है, वहाँ राम हैं।
और जहाँ राजा से लेकर सामान्य मनुष्य तक अपने कर्तव्य को ईश्वर की सेवा मानकर निभाता है, वहीं से रामराज्य की वास्तविक शुरुआत होती है।
जय श्रीराम। शेष अगले अंक में..... -तुलशीकृत रामायण
!!!!! शुभमस्तु !!!
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